By अभिनय आकाश | Oct 30, 2026
एक दौर था जब विकासशील देशों को पश्चिमी दुनिया की शर्तों, उनके नियमों और उनके दबाव में समझौते करने पड़ते थे। लेकिन अब 21वीं सदी का यह नया भारत है जो अपनी शर्तों पर बात करता है। अपनी ताकत के बल पर एजेंडे सेट करता है और बराबरी की मेज पर दुनिया के सबसे बड़े गठबंधनों से हाथ भी मिलाता है। आज की भू राजनीतिक हकीकत देखिए। यूरोप ऊर्जा संकट युद्ध के साए और धीमी होती आर्थिक रफ्तार से जूझ रहा है। वहीं दूसरी तरफ भारत 7% से ज्यादा की जीडीपी विकास दर के साथ पूरी दुनिया के लिए उम्मीद का सबसे बड़ा इंजन बना हुआ है। इसी जमीनी हकीकत का नतीजा यह है कि 27 विकसित देशों का संगठन यानी यूरोपीय संघ भारत के साथ सबसे बड़ा व्यापारिक समझौता करने के लिए बेकरार है। कनाडा के मॉन्ट्रियल से इस वक्त की सबसे बड़ी कूटनीतिक खबर सामने आ रही है। दरअसल यूरोपियन काउंसिल के प्रेसिडेंट एंटोनियो कोस्टा ने सार्वजनिक मंच से पुष्टि कर दी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 दिसंबर से ठीक पहले बेल्जियम की राजधानी ब्रूसेल्स पहुंच रहे हैं। मकसद साफ है पीएम मोदी के पहुंचने का भारत और यूरोपीय संघ के बीच ऐतिहासिक फीट ट्रेड एग्रीमेंट पर आधिकारिक और अंतिम दस्तखत करना। यह सिर्फ कागजों पर लिखी इबारत नहीं होगी। यह 2 अरब से अधिक लोगों का एक ऐसा साझा बाजार बनने जा रहा है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के 25% हिस्से को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा।
वैसे कूटनीति सिर्फ शब्दों से नहीं चलती है बल्कि ठोस आंकड़ों से चलती है और जब आप भारत और यूरोपीय संघ के व्यापारिक आंकड़ों को देखेंगे तो आप अच्छे से बखूबी समझ जाएंगे कि यूरोप भारत के बिना आगे क्यों नहीं बढ़ सकता है।
वित्तीय वर्ष साल 204-25 में भारत और यूरोप के बीच गुड्स का द्विपक्षीय व्यापार 11.5 लाख करोड़ यानी लगभग 136.54 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। भारत के दबदबे यानी कि ट्रेड सरप्लस की बात करें तो कुल व्यापार में भारत का निर्यात 6.4 लाख करोड़ यानी लगभग 75.85 अरब रहा। जबकि यूरोप से भारत का आयात $5.1 लाख करोड़ यानी लगभग 60.68 अरब डॉलर था। यानी भारत शुद्ध लाभ की स्थिति में है।
साल 2024 में दोनों पक्षों के बीच सेवाओं का व्यापार 7.2 लाख करोड़ यानी करीब 83.10 अरब डॉलर दर्ज किया गया। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यूरोपीय संघ दूसरी दोनों मिलकर दुनिया की 25% जीडीपी है और वैश्विक व्यापार के 1/3 हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। अब आप खुद सोचिए जब ये दोनों दिग्गज बाजार शून्य या न्यूनतम टेरिफ पर एक दूसरे से जुड़ जाएंगे तो उन देशों पर क्या होगा जो अब तक यूरोप में भारतीय सामान को मात देने की कोशिश कर रहे थे। अब इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को केवल एक सामान्य व्यापारिक समझौते की नजर से देखना बहुत बड़ी भूल होगी। भारत ने इस मेज पर अपनी तीन सबसे बड़ी शर्तें मनवा दी हैं यूरोप के सामने यानी 27 देशों के संगठन के सामने। पहली जीत 99% भारतीय उत्पादों के लिए यूरोपीय बाजार खुला। भारत ने ट्रेड वैल्यू के हिसाब से अपने 99% से अधिक एक्सपोर्ट्स के लिए यूरोपीय संघ में टैक्स फ्री या न्यूनतम टेरिफ एंट्री सुरक्षित की है। इसका सबसे बड़ा फायदा हमारे लेबर इंटेंसिव सेक्टर को मिलेगा। जैसे टेक्सटाइल, गारमेंट्स, लेदर इंडस्ट्री, जेम्स एंड ज्वेलरी, मरीन प्रोडक्ट्स और हैंडीक्राफ्ट। साथ ही भारत के इंजीनियरिंग गुड्स और फार्मासटिकल सेक्टर को यूरोप के 27 देशों में खुला मैदान मिल जाएगा। यह प्रधानमंत्री मोदी के मेक इन इंडिया विज़न के लिए सबसे बड़ा बूस्टर डोज है। अब दूसरी जीत की बात कर लेते हैं। कुशल प्रोफेशनल्स के लिए सीमलेस मोबिलिटी फ्रेमवर्क। यूरोप हमेशा सामान के आयात पर तो सहमत था लेकिन जब भारतीय प्रोफेशनल्स के आने जाने की बात आती है तो सख्त वीजा नियम आड़े आ जाते थे। भारत ने इस बार सख्त रुख अपनाया और इस समझौते में एक व्यापक मोबिलिटी फ्रेमवर्क शामिल किया। इसका मतलब यह है कि हमारे आईटी प्रोफेशनल, डाटा साइंटिस्ट, रिसर्चर्स, इंजीनियर्स और हेल्थ केयर वर्कर्स अब बिना जटिल कानूनी अड़चनों के यूरोप में सेवाएं दे सकेंगे। भारत की तो वो है चाइना प्लस वन नीति का सबसे बड़ा लाभार्थी बना भारत। पिछले कुछ वर्षों में यूरोप संकट और ताइवान तनाव ने यूरोप को यह सिखा दिया, बता दिया कि सप्लाई चेन के लिए किसी एक अधिनायकवादी मुल्क पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता है।