बंगाल की राजनीति में क्या है दरगाह फुरफुरा शरीफ का महत्व? ओवैसी के लिए क्यों जरूरी हैं अब्बास सिद्दीकी?

By अंकित सिंह | Jan 08, 2021

चुनावी मौसम में धर्म की बात ना हो तो बड़ा अटपटा लगता है। राजनेता धर्म के जरिए ही चुनाव का माहौल बनाते हैं और अपने पक्ष में समीकरण साधने की कोशिश करते हैं। भारत में तो हर पार्टी जातीय और धार्मिक समीकरणों को साधने की कोशिश के हिसाब से ही चुनावी मैदान में उतरती हैं। जब से एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ने का ऐलान किया है तब से राज्य की राजनीति को लेकर अलग-अलग समीकरण बन रहे है। माना जा रहा है कि ओवैसी के मैदान में कूदने से ममता बनर्जी को जहां नुकसान होगा वहीं भाजपा फायदे में जा सकती है। ओवैसी भी पश्चिम बंगाल की मुस्लिम मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए वहां अभी से ही रणनीति बनाने में जुट गए है। अपने मिशन बंगाल की शुरुआत उन्होंने फुरफुरा शरीफ के दौरे से की। अपने इस दौरे के दौरान उन्होंने धार्मिक नेता अब्बास सिद्दीकी से भी मुलाकात की। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर अपने इस दौरे की शुरुआत उन्होंने अब्बास सिद्दीकी से मुलाकात करने के साथ ही क्यों की? इस विषय पर बताने से पहले हम आपको धार्मिक स्थल फुरफुरा शरीफ के बारे में बताते हैं।

 

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फुरफुरा शरीफ हुगली जिले से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर है और उससे बंगाली मुसलमानों की एक बड़ी आस्था जुड़ी हुई है। फुरफुरा शरीफ का ऐतिहासिक महत्व भी है। माना जाता है कि 1375 में इस मस्जिद का निर्माण कराया गया था। यहां हजरत अबू बकर सिद्दीकी की और उनके पांच बेटों की मजार भी है। अबू बकर सिद्दीक अपने वक्त के सबसे बड़े समाज और धर्म सुधारक माने गए थे। उनके जिंदा रहने के दौरान जितने तादाद में प्रशंसक थे, उससे ज्यादा उनके निधन के बाद हुए। हजरत अबू बकर की याद में हर साल यहां पर उर्स का आयोजन होता है और लाखों श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं। इस प्रकार के जो पीरजादा होते हैं, उन्हें हजरत अबू बकर सिद्दीकी का ही वंशज माना जाता है। पीर का वंशज होने के नाते पीरजादों का दरगाह के प्रति आस्था रखने वालों के बीच बहुत ही सम्मान होता है।

 

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असदुद्दीन ओवैसी ने अपने मिशन बंगाल की शुरुआत अब्बास सिद्दीकी से मुलाकात के साथ की। 38 साल के अब्बास सिद्दीकी की दरगाह के पीरजाद हैं। लेकिन वह यहां अकेले पीरजादा नहीं हैं। लेकिन उनका महत्व इसलिए है क्योंकि वह राजनीतिक रूप से सक्रिय रहते हैं। उन्हें एक समय ममता के समर्थकों में से एक माना जाता था। हालांकि अब वह ममता सरकार पर जमकर बरसते हैं। स्थानीय लोग यह भी बताते हैं कि सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलन में अब्बास सिद्दीकी ने अहम भूमिका निभाई थी। तभी ममता बनर्जी सत्ता के शिखर तक पहुंचीं। फिलहाल अब्बास सिद्धकी टीम से सरकार और ममता बनर्जी पर मुस्लिम हितों की अनदेखी करने का आरोप लगा रहे हैं। असदुद्दीन ओवैसी से मुलाकात के बाद उन्होंने बताया कि वह उनके पुराने फैन है। उन्होंने दावा किया कि अब तक तो ओवैसी बंगाल की राजनीति से दूर थे लेकिन अब वह बंगाल आ गए हैं। तो ऐसे में अब मुसलमानों की आवाज को और भी ज्यादा मजबूती मिलेगी।

 

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बिहार के पूर्वांचल में 5 सीटें जीतने के बाद ओवैसी की पार्टी उत्साहित है। उसे बंगाल के मुस्लिम बहुल जिलों में आने वाले विधानसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है। हालांकि जब से ओवैसी ने बंगाल चुनाव लड़ने का ऐलान किया है राजनीतिक विश्लेषक इसे ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका मान रहे हैं। माना जा रहा है कि जिस तरीके से ओवैसी के लड़ने से बिहार में महागठबंधन को नुकसान हुआ था और भाजपा फायदे में थी। वैसा ही कुछ बंगाल में भी देखने को मिल सकता है। आपको बता दें कि बंगाल के मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और बीरभूम में मुस्लिमों की आबादी काफी ज्यादा है। उत्तर और दक्षिण 24 परगना में भी मुस्लिमों की आबादी अच्छी खासी है। राज्य की लगभग 70 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में माने जाते हैं। यही कारण है कि एक ओर जहां ममता बनर्जी मुसलमानों को साधने में लगातार जुटी हुई रहती हैं। तो वहीं ओवैसी ने चुनाव लड़ने का ऐलान कर उनके लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। खास बात यह है कि अब्बास सिद्धकी के रास्ते मुसलमानों को ओवैसी भावनात्मक तौर पर भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

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