By अभिनय आकाश | Jun 22, 2026
भारत के एक क्राइसिस को कॉकरोच भी सरवाइव नहीं कर पाएंगे क्योंकि एक गॉर्डिजिला हमारी ओर आ रहा है। वैज्ञानिक किसी भी बेतरतीब चीज को गॉर्डजिला तो नहीं कहेंगे। मामला सीरियल है। जिसकी शुरुआत 2 डिग्री टेंपरेचर बढ़ने से होती है। फिर दुनिया के आधे देशों में बाढ़ आती है और आधे देशों में सूखा पड़ जाता है। पूरे एग्रीकच्चर सिस्टम की तो वाट ही लग जाती है। वॉटर क्राइसिस, फूड शार्टेज, मास माइग्रेशन और फिर एक युद्ध। तेल की वजह से नहीं बल्कि पानी की वजह से, जब लोगों ने कहा था कि तीसरा विश्व युद्ध तो पानी की वजह से छिड़ेगा तो ये कई लोगों को मजाक लगा था। लेकिन अब ये रियलिटी बन रही है। क्या होता है गॉर्डिजिला अल नीनो, कैसे इसका इंपैक्ट हमारे देश पर हो सकता है। इससे वॉर कैसे शुरू हो सकती है।
अल नीनो एक प्राकृतिक रूप से होने वाली जलवायु घटना है जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कहीं अधिक गर्म हो जाता है। आम तौर पर सामान्य परिस्थितियों में व्यापारिक हवाएँ समुद्र की सतह के गर्म पानी को पश्चिम की ओर एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं, लेकिन अल नीनो के दौरान ये हवाएँ या तो कमजोर पड़ जाती हैं या अपना रुख बदल लेती हैं, जिसकी वजह से गर्म पानी पूर्व की ओर खिसकने लगता है और पूरी दुनिया का वायुमंडलीय चक्र गड़बड़ा जाता है। यह अनूठी घटना 'अल नीनो-दक्षिणी दोलन' (ENSO) का ही एक हिस्सा है जिसके तीन चरण होते हैं; अल नीनो आमतौर पर हर दो से सात साल में एक बार आता है और लगभग नौ से बारह महीनों तक बना रहता है, जिसके प्रभाव पूरी दुनिया में अलग-अलग रूप में दिखाई देते हैं। यह जहाँ एक तरफ ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में सूखा ला सकता है, वहीं दूसरी तरफ दक्षिण अमेरिका और पूर्वी अफ्रीका में इसके कारण अत्यधिक भारी बारिश होती है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात करें तो ऐतिहासिक रूप से अल नीनो का सीधा मतलब हमेशा से कमजोर मानसून ही रहा है।
मानसून को लेकर भारत की चिंताएँ बढ़ गई हैं क्योंकि बारिश सामान्य से काफी कम हो रही है और अल नीनो का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। दक्षिण-पश्चिम मानसून दक्षिणी महाराष्ट्र के ऊपर रुका हुआ है, जिससे देश के बड़े हिस्सों में बारिश की भारी कमी हो गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, 4 जून से 18 जून के बीच देश में सामान्य 72.2 मिमी के मुकाबले केवल 42.6 मिमी बारिश हुई, जिससे बारिश में 41 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। मध्य भारत सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ है, जहाँ 67 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 42 प्रतिशत की कमी है। दक्षिणी प्रायद्वीप में सामान्य से 22 प्रतिशत कम बारिश हुई है और उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश औसत से 6 प्रतिशत कम रही है। IMD ने मौसमी बारिश का अनुमान 'लॉन्ग पीरियड एवरेज' (LPA) का 90 प्रतिशत लगाया है, जो उसके पहले के 92 प्रतिशत के अनुमान से कम है। इस बीच, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) का अनुमान है कि जून और अगस्त के बीच अल नीनो बनने की संभावना 80 प्रतिशत है और उसके बाद इसके बनने की संभावना 90 प्रतिशत है।
कमजोर मानसून की सबसे पहली और बड़ी मार भारत की कृषि व्यवस्था पर पड़ती है क्योंकि देश की लगभग आधी कृषि भूमि आज भी सिंचाई के लिए पूरी तरह बारिश पर निर्भर है, जिसके कारण फसलों की पैदावार सीधे तौर पर मौसम के मिजाज से प्रभावित होती है। पर्याप्त बारिश न होने से मिट्टी की नमी कम हो जाती है, बुवाई के कामों में देरी होती है और धान, दालें, कपास तथा गन्ने जैसी मुख्य खरीफ फसलों की उत्पादकता पर बेहद बुरा असर पड़ता है, जिसके बाद इस कमी की भरपाई करने के लिए किसानों को मजबूरन भूजल (ग्राउंडवॉटर) पर निर्भर होना पड़ता है और इसके लिए उनका बिजली तथा डीजल पर होने वाला खर्च काफी बढ़ जाता है। एक तरफ फसलों की कम पैदावार और दूसरी तरफ खेती की बढ़ती लागत मिलकर किसानों की कमाई को बुरी तरह निचोड़ देती है जिससे ग्रामीण इलाकों में आर्थिक तनाव गहराने लगता है और इसका असर जमीन पर साफ दिखने भी लगा है क्योंकि 360 ONE कैपिटल रिसर्च के अनुसार मानसून की धीमी रफ्तार ने खरीफ की बुवाई को प्रभावित किया है, जिसके तहत 12 जून तक खरीफ फसलों का कुल बुवाई क्षेत्र 84.6 लाख हेक्टेयर रहा जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 3.9 प्रतिशत कम है। इस मंदी की सबसे बड़ी मार दालों और कपास पर पड़ी है जिनकी बुवाई के क्षेत्र में क्रमशः 43.2 प्रतिशत और 28 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जबकि धान यहाँ एक अपवाद साबित हुआ है जिसकी बुवाई में पिछले साल के मुकाबले 28.4 प्रतिशत की बढ़त देखी गई है, हालांकि यह बढ़त बहुत शुरुआती और कम आंकड़ों के आधार पर है। मानसून की इस कमजोर शुरुआत के बावजूद देश के जलाशयों (डैम) में पानी का स्तर थोड़ी राहत देने वाला है क्योंकि 11 जून तक इन जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का 28.3 प्रतिशत पानी मौजूद था जो पिछले दस वर्षों के औसत स्तर से लगभग 16 प्रतिशत अधिक है और पानी का यह बेहतर बैकअप आने वाले हफ्तों में बारिश के कमजोर रहने पर सिंचाई के लिए एक बेहद जरूरी ढाल बन सकता है। रिसर्च फर्म का मानना है कि मानसून की प्रगति पर बहुत बारीक नजर रखने की जरूरत है क्योंकि इसका सीधा संबंध कृषि उत्पादन, ग्रामीण आय और खाद्य महंगाई से है और अब सब कुछ मुख्य रूप से जुलाई और अगस्त की बारिश पर निर्भर करेगा क्योंकि देश की कुल मानसूनी बारिश का सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं दो महीनों में बरसता है, इसलिए अगर इन महीनों में बारिश सुधरती है तो फसलों को सहारा मिलेगा लेकिन यदि कमी लंबे समय तक बनी रही तो खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव और गहरा हो जाएगा। वैसे भी कमजोर मानसून का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता बल्कि ग्रामीण आय घटने से गाँवों और छोटे शहरों में लोगों की खरीदारी बहुत कम हो जाती है जिससे ग्रामीण मांग पर टिके उद्योगों को नुकसान उठाना पड़ता है, जैसा कि बीएनपी पारिबा ने भी रेखांकित किया है कि कई ग्रामीण संकेतकों में पहले से ही कमजोरी दिख रही है जहाँ ट्रैक्टरों की कम बिक्री, सरकारी खर्च में कटौती और बढ़ती खाद्य महंगाई ने बाजार के भरोसे को चोट पहुँचाई है। इसके अलावा सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़े यह साफ दिखाते हैं कि अल नीनो यानी कम बारिश वाले सालों के दौरान पर्सनल केयर और होम-केयर (रोजमर्रा के इस्तेमाल के सामान) बनाने वाली कंपनियों की औसत राजस्व वृद्धि घटकर 8.6 प्रतिशत रह जाती है जो आम सालों में 12.2 प्रतिशत होती है, हालांकि इस पूरे संकट के बीच उमस और भीषण गर्मी के चलते बाजार में केवल एक ही सकारात्मक बदलाव आता है कि एयर कंडीशनर और कूलर जैसे कूलिंग अप्लायंसेज की मांग में अचानक तेजी आ जाती है।
| वर्ष | IMD पूर्वानुमान | स्काईमेट पूर्वानुमान | वास्तविक वर्षा |
| 2026 | 92% | 94% | - |
| 2025 | 105% | 103% | 108% |
| 2024 | 106% | 102% | 108% |
| 2023 | 96% | 94% | 94% |
| 2022 | 99% | 98% | 106% |
| 2021 | 98% | 103% | 99% |
| 2020 | 100% | 100% | 109% |
| 2019 | 96% | 93% | 110% |
| 2018 | 97% | 100% | 91% |
| 2017 | 96% | 95% | 95% |
| 2016 | 106% | 105% | 97% |
| 2015 | 93% | 90% | 86% |
वर्षा: पूर्वानुमान और वास्तविक स्थिति (LPA का %)
2026 में IMD का 92% पूर्वानुमान वर्ष 2002 के बाद सबसे कम
महंगाई को लेकर चिंता अब तेल से हटकर खाने-पीने की चीज़ों पर आ गई है। BNP परिबास के अनुसार, कच्चे तेल की गिरती कीमतों ने महंगाई के कुल हालात में सुधार किया है, लेकिन मौसम से जुड़ी दिक्कतें अब कहीं ज़्यादा बड़ा खतरा पैदा कर रही हैं।
ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि मज़बूत अल-नीनो की संभावना से खेती के उत्पादन और खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों को लेकर चिंता बढ़ गई है। इन जोखिमों को देखते हुए, भारतीय रिज़र्व बैंक ने वित्त वर्ष 2027 के लिए महंगाई का अनुमान 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया है। कमोडिटी की ऊंची कीमतें, रुपये की गिरती कीमत और ईंधन की बढ़ती कीमतें भी दबाव बढ़ा सकती हैं। खाने-पीने की चीज़ों की महंगाई पहले ही थोड़ी बढ़ने लगी है। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) से मापी जाने वाली रिटेल महंगाई दर अप्रैल में 3.5% थी, जो मई में बढ़कर 3.9% हो गई। सब्जियां, फल, खाने का तेल और मसाले पहले ही महंगे हो चुके हैं। गर्मी की लहर (हीटवेव) के कारण टमाटर, मिर्च और पत्तागोभी की कीमतें बढ़ गई हैं। प्याज और आलू की कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है, क्योंकि महंगाई में मौसमी उछाल में अक्सर इनकी बड़ी भूमिका होती है। एसबीआई रिसर्च का अनुमान है कि अल-नीनो की वजह से टमाटर की कीमतों में ज़बरदस्त उछाल आएगा। लार्सन एंड टुब्रो के ग्रुप चीफ इकोनॉमिस्ट सच्चिदानंद शुक्ला का कहना है कि खाने-पीने से जुड़ी चीज़ों की कीमतों में सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी होने की संभावना है। उन्होंने टीओआई को बताया, टमाटर, प्याज और आलू में से SBI रिसर्च को उम्मीद है कि अल-नीनो के कारण टमाटर की कीमतें तेज़ी से बढ़ेंगी। आलू की कीमतों पर कोई असर नहीं दिख रहा है, जबकि सामान्य मॉनसून वाले साल में भी प्याज की कीमतें आम आदमी के लिए परेशानी का सबब बनती हैं।
| वर्ष | वर्षा (%) |
| 1951 | 81.3% |
| 1953 | 110 % |
| 1957 | 97.6% |
| 1963 | 97.9% |
| 1965 | 81.8% |
| 1969 | 100% |
| 1972 | 76.1% |
| 1982 | 85.5% |
| 1987 | 80.6% |
| 1991 | 90.7% |
| 1997 | 102% |
| 2002 | 80.8% |
| 2004 | 86.2% |
| 2009 | 78.2% |
| 2015 | 86.2% |
| 2018 | 90.6% |
| 2023 | 94.4% |
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि एक दशक पहले की तुलना में भारत अब कमज़ोर मॉनसून का सामना करने के लिए बेहतर स्थिति में है। सिंचाई की सुविधा बढ़ने और पानी के बेहतर भंडार के कारण खेती का उत्पादन अब बारिश पर कम निर्भर है। बार्कलेज की भारत में मुख्य अर्थशास्त्री आस्था गुडवानी के अनुसार, भारत के कुल खेती वाले इलाके का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा अब सिंचित है, जबकि 2010-11 में यह 40 प्रतिशत था। जलाशय में पानी का स्तर भी बेहतर है; पिछले साल हुई अच्छी बारिश की वजह से यह अभी दस साल के औसत से लगभग 29 प्रतिशत ज़्यादा है। रॉयटर्स के अनुसार, HSBC के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि खाद्य उत्पादन और महंगाई के लिए जलाशय का स्तर अकेले बारिश की तुलना में ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। हालाँकि, वे चेतावनी देते हैं कि बढ़ता तापमान एक बड़ा खतरा बन सकता है। HSBC की भारत में मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी ने कहा कि हमने पाया है कि कम बारिश की तुलना में ज़्यादा तापमान होने की संभावना ज़्यादा है, और अल-नीनो वाले सालों में तापमान में बढ़ोतरी की मात्रा भी बढ़ रही है। भंडारी ने आगे कहा कि फल और सब्ज़ियाँ भीषण गर्मी और मौसम के उतार-चढ़ाव से सबसे ज़्यादा प्रभावित हो सकती हैं। हालाँकि बेहतर सिंचाई नेटवर्क और अच्छे जलाशयों ने भारत की सहनशक्ति को बढ़ाया है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि आने वाले हफ़्ते बहुत अहम होंगे।
एनएसई के अनुसार, 2026 के लिए सबसे बड़ी चुनौती अल-नीनो (El Nino) का जोखिम है। एक्सचेंज ने बताया कि कम बारिश होने की संभावना 60 प्रतिशत है और सामान्य से कम बारिश होने की संभावना 24 प्रतिशत है। भारत के मॉनसून और अल-नीनो का रिश्ता पुराना और मुश्किल भरा रहा है। 1987, 2002, 2009 और 2015 जैसे कई सूखे वाले साल अल-नीनो की घटनाओं के दौरान आए; इन सालों में कम बारिश के कारण फसल उत्पादन पर बुरा असर पड़ा और खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें बढ़ गईं। इतिहास गवाह है कि कमजोर मॉनसून ने खरीफ की बुवाई में बाधा डाली है, जलाशयों का जलस्तर घटाया है, रबी की पैदावार पर असर डाला है और खाद्य पदार्थों की महंगाई बढ़ाई है, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है। अल नीनो का मतलब सिर्फ़ प्रशांत महासागर के पानी का गर्म होना नहीं है। भारत के लिए, इसका संबंध टमाटर और दूध की कीमतों, बिजली की लागत, किसानों की आय, महंगाई और आर्थिक विकास से है। यह चिलचिलाती धूप में काम करने वाले मजदूरों और गर्मी से जूझते शहरों में आने-जाने वाले लोगों को प्रभावित करता है। यह RBI के अनुमानों और सरकार के खर्च से जुड़े फैसलों को भी तय करता है। इसीलिए जुलाई और अगस्त में बारिश की चाल पर बारीकी से नज़र रखी जाएगी। क्योंकि भारत में मॉनसून भले ही कागज की नावों और शाम की चाय की यादें ताजा करता हो, लेकिन ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां मौसम और खपत आपस में गहराई से जुड़े हैं, बारिश में होने वाली हर देरी के नतीजे बादलों से कहीं आगे तक जाते हैं।