गंगा दशहरा पर इस तरह करें पूजन, पूरी होगी हर मनोकामना

By शुभा दुबे | Jun 11, 2019

हिन्दुओं के प्रमुख त्योहार गंगा दशहरा को ज्येष्ठ शुक्ल दशमी का दशहरा भी कहा जाता है। गंगा दशहरा के बारे में स्कन्दपुराण में लिखा हुआ है कि इस दिन पवित्र नदी में स्नान और उसके बाद दान का विशेष महत्व है। महर्षि व्यास ने गंगा की महिमा के बारे में पद्म पुराण में लिखा है कि अविलंब सद्गति का उपाय सोचने वाले सभी स्त्री−पुरुषों के लिए गंगा ही ऐसा तीर्थ है, जिनके दर्शन भर से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। 

इसे भी पढ़ें: सिद्ध शक्तिपीठ है कामाख्या मंदिर, हर तंत्र, हर कामना पूरी होती है यहां

गंगा दशहरा का महत्व

 

भविष्य पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि जो मनुष्य दशहरा के दिन गंगा के पानी में खड़ा होकर दस बार गंगा स्तोत्र को पढ़ता है उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। पौराणिक ग्रंथों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि राजा भगीरथ ने अपने पुरखों को मुक्ति प्रदान करने के लिए भगवान शिव की आराधना करके गंगा जी को स्वर्ग से उतारा था। जिस दिन वे गंगा को इस धरती पर लाए, वही दिन गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र में स्वर्ग से गंगा का आगमन हुआ था। अतः इस दिन गंगा आदि का स्नान, अन्न वस्त्र आदि का दान, जप तप, उपासना और उपवास किया जाता है। इससे पापों से छुटकारा मिलता है।

 

गंगा दशहरा दशमी तिथि

 

11 जून 2019 को दशमी तिथि सायं 20 बजकर 19 मिनट से शुरू होगी।

12 जून 2019 को सायं 6 बजकर 27 मिनट पर दशमी तिथि समाप्त होगी।

 

गंगा दशहरा के दिन मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है खासकर गंगा किनारे के मंदिरों की सजावट इस दिन देखते ही बनती है। गंगा दशहरा पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु गंगा में डुबकी लगाते हैं और पवित्र नदी का पूजन करते हैं। इस पर्व की छटा उत्तर भारत में विशेष रूप से संपूर्ण उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार में अलग ही रूप में देखने को मिलती है। यहां गंगा दशहरा के दिन मेले का आयोजन भी किया जाता है।

इसे भी पढ़ें: मध्य प्रदेश का प्रमुख चमत्कारी मंदिर जहां 2 हजार वर्षों से जल रही अखंड ज्योति

इस तरह करें गंगा मैय्या का पूजन

 

- इस दिन गंगा तटवर्ती प्रदेश में अथवा सामर्थ्य न हो तो समीप के किसी भी जलाशय या घर के शुद्ध जल से स्नान करके स्वर्ण आदि के पात्र में त्रिनेत्र, चतुर्भुज, सर्वावय विभूषित, रत्न कुम्भधारिणी, श्वेत वस्त्रों से सुशोभित तथा वर और अभय मुद्रा से युक्त श्री गंगाजी की प्रशान्त मूर्ति अंकित करें अथवा किसी साक्षात मूर्ति के करीब बैठ जाएं और फिर ओम नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः से आह्वान आदि षोड्शोपचार पूजन करें।

 

- तत्पश्चात ओम नमो भगवते ऐं ह्रीं श्रीं हिलि, हिलि, मिली मिली गंगे मां पावय पावय स्वाहा मंत्र से पांच पुष्पांजलि अर्पण करके गंगा को पृथ्वी पर लाने वाले भगीरथ का और जहां से उनका उद्भव हुआ है, उस हिमालय का नाम मंत्र से पूजन करें। फिर दस फल, दस दीपक और दस सेर तिल का गंगायै नमः कहकर दान करें। साथ ही घी मिले हुए सत्तू और गुड़ के पिण्ड जल में डालें।

 

- सामर्थ्य हो तो सोने का कछुआ, मछली और मेढक आदि का भी पूजन करके जल में विसर्जित करें। इसके अतिरिक्त दस सेर तिल, दस सेर जौ और दस सेर गेहूं दस ब्राह्मणों को दान दें। इस दिन पुण्य सलिला गंगा का जन्मदिन मनाया जाता है। गंगा को पृथ्वी पर लाने की योजना महाराजा सगर ने बनाई थी। महाराजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने मिलकर अपने श्रम को सफल बनाया था।

 

- मां गंगा के पूजन के दौरान कोई संकल्प लेकर दस बार डुबकी लगानी चाहिए उसके बाद साफ वस्त्र पहन कर घी से चुपड़े हुए दस मुट्ठी काले तिल हाथ में लेकर जल में डाल दें। इसके बाद गंगाजी की प्रतिमा का पूजन नीचे लिखे मंत्र के साथ करें−

 

नमो भगवत्यै दशपापहरायै गंगायै नारायण्यै रेवत्यै।

शिवायै अमृतायै विश्वरूपिण्यै नन्दिन्यै ते नमो नमः।।

 

गंगा दशहरा व्रत कथा

 

एक बार महाराज सगर ने बड़ा व्यापक यज्ञ किया। उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला, पर इन्द्र ने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया। यह यज्ञ के लिए विघ्न था। परिणामतः अंशुमान ने सगर की साठ हजार प्रजा लेकर अश्व को खोजना शुरू कर दिया। सारा भूमंडल छान मारा, पर अश्व नहीं मिला। फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया। खोदने पर उन्होंने देखा कि साक्षात भगवान महर्षि कपिल के रूप में तपस्या कर रहे हैं। उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है। प्रजा उन्हें देखकर चोर चोर कहने लगी। महर्षि कपिल की समाधि टूट गई। ज्यों ही महर्षि ने अपने आग्नेय नेत्र खोले, त्यों ही सारी प्रजा भस्म हो गयी।

 

इन मृत लोगों के उद्धार के लिए ही महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तप किया था। उस तप से प्रसन्न होकर ब्रम्हा ने उनसे वर मांगने को कहा तो भगीरथ ने गंगा की मांग की। इस पर ब्रह्मा ने पूछा− राजन! तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो परन्तु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के भार तथा वेग को संभाल लेगी? मेरा विचार है कि गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है। इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शंकर का अनुग्रह प्राप्त कर लिया जाए।

 

महाराज भगीरथ ने वैसा ही किया। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमण्डल से छोड़ा। तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेट कर जटाएं बांध लीं। इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका। अब महाराज भगीरथ को और भी अधिक चिंता हुई। उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू किया। तब कहीं भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया। इस प्रकार शिवाजी की जटाओं से छूटकर गंगाजी हिमालय की घाटियों में कल कल निनाद करके मैदान की ओर मुड़ीं।

 

इस प्रकार भगीरथ पृथ्वी पर गंगावतरण करके बड़े भाग्यशाली हुए। उन्होंने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया। युगों युगों तक बहने वाली गंगा की धारा महाराज भगीरथ के कष्टमयी साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणीमात्र को जीवनदान ही नहीं देतीं, मुक्ति भी देती हैं। इसी कारण भारत तथा विदेशों तक में गंगा की महिमा गाई जाती है।

 

- शुभा दुबे

All the updates here:

प्रमुख खबरें

Asian Championships: मनु भाकर को रजत, ईशा सिंह को कांस्य, भारत को टीम गोल्ड

BWF का नया कैलेंडर: India Open का Super 750 दर्जा कायम, Syed Modi टूर्नामेंट हुआ Downgrade

Vaibhav Suryavanshi: अंडर-19 वर्ल्ड कप हीरो, सचिन से तुलना और टीम इंडिया की दहलीज

BCCI की नई लिस्ट जारी: Shubman Gill को मिला प्रमोशन, Mohammed Shami का पत्ता कटा