By नीरज कुमार दुबे | May 29, 2026
किसानों के हितों की रक्षा और देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाए रखना मोदी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्पष्ट मानना है कि किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराने में कोई कमी नहीं आनी चाहिए, इसलिए जरूरत पड़ने पर सरकार इसके लिए खजाना खोलने से भी पीछे नहीं हटती। हम आपको बता दें कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर खाद की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ा है, लेकिन केंद्र सरकार ने समय रहते कई महत्वपूर्ण कदम उठाकर यह सुनिश्चित करने की तैयारी शुरू कर दी है कि खरीफ और रबी मौसम में किसानों को खाद की कमी का सामना न करना पड़े। वैकल्पिक परिवहन मार्गों की तलाश, अतिरिक्त आयात, बढ़ती सब्सिडी का बोझ उठाने की तैयारी और सक्रिय कूटनीतिक प्रयास इस बात का प्रमाण हैं कि किसानों की जरूरतों को पूरा करना सरकार की सबसे बड़ी चिंता है।
सूत्रों के अनुसार खाद विभाग ने मंत्रियों के एक अनौपचारिक समूह को इस योजना की जानकारी दी है। अधिकारियों का मानना है कि जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित होने के कारण सीधे मार्ग से आपूर्ति फिलहाल संभव नहीं है। देरी के कारण 60 से 70 दिनों तक अतिरिक्त समय लग सकता है, जिससे लागत भी बढ़ेगी। हालांकि सरकार का मानना है कि खरीफ मौसम के दौरान किसानों को खाद की उपलब्धता बनाए रखने के लिए यह अतिरिक्त प्रयास जरूरी है। अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर रबी फसलों की बुआई पर भी पड़ सकता है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत ने खाद आयात की दिशा में भी बड़े कदम उठाए हैं। केंद्र सरकार ने 17 लाख टन यूरिया के आयात के लिए नया वैश्विक निविदा आमंत्रित किया है। सरकारी क्षेत्र की राष्ट्रीय उर्वरक लिमिटेड ने पश्चिमी और पूर्वी तटों के लिए अलग-अलग मात्रा में आयात प्रस्ताव मांगे हैं। इन खेपों को जुलाई के तीसरे सप्ताह तक रवाना करने की योजना बनाई गई है, ताकि धान, मक्का और सोयाबीन जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की बुआई से पहले पर्याप्त भंडारण सुनिश्चित किया जा सके।
हम आपको बता दें कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक देश है और ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया का संघर्ष प्राकृतिक गैस तथा अमोनिया जैसी प्रमुख कच्ची सामग्रियों की आपूर्ति को प्रभावित कर रहा है, तब मोदी सरकार ने दूरदर्शिता का परिचय दिया है। इससे पहले अप्रैल में भी 25 लाख टन यूरिया आयात के लिए निविदा जारी की गई थी। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधित होने और कीमतों में वृद्धि के बावजूद सरकार लगातार अतिरिक्त खरीद और भंडारण की नीति पर काम कर रही है।
हम आपको यह भी बता दें कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर केवल आपूर्ति व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा दबाव केंद्र सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर भी पड़ रहा है। खाद विभाग के नवीनतम आकलन के अनुसार यदि मौजूदा वैश्विक कीमतें बनी रहती हैं तो चालू वित्त वर्ष में खाद सब्सिडी का बोझ बढ़कर लगभग 3.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, जबकि इसके लिए बजट में केवल 1.7 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। युद्ध के बाद यूरिया की वैश्विक कीमतों में 120 प्रतिशत से अधिक, डीएपी में 38 प्रतिशत, सल्फर में 87 प्रतिशत और अमोनिया में 84 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। रुपये की कमजोरी के कारण लागत में अतिरिक्त बढ़ोतरी भी हुई है। भारत डीएपी, पोटाश और एनपीके जैसे प्रमुख उर्वरकों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में उथल-पुथल का सीधा असर देश पर पड़ता है। इसके बावजूद केंद्र सरकार किसानों पर अतिरिक्त बोझ डालने के बजाय सब्सिडी के माध्यम से राहत देने की नीति पर कायम है। अधिकारियों का मानना है कि यदि तनाव लंबा चला तो जहाजों की सामान्य आवाजाही बहाल होने में दो से तीन महीने लग सकते हैं, जबकि तेल और गैस आपूर्ति पूरी तरह पटरी पर आने में और अधिक समय लग सकता है। ऐसे में सरकार एक ओर आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास कर रही है तो दूसरी ओर बढ़ती लागत के बावजूद किसानों को राहत पहुंचाने के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन जुटाने की तैयारी भी कर रही है।
हम आपको यह भी बता दें कि मोदी सरकार की कूटनीति भी इस संकट के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। भारत ने केवल खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय रूस, मिस्र, कतर, नाइजीरिया समेत कई देशों से खाद और उससे जुड़ी आवश्यक सामग्रियों की आपूर्ति सुनिश्चित की है। सरकार दीर्घकालिक आपूर्ति समझौतों को बढ़ावा देने के साथ-साथ वैकल्पिक समुद्री मार्गों की भी तलाश कर रही है। इसका उद्देश्य भविष्य में किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना और आपूर्ति श्रृंखला को अधिक मजबूत बनाना है।
रिपोर्टों के मुताबिक, घरेलू उत्पादन को बनाए रखने के लिए भी सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। खाद कारखानों को मिलने वाली गैस की आपूर्ति को पहले के लगभग 70 से 75 प्रतिशत स्तर से बढ़ाकर करीब 90 प्रतिशत तक कर दिया गया है। इससे उत्पादन क्षमता को बनाए रखने में मदद मिली है और घरेलू बाजार में खाद की उपलब्धता को स्थिर रखा जा सका है।
हालांकि वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। परिवहन लागत में वृद्धि, सीमित उपलब्धता और आपूर्ति मार्गों में बाधाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके बावजूद केंद्र सरकार लगातार निगरानी रखते हुए किसानों तक खाद की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास कर रही है।
हम आपको बता दें कि खाद विभाग के अनुसार खरीफ मौसम के लिए कुल आवश्यकता लगभग 3.9 करोड़ टन पोषक तत्वों की है और वर्तमान में देश के पास करीब 2 करोड़ टन का भंडार उपलब्ध है। हालांकि वैश्विक बाजार में कीमतों में तेज वृद्धि के कारण खाद सब्सिडी का बोझ बढ़कर लगभग 3.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है, फिर भी केंद्र सरकार किसानों पर इसका भार नहीं डालना चाहती। प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में सरकार बढ़ती लागत के बावजूद किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए सरकारी खजाने से अतिरिक्त संसाधन खर्च करने को तैयार है।
बहरहाल, पश्चिम एशिया संकट, बाधित आपूर्ति श्रृंखलाओं और बढ़ती वैश्विक कीमतों के बीच मोदी सरकार की सक्रिय कूटनीति, वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था, विविधीकृत आयात नीति और किसानों के पक्ष में सब्सिडी देने का संकल्प यह दर्शाता है कि देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों के हित सर्वोपरि हैं तथा इनसे किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं किया जाएगा।
-नीरज कुमार दुबे