By एकता | Aug 13, 2026
भारत में UPI का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में इसे चलाने का खर्च भी बढ़ रहा है। अब सरकार UPI को चलाने के बढ़ते खर्च को कम करने के तरीकों पर विचार कर रही है। वित्तीय सेवा विभाग मौजूदा जीरो-MDR सिस्टम में बदलाव की संभावना देख रहा है।
अभी ऐसा कोई फैसला नहीं हुआ है कि आम लोगों को UPI से पैसे भेजने या रोजमर्रा की खरीदारी करने पर शुल्क देना होगा। सरकार जिस बदलाव पर विचार कर रही है, उसका फोकस चुनिंदा ज्यादा रकम वाले मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर है। यानी अगर आप किसी दोस्त या परिवार के सदस्य को UPI से पैसे भेजते हैं या छोटी खरीदारी के लिए UPI का इस्तेमाल करते हैं, तो उस पर आम तौर पर चार्ज लगाने की बात नहीं कही गई है।
MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क है, जो डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के लिए मर्चेंट से लिया जाता है। यह रकम पेमेंट सिस्टम से जुड़े अलग-अलग पक्षों के बीच बांटी जाती है। UPI पर साल 2019 तक मर्चेंट ट्रांजैक्शन के लिए 0.30 फीसदी तक MDR लागू था। इसके बाद डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने और लोगों को कैश की जगह डिजिटल पेमेंट के लिए प्रोत्साहित करने के लिए जनवरी 2020 से UPI पर जीरो-MDR लागू कर दिया गया।
इसका मतलब है कि दुकानदार UPI पेमेंट स्वीकार करने के लिए कोई ट्रांजैक्शन फीस नहीं देते। हालांकि, UPI को चलाने के लिए बैंकों और पेमेंट कंपनियों को सिस्टम, टेक्नोलॉजी और सुरक्षा पर खर्च करना पड़ता है। इसे भी पढ़ें: Sensex शुरुआती कारोबार में 172 अंक टूटा, Nifty भी फिसलकर 24,343 पर पहुंचा
UPI ट्रांजैक्शन की संख्या तेजी से बढ़ रही है और इसके साथ सिस्टम को चलाने का खर्च भी बढ़ रहा है। इसी वजह से लंबे समय तक UPI को आर्थिक रूप से मजबूत बनाए रखने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
संसदीय समिति के मुताबिक, सरकार ने UPI ट्रांजैक्शन को बढ़ावा देने और जीरो-MDR से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए 2,000 करोड़ रुपये का बजट रखा था। वहीं, इंडस्ट्री की अनुमानित ऑपरेशनल लागत करीब 20,700 करोड़ रुपये बताई गई है।
सरकार और समिति की चिंता यह है कि अगर पेमेंट कंपनियों को पर्याप्त कमाई नहीं होगी, तो साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने और सिस्टम को बेहतर बनाने जैसे कामों में निवेश प्रभावित हो सकता है।
सरकार जिस दूसरे विकल्प पर विचार कर रही है, वह टियर्ड इंसेंटिव सिस्टम है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि सरकार की आर्थिक मदद को एक साथ खत्म करने के बजाय धीरे-धीरे कम किया जाए।
इस सिस्टम में अलग-अलग तरह के ट्रांजैक्शन के लिए अलग स्तर का इंसेंटिव तय किया जा सकता है। हालांकि, इसका पूरा ढांचा अभी तय नहीं हुआ है। इसका मकसद UPI सिस्टम को सरकारी मदद पर कम निर्भर बनाना है, ताकि आने वाले समय में यह अपने खर्च को बेहतर तरीके से संभाल सके और UPI की ग्रोथ पर भी असर न पड़े। इसे भी पढ़ें: Rupee शुरुआती कारोबार में 7 पैसे कमजोर होकर 95.40 प्रति US Dollar पर आ गया
सरकार की योजना अगर आगे बढ़ती है तो MDR सभी UPI पेमेंट पर लागू नहीं होगा। प्रस्ताव के मुताबिक, एक तय सीमा से ज्यादा रकम वाले कुछ मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर ही मामूली शुल्क लगाया जा सकता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के मुताबिक, ऐसा कोई शुल्क आम UPI यूजर पर हर ट्रांजैक्शन के लिए लागू करने की योजना नहीं है। सरकार का फोकस सीमित कैटेगरी के ज्यादा रकम वाले मर्चेंट पेमेंट पर है।
UPI का इस्तेमाल जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसे देखते हुए सरकार लंबे समय के लिए फंडिंग का ऐसा मॉडल चाहती है जो इस सिस्टम को मजबूत बनाए रख सके। संसदीय समिति के अनुसार, भविष्य में UPI हर महीने 150 अरब तक ट्रांजैक्शन संभाल सकता है और करीब 60 करोड़ नए यूजर्स इससे जुड़ सकते हैं। ऐसे में हर ट्रांजैक्शन पर आने वाली छोटी लागत भी कुल मिलाकर बहुत बड़ी रकम बन सकती है।
सरकार ने UPI पर MDR या नए इंसेंटिव सिस्टम को लेकर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। आगे UPI और उससे जुड़ी सेवाओं की स्टीयरिंग कमिटी MDR की दर और उस रकम की सीमा पर फैसला कर सकती है, जिसके ऊपर शुल्क लागू किया जा सकता है। सरकार का कहना है कि अगर MDR लागू होता भी है तो यह सीमित संख्या में ज्यादा रकम वाले मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर ही होगा और इसकी दर डेबिट या क्रेडिट कार्ड के आम शुल्क से कम रखी जा सकती है।
फिलहाल UPI को सभी लोगों के लिए पेड सर्विस बनाने की कोई योजना सामने नहीं आई है। सरकार का मकसद UPI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ उसके खर्च को संभालने के लिए एक टिकाऊ सिस्टम तैयार करना है। इसलिए आम यूजर्स के लिए फिलहाल राहत की बात यह है कि रोजमर्रा के UPI पेमेंट और व्यक्ति से व्यक्ति पैसे भेजने पर किसी सामान्य शुल्क की घोषणा नहीं हुई है।