कनाडा-इंडोनेशिया-तुर्की-दक्षिण अफ्रीका, फिलिस्तीन के समर्थन में बोलने वालों का माइक कैसे हुआ ऑफ, क्या Mossad ने किया कोई खेल?

By अभिनय आकाश | Sep 24, 2025

फिलिस्तीनियों को जबरदस्ती पानी में ढकेलने वाली दुनिया अब उन्हें तिनके का सहारा देने आई है। 21 सितंबर को ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और पुर्तगाल ने फिलिस्तीन को देश के तौर पर मान्यता दे दी। अब बारी अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के 80वें सत्र की थी। जहां फिलिस्तीन के समर्थन में झंडा बुलंद करने वाले नेताओं के साथ एक अलग ही खेल हो गया। फिलिस्तीन के समर्थन में बयान देने वाले नेताओं का माइक अचानक ही उनके संबोधन के दौरान ऑफ हो गया। ऐसा किसी एक नेता के साथ होता तो इसे संयोग कहकर नजरअंदाज किया जा सकता था। लेकिन चार बड़े नेताओं के साथ ये घटना घटित हुई। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांटो भी इससे प्रभावित हुए। इस वाक्या ने तमाम तरह की अटकलों को जन्म दिया है। 

कनाडा ने फिलिस्तीन को मान्यता देने का किया ऐलान और फिर

सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला व्यवधान कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के संबोधन के दौरान आया। कनाडा द्वारा फ़िलिस्तीन राज्य को मान्यता देने की घोषणा करने के ठीक बाद प्रतिनिधियों की तालियों से गूंजते हुए, उनका माइक्रोफ़ोन बंद हो गया। एक उपस्थित व्यक्ति ने बाद में मज़ाक में कहा कि मान्यता ज़ोर से और साफ़ सुनाई दी, भले ही माइक्रोफ़ोन बंद न हुआ हो। बाद में, संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों ने इस विफलता के लिए महासभा हॉल के अंदर उपकरणों में तकनीकी समस्याओं को जिम्मेदार ठहराया, तथा इस बात पर जोर दिया कि किसी बाहरी हस्तक्षेप का कोई संकेत नहीं था।

भड़क गए रामाफोसा

दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा के साथ भी यही घटना घटी. उन्होंने जैसे ही फिलिस्तीन का मुद्दा उठाया, माइक ऑफ हो गया। दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में मतदान के दौरान इज़राइल की कड़ी निंदा की और गाज़ा में इज़राइल की कार्रवाई को नरसंहार बताया और दुनिया से फ़िलिस्तीनी राज्य को मान्यता देने का आग्रह किया। रामफोसा ने ज़ोर देकर कहा कि इज़राइल-फ़िलिस्तीनी संघर्ष का एकमात्र समाधान 1967 की सीमाओं पर आधारित द्वि-राज्य समाधान है और उन्होंने तत्काल युद्धविराम, बंधकों की रिहाई और फ़िलिस्तीनी राज्य के मार्ग में आने वाली बाधाओं को हटाने की माँग की। जिसमें इज़राइल की अलगाव दीवार भी शामिल है। उन्होंने फ़िलिस्तीनी पीड़ा और दक्षिण अफ़्रीका के रंगभेद के इतिहास के बीच समानता का भी ज़िक्र किया।

मोसाद ने किया खेल?

फिलिस्तीन के समर्थन में बोलने वाले नेताओं के माइक बंद होने की घटना ने तमाम तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं। दावा किया जा रहा है कि आखिर हर बार फिलिस्तीन के समर्थन पर ही माइक क्यों बंद हुआ? कई देशों के नेता मानते हैं कि यह संयोग नहीं हो सकता। चूंकि इजरायल फिलिस्तीन को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ते समर्थन को बर्दाश्त नहीं कर सकता, इसलिए शक की सुई उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद पर टिक गई है।

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