मेजर ध्यान चंद को मात दे पाना किसी के हाथ में नहीं

By हेमा पंत | Dec 03, 2018

मेजर ध्यान चंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को उत्तर प्रदेश के तबके इलाहाबाद में हुआ था। उनके पिता समेश्वर दत्त सिंह सेना में सिपाही थे। बचपन में मेजर ध्यान चंद को हॉकी के खेल में बिल्कुल रुचि नहीं थी, लेकिन उन्हें कुश्तीबाजी पंसद थी। मेजर ध्यानचंद ने अपनी शुरुआती शिक्षा इलाहाबाद में की। इसके बाद वह 16 साल की उम्र में सेना में भर्ती हो गये थे। सेना में भर्ती होने के बाद उनकी हॉकी के प्रति रुचि बढ़ने लगी। इसके पीछे का कारण मेजर ध्यान चंद के साथी तिवारी जी ने उन्हें हॉकी के लिए काफी प्रेरित किया था। ड्यूटी खत्म होने के बाद चांदनी रातो में मेजर ध्यान चंद हॉकी के खेल का अभ्यास करने लगे थे। धीरे-धीरे उनमें हॉकी का जूनून बढ़ने लगा। पहले उनका नाम ध्यान सिंह था लेकिन उनके साथी ने उनका नाम ध्यान सिंह से बदलकर ध्यान चन्द्र रख दिया था, क्योंकि वह हॉकी के खेल का अभ्यास चांदनी रात में किया  करते थे। अपनी लगन और मेहनत के चलते वह सेना में भी हॉकी के खेल में बेस्ट परफॉमेंस देते गये। अपने बेहतरीन प्रदर्शन के चलते उनके लगातार प्रमोशन हुए और उन्हें एक सिपाही से मेजर बना दिया गया था। इसके बाद साल 1926 में उन्होनें अपना पहला अंतराष्ट्रीय मैच खेला था। यह मैच न्यूजीलैंड के खिलाफ उनका पहला डेब्यू मैच था। अगले साल 1927 में लंदन फोक्स स्टॉक फेस्टिवल में उन्होंने ब्रिटिश हॉकी टीम के खिलाफ 10 मैचों में 72 में से 32 गोल किये थे।

1928 में नीदरलैंड में समर ओलपिंक में खेलते हुए उन्होंने 3-0 से जीतकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया था। इसके बाद साल 1932 में अमेरिका के लॉस एंजिल्स में हुए समर ओलपिंक में कमाल का प्रदर्शन करते हुए भारत ने अमेरिका को 24-1 से रौंदा था। इस खेल की बदौलत दूसरी बार भारत ने गोल्ड मेडल अपने नाम किया था। वहीं, ध्यान चंद्र ने इस साल 308 में से 133 गोल खुद मारे थे। इतना ही नहीं बल्कि ध्यान चंद्र तीन बार गोल्ड मेडल जीतने वाली हॉकी टीम के सदस्य भी रहे हैं। 

4 अगस्त 1936 में खेले गये बर्लिन ओलंपिक में उन्हें भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बनाया गया। कप्तान बनाए जाने पर उन्होंने कहा मुझे जरा सी भी उम्मीद नहीं थी कि मुझे भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बनाया जाएगा। सबसे पहले भारत ने हंगरी के खिलाफ 5 अगस्त को पहले मुकाबले में ताबड़तोड़ प्रदर्शन करते हुए 4 गोल से हंगरी को मात दिया था। फिर अगले ही दिन 7 अगस्त को भारत ने जापान को 9-0 से हराकर जीत हासिल की। इसके बाद भारत ने फ्रांस के खिलाफ 10 गोल करके जीत हासिल की। फिर अगला मैच 14 अगस्त को खेला जाना था, लेकिन भारी बारिश के चलते इस मैच को स्थगित कर दिया गया था। मैच के अभ्यास के दौरान भारत जर्मनी की टीम से हार गया था। इसी के चलते सभी खिलाड़ी निराश हो गये थे। ऐसे में भारतीय टीम के मैनेजर खिलाडियो के ड्रेसिंग रुम गये और उनके सामने भारत का झंडा रख दिया और कहा कि इसकी लाज अब तुम्हारे हाथो में है। सभी खिलाड़ियो नें तिरंगे को सलाम किया और फिर मैदान में कूद पड़े। इसी मैच में भारतीय खिलाडियो ने जर्मनी को 8-1 से हराया था और भारत को जीत दिलाकर सचमुच तिरंगे की लाज बचा ली गयी थी। मेजर ध्यान चंद ने अपने अदभुत खेल से जर्मनी के हिटलर तानाशाह, महान क्रिकेटर डॉल ब्रैडमैन को अपने खेल का दिवाना बना दिया था। क्रिकेट के महानायक डान ब्रैडमैन ने एक बार ध्यान चंद के सम्मान में कहा कि वह क्रिकेट के रनों की भांति गोल बनाते है।

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भारत एवं विश्व हॉकी के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में उनकी गिनती होती थी। साल 1948 तक मेजर ध्यान चंद ने अंतरष्ट्रीय मैचो में अपना योगदान दिया और फिर वह रिटायर हो गये। रिटायर होने के बाद भी वह आर्मी में होने वाले मैचों में अपना योगदान देते रहे। भारत सरकार द्वारा उन्हें 1956 में पद्मा विभूषण सम्मान से नवाजा गया। इसी के चलते उनके जन्म दिवस को खेल दिवस के रुप में मनाया जाने लगा। मेजर ध्यान चंद को लीवर कैंसर था और पैसों की कमी के चलते उनका इलाज सही ढंग से नहीं हो सका और उन्होंने दिल्ली के एम्स अस्पताल के जनरल वॉर्ड में दम तोड़ दिया।

- हेमा पंत

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