नया साल मेरा तो नहीं (व्यंग्य)

नया साल मेरा तो नहीं (व्यंग्य)

मैंने कहा हम न्यू इंडिया वाले भी तो पूरी दुनिया के साथ हैं। खाने पीने के स्वादिष्ट विदेशी आउटलेट्स, अंतर्राष्ट्रीय ब्रैंड्स के कपड़े, जूते, गहने व कितना सामान विदेशी है। हमारे बच्चे खुलेपन में विदेशियों से आगे निकल चुके हैं...

जिसका हमें बेकरारी से इंतज़ार रहा वह नया साल आने वाला है, मगर हैरानी है पत्नी ने इस बार, ‘चल कहीं दूर निकल जाएं’ गाते हुए, पांच सितारा डिनर की फरमाइश नहीं की। मुझे याद है पिछले साल एक शानदार रिसोर्ट में टेबल बुक की थी। महंगे खान पान के साथ उन्हीं घिसे पिटे गानों पर वही घिसा पिटा डांस किया था। कई गानों के बोल भी मेरे पल्ले नहीं पड़े लेकिन हमने वह हसीन रात भी उसी रिसोर्ट में बिताई थी। मैंने गुजारिश की, चल कहीं दूर निकल जाएं। वह स्पष्ट बोली यह नया साल हम बिलकुल नहीं मनाएंगे। कहीं वह बदले हुए माहौल से डरी हुई तो नहीं। नाराज़ तो नहीं हो, बोली नाराज़ होती तो आप इस हालत में नहीं होते। बात तो सही है, मुझे लगा पत्नी से कभी नहीं पूछना चाहिए कि किसी बात पर नाराज़ हो? तो और क्या बात है, मैंने पूछने की जुर्रत की। बोली, आजकल मैं भारतीय संस्कृति में ख़ासी दिलचस्पी ले रही हूँ। कुछ दिन पहले ही पढ़ने का मौका मिला कि दरअसल इक्कतीस दिसंबर की रात को मनाए जाने वाले नए साल में हम भारतीयों का कुछ नहीं है। यह सब कुछ पाश्चात्य संस्कृति का हिस्सा है।

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मैंने कहा हम न्यू इंडिया वाले भी तो पूरी दुनिया के साथ हैं। खाने पीने के स्वादिष्ट विदेशी आउटलेट्स, अंतर्राष्ट्रीय ब्रैंड्स के कपड़े, जूते, गहने व कितना सामान विदेशी है। हमारे बच्चे खुलेपन में विदेशियों से आगे निकल चुके हैं। पत्नी बोली, विकास के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है फिर भी देखने पढ़ने पर मुझे स्पष्ट लगा कि विदेशियों ने अपनी सभ्यता, संस्कृति, पुरातत्व सब संजो कर रखा  और आधुनिकता को भी गले लगाया लेकिन हमने अपना तो सब गर्क़ कर दिया और बदलाव के नाम पर ऐसी खिचड़ी पकाई कि हम न भारतीय रह सके न विदेशी।

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मैंने कहा प्रिय, विकासजी व बदलावजी की राह पर काफी दूर आ गए हैं जहां से लौटना मुश्किल है। वह सिर उठाकर बोली, अब मैंने यह दृढ़ संकल्प लिया है कि कुछ तो अपना दोबारा अपनाना चाहिए। विदेशियों का नया साल तो तारीख बदलने पर खाने-पीने नाचने-गाने का बहाना है। हमारा नया साल तब होता है जब वसंत ऋतु आती है, नए पत्ते निकलते हैं, पेड़ पौधे फूलों से लदने लगते हैं, सरसों के खेत लुभाते हैं। मैंने कहा अब क्या अपना नया साल ज्योतिषी से पूछ कर मनाओगी। क्या हर्ज़ है, जब अमीर, पढ़े लिखे, नेता, अभिनेता, व्यवसायी शुभ मुहर्त, विवाह, व्यवसाय के लिए पचांग दिखवाते हैं तो जीवन का नया साल शुरू करने के लिए क्यूँ नहीं। मुझे डर भरी हैरानी हो रही थी कि यह भारतीय स्त्री कहां और क्यूं जा रही है। मैंने पूछा जनाब, मुझे बता सकती हैं कि हमारा नया साल कब होगा। घोषणा हुई, सही समय पर बताएंगे, ध्यान रखना उस दिन हम आपसे एक महंगी बनारसी साड़ी उपहार में लेंगे, जिसे पहनकर, ‘चल कहीं दूर निकल जाएं’, भी गाएंगे और जाएंगे भी। मुझे लग रहा था, आ रहा नया साल मेरा तो नहीं है। 

- संतोष उत्सुक