Jwala Devi Temple: इस मंदिर में हजारों सालों से प्राकृतिक रूप से जल रही है ज्वाला, जानिए क्या है रहस्य

By अनन्या मिश्रा | Nov 04, 2024

ज्वाला देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से सबसे फेमस है। यह मंदिर दक्षिण हिमाचल में स्थित है। इस मंदिर को ज्वालामुखी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। बताया जाता है कि इस मंदिर में जल रही ज्वाला आज तक शांत नहीं हुई है। कहा जाता है कि कलियुग में इस मंदिर की ज्वाला शांत होगी। बता दें कि जब जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु ने माता सती के शरीर के टुकड़े किए थे।

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कब शांत होगी ज्वाला देवी मंदिर की ज्वाला

धार्मिक मान्यता के अनुसार, ज्वाला देवी मंदिर में भक्त गोरखनाथ मां ज्वाला की आराधना करते थे। वह मां ज्वाला के सच्चे भक्त थे और पूरी श्रद्धा व भक्ति के साथ मां की भक्ति करते थे। एक बार गोरखनाथ की भक्ति से प्रसन्न होकर मां ज्वाला ने दर्शन दिए। तब मां ज्वाला से गोरखनाथ ने कहा कि उनको बहुत भूख लगी है। गोरखनाथ ने कहा कि मां आप अग्नि जलाकर रखिए और मैं भिखा लेकर आता हूं। ज्वाला देवी ने ज्वाला जला दी, लेकिन गोरखनाथ भिखा लेकर वापस लौटे ही नहीं। कहा जाता है कि तब से मां ज्वाला यहां पर अग्नि जलाकर अपने भक्त गोरखनाथ की प्रतीक्षा कर रही हैं। साथ ही यह भी कहा जाता है कि कलियुग के अंत तक ज्वाला देवी अपने सच्चे भक्त गोरखनाथ की प्रतीक्षा करेंगी।

चमत्कारी कुंड

बता दें कि मां ज्वाला देवी मंदिर के पास ही गोरखनाथ मंदिर भी है और यहां पर एक चमत्कारी कुंड भी है। इस कुंड को गोरख डिब्बी के नाम से भी जाना जाता है। जब आप इस कुंड को दूर से देखेंगे, तो आपको ऐसा लगेगा जैसे कि कुंड का पानी बहुत गरम है। लेकिन जब आप पानी को स्पर्श करेंगे, तो इसका पानी बहुत ठंडा लगेगा।

मां ज्वाला के सामने झुका था अकबर

कहानियों और मान्यताओं के मुताबिक मुगल सम्राट अकबर ने भी मां ज्वाला की ज्वाला बुझाने का प्रयास किया था। जब अकबर को मंदिर में जलती हुई ज्वाला के बारे में पता चला, तो वह ज्वाला देखने के लिए ज्वाला मां के मंदिर पहुंचा। इस दौरान अकबर के मन में तमाम तरह की आशंकाएं थीं। उसने मंदिर में जल रही ज्वाला को बुझाने की कई नाकाम कोशिशें कीं।

बादशाह अकबर ने लौ पर पानी डालने का भी आदेश दिया, लेकिन इसके बाद भी वह ज्योत जलती रही। यह चमत्कार देखकर अबकर काफी ज्यादा खुश हुआ। मां ज्वाला के इस चमत्काऱ को देखने के बाद अकबर ने मंदिर में सोने का छत्र भेंट किया। हालांकि मां ज्वाला ने मुगल बादशाह अकबर की इस भेंट को स्वीकार नहीं किया। सोने के इस छत्र को फिर बाद में अन्य धातु में बदला गया।

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