जल्लादों का टोटा (व्यंग्य)

By अरुण अर्णव खरे | Dec 13, 2019

इस खबर ने चौंकाया भी और सोचने पर विवश भी किया कि जल्लाद नहीं होने से फाँसी की सजा पर अमल नहीं हो पा रहा है। इस समय देश में केवल दो ही जल्लाद हैं और फाँसी के सैकड़ों मामले लम्बित हैं। 2015 में याकूब मेनन की फाँसी के बाद किसी भी अपराधी को फाँसी नहीं दी जा सकी है। कितना विरोधाभासी सीन है ये, जल्लाद होते समय में जल्लादों की कमी से जूझ रहा है देश। जल्लादों का टोटा। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई बीच समंदर में भी प्यासा बैठा हो। हम रोज ही अपने आस-पास रह रहे जल्लादों के किस्से अखबारों में पढ़ते हैं। उन्हें जानते तो हैं पर पहिचानते नहीं। पहिचान भी तभी पाते हैं जब वे सुर्खियाँ बन कर हमारे सामने आते हैं। इनमें चाहे चार साल की बच्ची से रेप करने और उसे मार डालने वाला उसके स्कूल का ही टीचर हो, अपनी ही संस्था में पढ़ने वाली नाबालिग बच्चियों से बलात्कार करने वाले जनप्रतिनिधि हों, आश्रम में रहने वाली साध्वियों से हवश बुझाने वाले बाबा हों, शादी का वादा कर बलात्कार करने वाले दोस्त हों, चाकलेट का लालच देकर छोटे-छोटे बच्चों का शोषण करने वाले पड़ोसी या अंकल हों, बहुओं को प्रताड़ित करने वाली सासें हों, आतंकी वारदातों में संलिप्त नेता हों, एनकाउण्टर कर अपनी असफलताओं पर पर्दा डालती और पीठ ठोंकती पुलिस हो, सब हमारे आसपास रहने वाले चिरपरिचित चेहरे हैं । इससे भी आगे लोगों के झुण्ड को जल्लादों की भीड़ में बदलते कितनी ही बार देखा गया है जो अपनी स्वपोषित धारणाओं के लिए किसी की जान लेने में भी नहीं हिचकती। इस भीड़ का शिकार निरीह आम आदमी से लेकर पुलिस अफसर तक कोई भी हो सकता है।

जल्लाद एक पेशा है जिसका काम कानून से सजा पाए अपराधियों को अंतिम अंजाम तक ले जाना है। विडम्बना है कि जल्लाद को कोई अच्छी नजर से नहीं देखता। इसलिए कोई जल्लाद बनना नहीं चाहता। जल्लाद होना मतलब समाज की नजर में खुद को खूंखार घोषित कर देने के समान है, जबकि जल्लाद को अतिसम्मान का पात्र होना चाहिए। वह तो समाज को दरिंदों से मुक्ति दिलाता है। क्या आप इन दरिंदों, नरपिशाचों के कुकृत्यों का बचाव करने वाले वकीलों को हेय दृष्टि से देखते हैं ! नहीं न। आप तो उल्टे खुश होते हैं कि अपराधी को अपना बचाव करने का पूरा मौका मिला, लेकिन उसका कृत्य इतना गम्भीर था कि उसे फाँसी से कम सजा मिल ही नहीं सकती थी। फिर जल्लाद को लेकर इतनी गलत धारणा क्यों ! जल्लाद तो अपना कर्तव्य समझ कर कानून से सजा पाए अपराधी को फाँसी देकर समाज की बेहतरी के लिए काम करता है।

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वास्तविक जल्लाद और हमारे आस-पास रहने वाले जल्लादों में मूल फर्क है। ये सफेदपोश जल्लाद पीड़िताओं को ट्रक से कुचलवाने का दमखम रखते हैं, पेट्रोल छिड़क कर मार डालने का होसला रखते हैं और कानून को ठेंगा दिखाने की क्षमता रखते हैं फिर भी इन्हें अफसोस करते शायद ही किसी ने देखा हो। पर वास्तविक जल्लाद तो फाँसी देने के पहले उस दुर्दांत अपराधी तक से पहले माफी माँगता है, जिसे कानून ने हर तरह से देखभाल कर सजा दी है। हमारे आसपास रहने वाले जल्लाद कानून को मानते कहाँ है अतएव उनसे माफी माँगने की उम्मीद करना ही बेमानी है। समाज की आँखों में धूल झोंकने वाले जल्लादों के आगे बहुत बौने हैं ये असली और कानूनी जल्लाद। शायद यही कारण है कि वास्तविक जल्लादों की नस्ल समाप्ति की ओर है।

- अरुण अर्णव खरे

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