By नीरज कुमार दुबे | Jun 23, 2026
पश्चिम एशिया की बदलती शक्ति राजनीति के बीच भारत के लिए एक जबरदस्त रणनीतिक अवसर उभरता दिखाई दे रहा है। संयुक्त अरब अमीरात अब भारत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और आकाशतीर वायु रक्षा प्रणाली खरीदने पर गंभीर बातचीत कर रहा है। यह खाड़ी क्षेत्र की बदलती सामरिक दिशा का खुला संकेत है। देखा जाये तो यह वही क्षेत्र है जहां पाकिस्तान दशकों तक इस्लामी सैन्य एकजुटता के नाम पर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करता रहा, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं।
हम आपको बता दें कि ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज परिचालन सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल मानी जाती है। इसे जमीन, समुद्र और हवा तीनों माध्यमों से दागा जा सकता है। भारत और रूस ने मिलकर इसे विकसित किया है। फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया के बाद यदि संयुक्त अरब अमीरात इसे खरीदता है तो यह भारत के रक्षा निर्यात इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल होगा। इससे भारत केवल हथियार बेचने वाला देश नहीं बल्कि वैश्विक सामरिक संतुलन बनाने वाला शक्ति केंद्र बनकर उभरेगा।
आकाशतीर प्रणाली की चर्चा भी बेहद महत्वपूर्ण है। यह भारत की स्वदेशी स्वचालित वायु रक्षा नियंत्रण प्रणाली है, जिसे भारतीय सेना और भारत इलेक्ट्रोनिक्स लिमिटेड ने विकसित किया है। हाल के संघर्षों में ड्रोन और मिसाइल हमलों ने जिस तरह युद्ध की तस्वीर बदल दी है, उसके बाद खाड़ी देश अपनी वायु सुरक्षा को लेकर बेहद सतर्क हो गए हैं। ईरान, इजराइल और क्षेत्रीय संघर्षों के कारण पूरा पश्चिम एशिया अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे माहौल में संयुक्त अरब अमीरात ऐसी रक्षा प्रणाली चाहता है जो तेज, सटीक और बहुस्तरीय सुरक्षा दे सके।
सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संयुक्त अरब अमीरात अब केवल अमेरिका या पश्चिमी देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहता। वह अपने रक्षा आपूर्तिकर्ताओं का दायरा बढ़ा रहा है ताकि किसी एक शक्ति के दबाव में न आना पड़े। भारत उसके लिए आदर्श विकल्प बनकर उभरा है क्योंकि भारत तकनीकी रूप से सक्षम है, तेजी से उभरती सैन्य शक्ति है और पश्चिम के साथ भी उसके अच्छे संबंध हैं।
यहीं पर पाकिस्तान की बेचैनी शुरू होती है। दशकों तक पाकिस्तान खाड़ी देशों के लिए सैन्य सहयोगी बना रहा। पाकिस्तानी सेना ने सऊदी अरब और खाड़ी देशों में प्रशिक्षण से लेकर सुरक्षा तक में भूमिका निभाई। लेकिन अब वही खाड़ी देश भारत की सैन्य तकनीक पर भरोसा दिखा रहे हैं। यह पाकिस्तान की रणनीतिक हार है।
देखा जाये तो संयुक्त अरब अमीरात के पाकिस्तान से दूर जाने के पीछे केवल सामरिक कारण नहीं हैं, बल्कि भरोसे का संकट भी है। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली, कट्टरपंथी संगठनों को लेकर उसकी खराब छवि, आतंकवाद को लगातार समर्थन और राजनीतिक अस्थिरता ने खाड़ी देशों का विश्वास कमजोर किया है। संयुक्त अरब अमीरात को यह समझ आ गया है कि पाकिस्तान भरोसेमंद साझेदार नहीं रह गया, जबकि भारत एक स्थिर, मजबूत और तेजी से उभरती वैश्विक शक्ति बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान के बीच बनी व्यक्तिगत केमिस्ट्री ने दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। मोदी के कार्यकाल में भारत और संयुक्त अरब अमीरात के संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि रक्षा, ऊर्जा, निवेश, आतंकवाद विरोधी सहयोग और समुद्री सुरक्षा तक फैल गए। यही वजह है कि आज अबू धाबी को भारत केवल हथियार बेचने वाला देश नहीं, बल्कि ऐसा रणनीतिक साथी नजर आ रहा है जो संकट की घड़ी में मजबूती से साथ खड़ा रह सकता है।
इसके अलावा, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के रिश्तों में हाल के वर्षों में तनाव बढ़ा है। तेल उत्पादन, यमन नीति, क्षेत्रीय नेतृत्व और आर्थिक प्रतिस्पर्धा जैसे कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद सामने आए हैं। ऐसे में यदि सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ गहरे रक्षा संबंध बना रहा है तो संयुक्त अरब अमीरात का भारत की ओर झुकाव एक संतुलनकारी रणनीति के रूप में देखा जा सकता है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अब खाड़ी की राजनीति दो अलग ध्रुवों की तरफ बढ़ रही है। एक तरफ सऊदी अरब और पाकिस्तान का पारंपरिक सामरिक समीकरण है, तो दूसरी तरफ संयुक्त अरब अमीरात भारत के साथ नई रणनीतिक धुरी बनाता दिख रहा है। भारत के लिए यह स्थिति बेहद लाभकारी है क्योंकि इससे उसे पश्चिम एशिया में अभूतपूर्व सामरिक पहुंच मिल सकती है।
भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पिछले वर्ष पाकिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान ब्रह्मोस के प्रभावी उपयोग ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। इसके बाद कई देशों ने इस मिसाइल में रुचि दिखाई। थाईलैंड, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और चिली जैसे देश भी इसे खरीदने की इच्छा जता चुके हैं। यानी भारत अब केवल हथियार आयात करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार का निर्णायक खिलाड़ी बन चुका है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2026 में समाप्त वित्तीय वर्ष में भारत का रक्षा निर्यात चार अरब डॉलर के पार पहुंच गया, जबकि 2013-14 में यह केवल 7.26 करोड़ डॉलर था। यह उछाल बताता है कि भारत की रक्षा तकनीक अब विश्व स्तर पर भरोसेमंद मानी जा रही है।
बहरहाल, यदि संयुक्त अरब अमीरात के साथ यह समझौता अंतिम रूप लेता है तो इसके कई दूरगामी परिणाम होंगे। एक तो इससे भारत की सामरिक साख अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचेगी। साथ ही पाकिस्तान को यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि खाड़ी में उसका एकाधिकार खत्म हो चुका है। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में भारत की सैन्य और कूटनीतिक मौजूदगी और मजबूत होगी।
-नीरज कुमार दुबे