By अभिनय आकाश | Mar 18, 2026
28 फरवरी 2026 को इजराइल और यूएस ने मिल कर ईरान के ऊपर हमला किया। उम्मीद यह थी कि 24 घंटे के अंदर 48 घंटे के अंदर 72 घंटे के अंदर सब कुछ तितर-बितर हो जाएगा। रिजीम चेंज हो जाएगा। अब्बास अरागची कहते हैं एक फौजी अफसर के बारे में जिसका नाम है मोहम्मद अली जाफरी। यह मोहम्मद अली जाफरी ईरान की फौज का आईआरजीसी का एक अफसर है। और यह बैठ के पढ़ता है। यह नोट करता है। यह एक टीम बनाता है। और जो भी हुआ है ईरान के इर्द-गिर्द, ईरान के पूरब, पश्चिम, उत्तर दक्षिण जहां पे भी कॉन्फ्लिक्ट हुई है, ये जो है बंदा पढ़ रहा है, स्टडी कर रहा है। ये उससे सीख ले रहा है। दरअसल, जब 28 फरवरी को बम गिराए गए और इनको पता लग गया था कि भाई सुप्रीम लीडर हमारा खत्म हो गया और टॉप 50 लोग हैं उसके साथ खाक में हो गए।
अयातुल्ला खामनेई के बाद उनके बेटे मोजतबा को सुप्रीम लीडर बनाया गया। लेकिन उसके बाद से ही उनको लेकर तरह तरह की खबरें सामने आने लगी। ईरान ने कोई प्रूफ प्रोवाइड नहीं किया कि ये जिंदा हैं। वो कभी लाइव टीवी पर नहीं आए। कोई पब्लिक अपीरियंस नहीं दिखा। कोई वीडियो रिकॉर्डिंग भी नहीं है। अब लोग कह रहे हैं कि या तो बहुत गंभीर रूप से वो घायल हो गए हैं। कुछ लोग ये भी कह रहे हैं किवो मर गए हैं। लेकिन एक फिगर चाहिए होता है कि इसके फिगर के पीछे कौम खड़ी हो जाएगी। लोग खड़े हो जाएंगे। लिहाजा सुप्रीम लीडर मर गए लेकिन मोजतबा खामेनेई को हमने खड़ा कर दिया गया। वो किस हालत में है? है भी कि नहीं है। कोई नहीं जानता। लेकिन ऐससी परिस्थिति के लिए ईरान तैयारी कर रहा था और पिछले 30 साल से ये तैयारी चल रही थी।इन्होंने सारी कॉन्फ्लिक्ट्स जो है मिडिल ईस्ट में यानी पूरी दुनिया भर में भी सब की सब इन्होंने स्टडी करी कि किस तरीके से अमेरिका आता है। एक खास पैटर्न है। अमेरिका आएगा, बमबारी करेगा। इतनी बमबारी करेगा सब कुछ नेस्तनाबूत हो जाएगा। वो सरकार अपने आप गिर जाएगी। लोग आएंगे दे विल टेक ओवर फिर बाद में ये लोग डील करेंगे।
मोजेक डॉक्ट्रिन ने एक सिंपल सी चीज करी है। ईरान को अलग अलग हिस्सों में विभाजित कर दिया है। इन्होंने अलग-अलग पार्ट्स में। कुछ लोग कहते हैं 31 पार्ट्स। 31 पार्ट्स। मीडिया 31 पार्ट्स की बात कर रहा है। कुछ लोग कह रहे है 28 पार्ट्स हैं। कुछ लोग कहे रहे है 25 पार्ट्स है। लेकिन ये अहम नहीं है बल्कि इन पार्ट्स की फिलॉसोफी अहम है। यानी कि हर एक पार्ट जो है जो कि एक ज्योग्राफिकल पार्ट है जो कि एक फोर्स के अंडर है,वो इंडिपेंडेंट है। यह सबसे खतरनाक चीज है। मान लेते है 31 पार्ट्स हैं वो इंडिपेंडेंट हैं। किसी को नहीं पता कि लेफ्ट वाला क्या कर रहा है, राइट वाला क्या कर रहा है। अब कॉमन सेंस ये कहती है कि जब उन्हीं को नहीं पता कि बगल वाला क्या कर रहा है तो अमेरिका को कैसे पता लगेगा? जीत आपकी तब होती है जब आपका एक टारगेट हो और आपको पता है आप उस टारगेट से मजबूत हैं। आप उस टारगेट से मजबूत हैं। जैसे वहां पर सद्दाम हुसैन टारगेट था। मजबूत टारगेट था। सद्दाम हुसैन के बाद कहानी खत्म हो गई। ऐसे ही मोहम्मद गद्दाफी के मारे जाने के बाद कहानी खत्म हो गई। इतना प्रेशर लाए अहमद अलशरा से बर अल असद पर कि उन्हें मॉस्को भागना पड़ा। ऐसा ही पैटर्न वेनेजुएला के अंदर हुआ। लेकिन ये ईरान में नहीं चला सिर्फ और सिर्फ मोजेक डॉक्ट्रिन की वजह से।
नॉर्थ ईरान में है इसको यह नहीं पता कि वेस्ट ईरान में क्या चल रहा है। उसको पता ही नहीं है। उसके पास अपने ड्रोंस हैं। उसके अपनी कनेक्टिविटी है जिसके साथ उसकी होनी चाहिए। उसके पास अपनी मिसाइल्स हैं, क्रूज मिसाइल्स हैं, बैलस्टिक मिसाइल हैं। सबका अलग-अलग मामला है। प्रोडक्शन फैसिलिटीज हैं। मोजेक डॉक्ट्रिन जीत के लिए नहीं है। इस वॉर में ईरान जीत नहीं सकता। लेकिन हार भी नहीं सकता। ये मोजेक डॉक्ट्रिन वाला वॉर है उस वॉर का मीनिंग ये है कि अमेरिका को अगर जीत मिलती भी है तो वो उसके खुद के नुकसान के साथ मिलेगी। इसे आप इस उदाहरण के साथ समझ सकते हैं कि आप किसी के साथ गए लड़ने के लिए। आप लड़ उसके पास तलवार आपके पास तलवार ठीक है आपने उसको हरा दिया। आपने हरा तो दिया लेकिन मरते-मरते उस आदमी ने आपका एक बाजू काट दिया। आप जीत तो गए लेकिन उस जीत का आपने इतना बड़ा दाम दिया कि आपके मन में विचार आया कि यार इससे बेहतर तो लड़ाई नहीं लड़ता। अगर विक्ट्री हो जाती है अमेरिका को तो इतना कलेश हो जाए, इतना नुकसान हो जाए, इकॉनमी इतनी बर्बाद हो जाए कि होश ठिकाने आ जाएंगे।
मोज़ेक डिफेंस में समय इसलिए बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसमें लड़ाई को लंबा खींचना ही एक रणनीति बन जाती है। उदाहरण के लिए, शाहेद ड्रोन जैसे ड्रोन बनाना सस्ता होता है, लेकिन उन्हें रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली मिसाइलें और डिफेंस सिस्टम बहुत महंगे होते हैं। इससे एक ऐसी स्थिति बनती है जहां हमला करना सस्ता और बचाव करना महंगा पड़ता है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक चलती रहे, तो मजबूत देश को भी लगातार ज्यादा खर्च करना पड़ता है और धीरे-धीरे उस पर आर्थिक दबाव बढ़ने लगता है। यही कारण है कि इस रणनीति में धैर्य, हथियारों का भंडार, विकेंद्रीकरण और दुश्मन को धीरे-धीरे थकाने पर जोर दिया जाता है, ताकि समय के साथ विरोधी पक्ष के लिए युद्ध जारी रखना मुश्किल और महंगा हो जाए।