Gyan Ganga: अपने वास्तविक रूप में आकर लंकिनी राक्षसी से कैसे निबटे श्रीहनुमानजी ?

By सुखी भारती | Nov 23, 2021

श्रीहनुमान जी को क्रोध के ताप ने तनिक लाल-सा कर दिया था। कारण भी स्पष्ट था कि लंकिनी की दृष्टि में भेद था। वह एक संत को तो चोर कहने का साहस कर रही थी, लेकिन रावण कितना बड़ा चोर है, वह उसे दृष्टिपात ही नहीं हो पा रहा था। माना कि श्रीहनुमान जी लंका नगरी में चोरी-छुपे दाखिल हो रहे थे, लेकिन उनका लक्ष्य कोई चोरी करना नहीं था। अपितु वे तो साक्षात भक्ति अर्थात श्रीसीता जी की खोज में तत्पर थे। वहीं रावण तो ऐसा चोर था, कि उसने कोई इन्सान का घर तो छोड़िए, उसने तो भगवान का घर भी नहीं छोड़ा था। कहने को तो हम यहाँ भी कह सकते हैं, कि रावण भी तो फिर भक्ति, अर्थात श्रीसीता जी से ही मिलन चाह रहा था। फिर किस कारण रावण को निंदनीय की श्रेणी में रखें? और श्रीहनुमान जी को सम्मान की दृष्टि से देखें। निःसंदेह आपकी इस जिज्ञासा का समाधान होना भी आवश्यक है। सर्वप्रथम तो आप स्वयं से इमानदारी से पूछिए, कि क्या वाकई में श्रीहनुमान जी और रावण का दृष्टिकोण, माता सीता जी को लेकर समान था। उत्तर निश्चित ही नहीं है। कारण कि श्रीहनुमान जी श्री सीता जी को माता की दृष्टि से निहारते हैं, और रावण श्रीसीता जी को काम की दृष्टि से देखता है। पहला और बड़ा अंतर तो यही है, कि रावण सम्मान का नहीं, अपितु निरादर का पात्र है। दूसरे श्रीसीता जी को पाने के लिए कोई अगर इतना ही व्यग्र है, तो उसे सर्वप्रथम यह तो सुनिश्चित कर लेना चाहिए, कि भक्ति को पाना है, तो भक्ति पाने के लिए बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती, अपितु महान समर्पण से ही भक्ति को पाया जा सकता है। कहाँ तो रावण को चाहिए था, कि श्रीसीता जी की शरण में जाता, और विनयप्रद हो, नत्मस्तक भाव से प्रार्थना करता, कि हे माते! मुझ पापी जीव पर भी अपनी करुणामई दृष्टि का स्पर्श करें। मैंने लाख तपस्या, योग व हठ किए, लेकिन मन तो अभी भी कलुषित पापों से सना हुआ है। निःसंदेह ऐसी प्रार्थना रावण को कल्याण के मार्ग पर अग्रसर कर सकती थी। लेकिन रावण ने श्रद्धा, प्रेम व समर्पण का मार्ग न चुन कर बलात का मार्ग चुना। अब उसे कौन समझाये, कि पानी की सतह पर कलम से कोई चित्र थोड़ी न खींचे जाते हैं। क्योंकि ऐसे प्रयासों का कोई भविष्य नहीं हुआ करता है। लेकिन रावण क्या करता, उसने बिल्ली की भाँति खम्बे को कुरेदना नहीं छोड़ा। जिसका परिणाम था, कि रावण कहीं चढ़ तो निश्चित ही नहीं पाता, उल्टे उसके नाखुनों ने अवश्य घिस जाना था।

‘मुठिका एक महा कपि हनी।

रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।’

अब आगे क्या घटता है, जानेंगे अगले अंक में...(क्रमशः...)...जय श्रीराम।

-सुखी भारती

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