PM Modi की UAE, UK, Canada, Japan, Egypt, Korea, Italy, Germany के नेताओं के साथ बैठक से भारत को क्या फायदा हुआ?

प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय मुलाकातों का जिक्र करें तो आपको बता दें कि उनकी संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाह्यान के साथ हुई मुलाकात ने भारत और पश्चिम एशिया के बीच बढ़ती रणनीतिक निकटता को और मजबूत किया।
फ्रांस के एवियन में आयोजित जी-7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां अपने धारदार और दूरदर्शी भाषण से दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा, वहीं कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मुलाकातों के जरिए भारत की रणनीतिक ताकत और वैश्विक स्वीकार्यता को भी नई ऊंचाई दी। वैश्विक संकट, पश्चिम एशिया का तनाव, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखलाओं का संकट तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी की स्पष्ट और संतुलित सोच ने विश्व नेताओं को प्रभावित किया। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया अब दानदाता और प्राप्तकर्ता की मानसिकता से आगे बढ़कर समान भागीदारी और विश्वास पर आधारित सहयोग की दिशा में आगे बढ़े। यही कारण रहा कि जी-7 सम्मेलन में भारत केवल सहभागी देश नहीं, बल्कि समाधान प्रस्तुत करने वाली शक्ति के रूप में उभरा।
यूएई के साथ द्विपक्षीय वार्ता
प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय मुलाकातों का जिक्र करें तो आपको बता दें कि उनकी संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाह्यान के साथ हुई मुलाकात ने भारत और पश्चिम एशिया के बीच बढ़ती रणनीतिक निकटता को और मजबूत किया। वर्ष 2026 में दोनों नेताओं की यह तीसरी मुलाकात थी, जो दोनों देशों के बीच गहरे विश्वास और तेजी से मजबूत हो रहे संबंधों का प्रमाण है। बैठक में प्रौद्योगिकी, व्यापार, निवेश, ऊर्जा और रक्षा सहयोग पर गंभीर चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पश्चिम एशिया में स्थायी शांति और स्थिरता के लिए संवाद, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान बेहद आवश्यक है। प्रधानमंत्री मोदी ने होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित और निर्बाध व्यापारिक आवाजाही की आवश्यकता को रेखांकित किया, क्योंकि यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की धुरी माना जाता है। इस मुलाकात का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद को भारत में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने का निमंत्रण दिया। यह कदम भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके जरिए वह पश्चिम एशिया और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ बहुआयामी गठजोड़ को मजबूत कर रहा है।
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ब्रिटेन के साथ द्विपक्षीय वार्ता
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। दोनों नेताओं ने भारत-ब्रिटेन संबंधों को वर्ष 2035 की साझा दृष्टि के अनुरूप और गति देने पर सहमति जताई। व्यापार, हरित ऊर्जा, रक्षा, तकनीक, शिक्षा और नवाचार जैसे क्षेत्रों में तेजी से बढ़ते सहयोग की समीक्षा की गई। व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते को शीघ्र लागू करने पर विशेष जोर दिया गया। शिक्षा क्षेत्र में भी भारत को बड़ी उपलब्धि मिली, क्योंकि लिवरपूल विश्वविद्यालय द्वारा बेंगलुरु में परिसर स्थापित करने और यॉर्क तथा ब्रिस्टल विश्वविद्यालयों द्वारा मुंबई में अपने परिसरों को स्थापित करने की दिशा में हुई प्रगति का स्वागत किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली में आयोजित एआई समिट में ब्रिटेन की सक्रिय भागीदारी की सराहना की। दोनों देशों ने महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति शृंखला वेधशाला की शुरुआत को भविष्य की आर्थिक और सामरिक साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार बताया। यूक्रेन और पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी दोनों नेताओं के बीच गहन चर्चा हुई। यह बैठक साफ संकेत देती है कि भारत और ब्रिटेन अब पारंपरिक संबंधों से आगे बढ़कर तकनीकी और सामरिक सहयोग के नए युग में प्रवेश कर चुके हैं।
कनाडा के साथ द्विपक्षीय वार्ता
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात ने दोनों देशों के संबंधों में नई गर्माहट पैदा की। पिछले कुछ वर्षों में उतार-चढ़ाव देखने वाले भारत-कनाडा संबंध अब स्थिरता और सहयोग की नई दिशा में आगे बढ़ते दिखाई दिए। दोनों नेताओं ने ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत बनाने के लिए साझा सहयोग बढ़ाने पर बल दिया। तरलीकृत प्राकृतिक गैस, रसोई गैस और कोयले से जुड़े व्यापारिक समझौतों में हुई प्रगति पर संतोष जताया गया। व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को इसी वर्ष अंतिम रूप देने का साझा लक्ष्य भी तय किया गया। रक्षा और सुरक्षा सहयोग को नई मजबूती देने के लिए सामान्य सुरक्षा सूचना समझौते पर वार्ता शुरू करने का निर्णय महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, कौशल विकास और प्रतिभा आदान-प्रदान को लेकर भी दोनों देशों ने नए अवसर तलाशने पर सहमति जताई। भारत द्वारा हिंद महासागर क्षेत्रीय संगठन में कनाडा को संवाद सहयोगी बनाने का समर्थन देना भी भारत की व्यापक समुद्री रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
कई अन्य द्विपक्षीय वार्ताएं
इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान, जर्मनी, मिस्र, केन्या और दक्षिण कोरिया के नेताओं के साथ भी महत्वपूर्ण मुलाकातें कर भारत की वैश्विक कूटनीति को नई मजबूती दी। जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के साथ बातचीत में व्यापार, निवेश और भविष्य की आर्थिक साझेदारी को और गहरा करने पर जोर दिया गया। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी से मुलाकात में दोनों देशों की ऐतिहासिक मित्रता और रणनीतिक सहयोग को नई गति देने पर चर्चा हुई। वहीं केन्या के राष्ट्रपति विलियम समोई रुटो के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लोबल साउथ की साझा आकांक्षाओं और विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्यांग के साथ हुई वार्ता में व्यापार, प्रौद्योगिकी और भविष्य की उभरती तकनीकों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। इन मुलाकातों ने साफ कर दिया कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एशिया, अफ्रीका और ग्लोबल साउथ को जोड़ने वाला निर्णायक नेतृत्व बन चुका है।
हम आपको यह भी बता दें कि जी-7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का भाषण सबसे अधिक चर्चा में रहा। उन्होंने साफ कहा कि आज ऊर्जा, स्वास्थ्य, खाद्य और आर्थिक सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारी अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है। प्रधानमंत्री ने चेतावनी दी कि व्यापार और तकनीक का संकीर्ण हितों के लिए दुरुपयोग वैश्विक विश्वास को कमजोर कर रहा है। उन्होंने कोरोना महामारी का उदाहरण देते हुए पारदर्शिता और भरोसे पर आधारित वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता बताई। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की विकास यात्रा को “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” के मंत्र से जोड़ते हुए वित्तीय समावेशन, डिजिटल पहचान, स्वास्थ्य सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण की उपलब्धियों को दुनिया के सामने रखा। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी वैश्विक एकजुटता की सबसे बड़ी बाधा है। पश्चिम एशिया संकट के कारण ईंधन, उर्वरक और खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं पर पड़े असर का जिक्र करते हुए उन्होंने ग्लोबल साउथ के गरीब और कमजोर देशों की चिंता उठाई। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संकट का बोझ केवल कमजोर देशों पर नहीं छोड़ा जा सकता और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं को विकासशील देशों की सहायता के लिए मजबूत तंत्र विकसित करना होगा।
इस सम्मेलन में चीन के बढ़ते निर्यात और वैश्विक बाजारों पर उसके प्रभाव को लेकर भी गंभीर चर्चा हुई। सस्ते उत्पादों के जरिए दुनिया के बाजारों में बढ़ती चीनी पैठ को लेकर पश्चिमी देशों में चिंता दिखाई दी। इस पूरे विमर्श के बीच भारत एक संतुलित और भरोसेमंद आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ भारत की बात रखी, उसने यह संदेश दिया कि आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक और सामरिक संतुलन में भारत की भूमिका और अधिक निर्णायक होने वाली है। प्रधानमंत्री की इन द्विपक्षीय मुलाकातों से भारत को ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार विस्तार, तकनीकी सहयोग, रक्षा साझेदारी और वैश्विक मंचों पर राजनीतिक समर्थन जैसे कई सामरिक लाभ मिले हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि विश्व व्यवस्था को दिशा देने वाली जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित किया। उनकी सक्रिय और दूरदर्शी कूटनीति ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बदलती वैश्विक राजनीति में भारत अब निर्णायक भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।
-नीरज कुमार दुबे
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