नववर्ष में मेरी महानता के महान प्रयोग (व्यंग्य)

By रामविलास जांगिड़ | Dec 31, 2019

नववर्ष सामने छाती पर आकर खड़ा हो गया है। इस बार कोई भी संकल्प नहीं लेने की वजह से पूरे दिमाग में एक भभ्भड़ सा मचा है कि अब मैं कौन सा संकल्प लूं? देश में इन दिनों महान होने की काफी डिमांड है। देश में महान बनने की प्रबल संभावनाएं भी हैं और महान लोगों की देश जरूरत भी महसूस कर रहा है। डिमांडानुसार यह संकल्प ले रहा हूं कि मैं इस साल से महान हो जाऊंगा। स्कूल में टीचर जी पढ़ाते कम और महान बनने के लिए उकसाते ज्यादा। रोज मुझे कहते कि तुम फटाक से महान हो जाओ। मैं और मेरा दोस्त चंद्रप्रकाश सर्दियों के दिनों में गुनगुनी धूप में ताश खेला करते थे और महान होने के बारे में गंभीरता से सोचा करते। एक दिन चंद्रप्रकाश ने फटाक से ताश के पत्ते मुझ पर फेंक मारे और महान बनने के लिए स्कूल की ऐड़ लगाई। बाद में पता चला कि उसके पत्तों में तिग्गी से कोई बड़ा पत्ता नहीं था। सच है जब हाथ में तिग्गी से बड़ा पत्ता नहीं होता है तभी लोग महान बनने के लिए हाथ-पैर मारते हैं। चंद्रप्रकाश में महान होने के गुण टीचर ने कूट-कूट कर काफी भारी मात्रा में भर दिए थे; पर वही कमबख्त महान नहीं हो पाया। इसलिए अब महानता का सारा भार मुझ पर आन पड़ा है। सोच रहा हूं कि मैं इस साल में ही महान हो हू कर काम खत्म करूं। यह मामला लगातार पेंडिंग चल रहा है। वरना फिर कोई शिकायत करेगा कि मैं अब तक महान नहीं बन पाया।

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आदेशित किया कि आज शाम 4 बजे तक हमें हर हाल में महान बनकर उनके आगे प्रकट होना है। इस तरह से महानता के प्रयोग हमारे स्कूली जीवन में चलते ही रहे। इधर ठंड भी बहुत ज्यादा है और रजाई से बाहर निकलना भी मुश्किल है। साथ ही नववर्ष भी सामने आ रहा है। अतः रजाई में पड़े-पड़े महान बनना कोई बुरा सौदा नहीं है। मुझे यही समय महान होने के लिए माकूल दिखाई पड़ रहा है। पुरानी किताबों व बड़े बुजुर्गों के समक्ष महान बनने के उपायों पर चर्चा सुनी थी। निष्कर्ष में पाया कि अगर सुबह-सुबह 3:00 बजे जल्दी उठ जाएं, ठंडे पानी से नहाएं, सिर में मुल्तानी मिट्टी लगाएं, सफेद कपड़े पहनें और टायर की चप्पल धर लें तो शर्तिया महानता हमें घंटे भर में ही मिल जाएगी। पुरानी किताबों में यह कहीं नहीं लिखा था कि प्रातः 3:00 बजे उठकर करें क्या? खैर! इस बात पर ज्यादा गौर करना महानता के मार्ग में रोड़ा होगा। तब महान बनने की योजना ने हमारे भीतर काम करना शुरू किया। तड़के ठीक 3:00 बजे उठकर ठंडे पानी से नहाने के लिए राष्ट्रीय अभियान किया। रजाई से हाथ बाहर निकाला तो बाहर चारों ओर बर्फ ही बर्फ फैली हुई थी। हिम्मत व शी शी शी का चीत्कार करके महानता प्राप्त करने के लिए उठ ही गया। बाल्टी की ओर पहुंचा तो सारा बाथरूम बर्फ की गुफा लगा। ठंडे पानी से भरी बाल्टी में हमें सैकड़ों करोड़ बर्फीले बिच्छु नजर आए। तत्काल ही हम बुलेट ट्रेन की स्पीड से रजाई में दुबक कर सो गए। हमने तत्काल ही महान बनने की योजना अगले वर्ष तक के लिए स्थगित कर दी। महान बनने का संकल्प मुंह से भाप निकल कर तुरंत ही बाथरूम में विलीन हो गया। इस नव वर्ष मुझमें महान बनने की कोई हिम्मत नहीं बची है। अगर किसी को महान बनना हो तो बन जाए इसमें मुझे कोई एतराज नहीं है।

- रामविलास जांगिड़

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