चीन-अमेरिका नहीं भारत बना रहा पेरिस से भी 5 गुना बड़ा रिन्यूएबल एनर्जी पार्क, क्या है अडानी का दुनिया हिलाने वाला मेगा प्लान?

आधुनिक दुनिया में युद्ध टैंकों या मिसाइलों से नहीं, बल्कि किसी देश की पावर ग्रिड को ठप करके भी जीता जा सकता है। ऊर्जा सुरक्षा ही असल में किसी देश की सबसे बड़ी संप्रभुता है। जर्मनी G7 का इकलौता देश बन गया जहां पर दो रिसेशंस आए। जबकि जर्मनी के पास तो बहुत सारा पैसा था। क्योंकि पैसा जिसे हम रियल करेंसी समझते हैं।
30 जुलाई 2012 की दोपहर 2 बजकर 35 मिनट पर भारत के नॉर्दर्न ग्रिड पर अचानक लोड बढ़ा। ग्रिड इस दबाव को झेल नहीं पाया और देखते ही देखते ईस्टर्न और नॉर्थ-ईस्टर्न ग्रिड भी ताश के पत्तों की तरह ढह गए। परिणाम यह हुआ कि देश के 22 राज्यों की बिजली गुल हो गई। अस्पतालों के ऑपरेशन थिएटर बंद होने लगे, वेंटिलेटर जनरेटर बैकअप पर आ गए और झुलसाती गर्मी में करोड़ों लोग पसीने से तर-बतर हो गए। इस ब्लैकआउट का सबसे डरावना पहलू था पश्चिम बंगाल और झारखंड के कोल-बेल्ट (Coal Belts) में हुआ हादसा। जैसे ही बिजली कटी, खदानों के लिफ्ट और वेंटिलेशन सिस्टम (हवा फेंकने वाले पंखे) बंद हो गए। 200 से अधिक मजदूर जमीन के सैकड़ों मीटर नीचे घने अंधेरे और बिना ऑक्सीजन के फंस गए। उन्हें सुरक्षित बाहर निकालने में प्रशासन के 8 घंटे से पसीने छूट गए थे। आर्थिक मोर्चे पर इस ब्लैकआउट ने भारत की साख को वैश्विक स्तर पर चोट पहुंचाई। सिर्फ एक दिन की ठप पड़ी मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स से देश को 1000 करोड़ का नुकसान हुआ। दलाल स्ट्रीट (शेयर बाजार) में भगदड़ मच गई। मार्केट 2% से ज्यादा नीचे आ चुका था। नियमों के मुताबिक, यदि बाजार 10% तक गिर जाता, तो लोअर सर्किट लग जाता और उस दिन के लिए ट्रेडिंग पूरी तरह बंद करनी पड़ती। यह सोचना गलत होगा कि पावर ग्रिड या एनर्जी क्राइसिस सिर्फ विकासशील देशों की समस्या है। साल 2022 में दुनिया ने इसका सबसे बड़ा सबूत देखा। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ते ही जैसे ही जर्मनी की गैस और पावर सप्लाई बाधित हुई, वहां की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। यूरोप की सबसे मजबूत आर्थिक महाशक्ति कहे जाने वाले जर्मनी में एक ही साल के भीतर करीब 24,000 कंपनियों को खुद को दिवालिया घोषित करना पड़ा। 2012 का भारतीय ब्लैकआउट और 2022 का जर्मन एनर्जी क्राइसिस हमें एक ही सबक सिखाते हैं। आधुनिक दुनिया में युद्ध टैंकों या मिसाइलों से नहीं, बल्कि किसी देश की पावर ग्रिड को ठप करके भी जीता जा सकता है। ऊर्जा सुरक्षा ही असल में किसी देश की सबसे बड़ी संप्रभुता है। जर्मनी G7 का इकलौता देश बन गया जहां पर दो रिसेशंस आए। जबकि जर्मनी के पास तो बहुत सारा पैसा था। क्योंकि पैसा जिसे हम रियल करेंसी समझते हैं। असल में बस एक अकाउंटिंग सिस्टम है। असली करेंसी एनर्जी होती है जो रियल ट्रांसफॉर्मेशन लाती है। भारत भी इस बात को भलि भांति समझ चुका है और भारत के गुजरात में स्थित कच्छ का विशाल रण, एक ऐसा क्षेत्र जिसे कभी बंजर और अनुपयोगी माना जाता था। आज दुनिया के सबसे बड़े रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स में बदल रहा है। करीब ₹1.5 लाख करोड़ के निवेश, हजारों मेगावाट क्षमता, विशाल सोलर पार्क, पवन ऊर्जा संयंत्र, बैटरी स्टोरेज सिस्टम और रणनीतिक महत्व के कारण खावड़ा प्रोजेक्ट पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। लेकिन क्या यह सिर्फ एक ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट है? या इसके पीछे भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास और भू-राजनीतिक रणनीति की भी बड़ी कहानी छिपी हुई है? आइए इस मेगा प्रोजेक्ट का आज एमआरआई स्कैन करते हैं।
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1.5 लाख करोड़ का यह मेगा प्रोजेक्ट
जरा सोचिए 1.5 लाख करोड़। यह कोई मामूली आंकड़ा नहीं है। यह भारत के ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन पर लगाया गया अब तक का सबसे बड़ा दांव है। इस भारीभरकम निवेश का सिर्फ एक ही सीधा लक्ष्य है साल 2030 तक इस पार्क की कुल उत्पादन क्षमता को 30 गीगावाट यानी 300 मेगावाट तक पहुंचाना। यह सिर्फ एक एनर्जी पार्क नहीं बन रहा है बल्कि पूरा का पूरा एक नया ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र तैयार हो रहा है। इस प्रोजेक्ट का आकार हैरान कर देने वाला है। यह 72,600 हेक्टेयर यानी लगभग 726 वर्ग किमी की बंजर और खारी जमीन पर फैला है। इसका मतलब है कि यह पेरिस शहर से भी बड़ा है। जब यह पूरी क्षमता पर काम करेगा तो हर साल लगभग 81 बिलियन किलोवाट घंटा साफ बिजली पैदा करेगा। इसे थोड़ा आसान भाषा में समझे तो यह बिजली इतनी ज्यादा है कि चिली या नीदरलैंड जैसे पूरे के पूरे देश सिर्फ इसी से रोशन हो सकते हैं। भारत के संदर्भ में बात करें तो इससे 6 से 1.8 करोड़ भारतीय घरों को लगातार बिजली मिल सकेगी। अब जाहिर सी बात है इतने विशाल प्रोजेक्ट को कोई एक कंपनी अकेले नहीं संभाल सकती। इसलिए यहां एक बहुत ही दिलचस्प मल्टी डेवलपर मॉडल अपनाया गया है। इसमें अडानी ग्रीन एनर्जी को सबसे बड़ा यानी 19,000 हेक्टेयर का हिस्सा मिला है। लेकिन वह अकेले नहीं है। एनटीपीसी और जीएसएल जैसी बड़ी सरकारी कंपनियों की भी इसमें भारी हिस्सेदारी है।
दुनिया देखेगी खावड़ा का दम
अदाणी ग्रुप खावड़ा में दुनिया का सबसे बड़ा रिन्यूएबल एनर्जी पार्क विकसित कर रहा है। करण अदाणी ने भरोसा दिलाया कि साल 2030 तक इसकी पूरी 37 गीगावाट क्षमता को शुरू कर दिया जाएगा। उन्होंने इसे केवल एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि दुनिया के लिए भारत का एक स्टेटमेंट बताया कि विकास और पर्यावरण की सुरक्षा साथ-साथ चल सकते हैं। अर्थव्यवस्था की बात करें तो यहां 15200 से अधिक सीधे रोजगार पैदा हुए हैं। जहां कभी इंसानों का रहना मुश्किल था। आज वहां 500 से अधिक मजदूरों के लिए एयर कंडीशन कॉलोनियां बसाई गई हैं। एक हाईटेक क्लाउड किचन रोजाना 1 लाख पौष्टिक भोजन तैयार कर रहा है। यह सिर्फ एक पावर प्लांट नहीं अपने आप में एक नई अर्थव्यवस्था बन गया है। इस पूरे प्रोजेक्ट को सुरक्षित और सफल बनाने के लिए रिसर्च रिपोर्ट में कुछ स्पष्ट रणनीतिक सिफारिशें दी गई हैं। पहला एक सिविल मिलिट्री कोऑर्डिनेशन विंग बनाई जाए ताकि विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच कोई टकराव ना हो। दूसरा जो भी ट्रांसमिशन लाइनें बन रही हैं उन्हें हर हाल में दिसंबर 2026 और 2027 की डेडलाइन तक पूरा किया जाए। वरना यह बिजली किसी काम की नहीं रहेगी। और तीसरा पूरे कच्छ के इकोसिस्टम को बचाने के लिए 100% वाटरलेस यानी बिना पानी वाली रोबोटिक सफाई तकनीक को अनिवार्य कर दिया जाए।
'बंजर' जमीन में आत्मनिर्भरता का चमत्कार
खावड़ा सिर्फ एक दांव नहीं है, बल्कि भारत की 'ऊर्जा सुरक्षा' का एक अभेद्य किला है। ये पूरा ढांचा एक पावर डेजर्ट यानी उस बंजर रेगिस्तान में खड़ा किया गया है, जहाँ कोई नहीं रहता। मगर याद रखिए, भारत रेगिस्तान में नहीं रहता। भारत बसता है अपने करोड़ों घरों में चौबीसों घंटे चलने वाले अस्पतालों में, फैक्ट्रियों में और जागते हुए शहरों में। अगर खावड़ा में बनने वाली यह महा-बिजली वहीं बनकर वहीं अटक जाती, तो दुनिया इसे एक चमत्कार नहीं, बल्कि इतिहास का सबसे बड़ा 'म्यूजियम' कहती। यही वजह है कि यहाँ के विशालकाय सब-स्टेशंस इस बेकाबू बिजली को कलेक्ट और स्टेबलाइज करते हैं, जो एक बार में $4500 \text{ MVA}$ तक की ऊर्जा को नियंत्रित करने की ताकत रखते हैं। इसके बाद भूमिका आती है उन ट्रांसमिशन लाइनों की, जो रेगिस्तान के तपते हुए इलेक्ट्रॉन्स को खींचकर भारत के सुदूर हिस्सों तक ले जाती हैं। अपने पहले ही फेज में यहाँ की एक सिंगल लाइन $3 \text{ GW}$ बिजली को ट्रांसपोर्ट कर रही है। सच यही है— ऊर्जा तब तक 'पावर' नहीं बनती, जब तक वो अपने आखिरी उपभोक्ता के घर का बल्ब न रोशन कर दे।
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