बोली और गोली (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त' | Jan 02, 2021

आजकल सरेआम बंदूक चलाना फैशन हो गया है। या यूँ कहिए कि स्टेटस हो गया है। हमारे यहाँ तो शादियों में पटाखों की जगह बंदूक ने ले ली है। और तो और सरकार भी महान व्यक्ति के निधन अथवा शहादत पर गोलियों की कई राउंड फायरिंग करवाती है। कभी कहावत थी कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। अब वही कहावत कुछ इस तरह से है- गोली-गोली पर लिखा है चलाने वाले का नाम। आप किसी को मारें या न मारें कोई फर्क नहीं पड़ता, बस लोगों की बीच बंदूक निकालिए और चला दीजिए– धाँय-धाँय...। झट से आपका वीडियो वायरल हो जाएगा।

अब सवाल यह उठता है कि गोली और बोली में किसका बोलबाला अधिक है? इसका विश्लेषण करने पर यह पाया गया है गोली की बोली से बोली की गोली अधिक ताकतवर होती है। यह कथन इसी बात से प्रमाणित होता है कि एक समय पर एक गोली से एक ही प्राणी हताहत हो सकता है, जबकि एक बोली से असंख्य प्राणियों को हताहत कर सकते हैं। गोली से हताहत होने वाले का परिणाम तात्कालिक होता है जबकि बोली की गोली से प्राणी जगत लंबे समय तक प्रभावग्रस्त रहता है। वास्तविकता तो यह है कि जिस तरह दुम कुत्ते को नहीं हिला सकता, उसी तरह गोली बोली को प्रभावित नहीं कर सकती। बल्कि बोली गोली को प्रभावित करती है। बोली में इतनी क्षमता होती है कि वह रात को दिन और दिन को रात में बदल सकती है। धर्म को अधर्म में, सत्य को असत्य में, अहिंसा को हिंसा में, असंभव को संभव में... बदल सकती है। यही कारण है कि बोली गोली से अधिक ताकतवर होती है।

एक समय था जब बहुत कम बात करने वालों को विद्वान माना जाता था। अब समय यह आ गया है कि जो चिल्ला-चिल्लाकर बात नहीं करते उन्हें मूर्खों की श्रेणियों में रखा जाता है। अब तो हर पार्टी के अपने “माइक उखाडू” प्रवक्ता हैं। उन्हीं को स्पोकपर्सन भी कहा जाता है। स्पोकपर्सन के बारे में जितना कहा जाए सागर में बूँद के समान है। उनका मुँह बंदूक नहीं तोप-सा प्रतीत होता है। बोली वाली गोली की जगह पर विस्फोटक गोले दागे जा रहे हैं। आए दिन वे धर्म, जात-पात, भाषा, लिंग, ऊँच-नीच, गाय-सूअर, चिकेन नेक के नाम पर बैठे-बिठाए अपने मुख के तोप से ऐसे-ऐसे विस्फोटक गोले दाग रहे हैं जिसके कहर से देश संभल ही नहीं पा रहा है।

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जैसे-जैसे समय बदलता रहता है, वैसे-वैसे मुँह के तोप से शब्दों के गोले बदलते रहते हैं। गोलों के अजीबोगरीब नाम हैं. किसी गोले का नाम राफेल है तो किसी का धारा 370 । किसी का नाम तीन-तलाक है तो किसी का नाम जेहाद है। किसी का नाम राम मंदिर है तो किसी का नाम बाबरी मस्जिद है। किसी का नाम CAA, NRC, NPR है तो किसी का नाम शाहीन बाग है। ये सारे के सारे ऐसे गोले हैं जो देश की अखंडता, समरसता, सौहार्दता को ध्वस्त कर देते हैं।

अब साहब सादगी से बात करने के दिन लद गए हैं। तू-तड़ाक, बेमतलब की बात, चित भी तेरी पट भी मेरी, मुद्दों से हटकर, आँख दिखाकर चिल्लाने वालों का जमाना चल रहा है। आज किसी भी न्यूज चैनल को खोलकर देख लीजिए...सुबह-शाम प्रवक्ताओं के मुँह फायरिंग करते ही रहते हैं। जो लोग समझदार हैं वे इन चैनलों की जगह कार्टून देखने में ही अपना भला समझते हैं। कारण, आज के न्यूज़ चैनल किसी कार्टून चैनल से कम नहीं हैं। और जो लोग नासमझ हैं वे इन प्रवक्ताओं की बातों में आकर अंधभक्तों की तरह आए दिन हड़कंप मचाते रहते हैं। इसीलिए कवि उरतृप्त ने ठीक कहा है-

      

“मुँह बनी बंदूक जहाँ, और बोली बन गई गोली।

खाक बचेगा देश ‘उरतृप्त’, रो रही है जनता भोली।।''

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'

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