Iran के प्रभावशाली धार्मिक नेता Ayatollah Abdollah Javadi Amoli ने Trump के खिलाफ उगली आग, बढ़ते संघर्ष के बीच Modi ने दिया बड़ा बयान

By नीरज कुमार दुबे | Mar 05, 2026

पश्चिम एशिया इस समय भीषण युद्ध की आग में झुलस रहा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तेजी से बढ़ता सैन्य टकराव अब पूरे क्षेत्र को अस्थिर करने लगा है। मिसाइलों की बारिश, ड्रोन हमले और समुद्र में युद्धपोतों की भिड़ंत ने हालात को बेहद विस्फोटक बना दिया है। बढ़ती हिंसा के बीच हजारों लोगों की जान जा चुकी है, कई शहरों से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है और वैश्विक व्यापार तथा तेल आपूर्ति पर भी गंभीर असर पड़ने लगा है।

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दूसरी ओर इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने कहा है कि अमेरिका उनके सैन्य अभियान के पीछे पूरी तरह खड़ा है। उन्होंने बताया कि अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के साथ हुई बातचीत में उन्हें स्पष्ट संदेश मिला कि अभियान को अंत तक जारी रखा जाए और अमेरिका उनके साथ है। इस बयान से संकेत मिलता है कि दोनों देशों का सैन्य अभियान अभी और तेज हो सकता है।

हालांकि अमेरिका और इजरायल के हमलों के बावजूद ईरान लगातार जवाबी कार्रवाई कर रहा है। ईरान ने पश्चिम एशिया के कई हिस्सों में ड्रोन और मिसाइल हमले जारी रखे हैं। इससे अमेरिका और उसके सहयोगियों के सामने नई चुनौती पैदा हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि हवाई रक्षा प्रणाली पर दबाव बढ़ रहा है और यदि मिसाइल अवरोधक हथियारों का भंडार कम पड़ गया तो स्थिति और जटिल हो सकती है।

हम आपको बता दें कि अमेरिका और उसके सहयोगी कई तरह की मिसाइल रोधी प्रणालियों का उपयोग करते हैं जिनमें थाड अवरोधक, पैट्रियट मिसाइल प्रणाली और नौसेना की मानक मिसाइलें शामिल हैं। इजरायल भी लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए एरो प्रणाली का इस्तेमाल करता है। लेकिन इन प्रणालियों के भंडार पर पहले से दबाव बना हुआ है। बड़ी संख्या में हथियार यूक्रेन में रूस के हमलों से बचाव के लिए भेजे जा चुके हैं, जबकि लाल सागर में भी जहाजों की सुरक्षा के लिए तैनाती की गई है। इसके अलावा हिंद प्रशांत क्षेत्र में दक्षिण कोरिया और ताइवान की सुरक्षा के लिए भी इन प्रणालियों को लगाया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2025 में हुए 12 दिन के इजरायल ईरान संघर्ष में ही अमेरिका के थाड अवरोधकों के लगभग एक चौथाई भंडार का उपयोग हो चुका था।

दूसरी ओर, युद्ध अब जमीन और हवा के साथ समुद्र तक फैल चुका है। अमेरिका की एक पनडुब्बी ने हिंद महासागर में ईरान के एक युद्धपोत को डुबो दिया जिसमें 87 नाविकों की मौत हो गई। इस घटना के एक दिन बाद ईरान का एक और युद्धपोत श्रीलंका के समुद्री क्षेत्र की ओर बढ़ता देखा गया है। श्रीलंका की सरकार इस मामले पर विचार कर रही है कि जहाज को सुरक्षा के लिए अपने जलक्षेत्र में प्रवेश की अनुमति दी जाए या नहीं। वहीं गाले शहर के अस्पताल में हमले से बचाए गए 32 ईरानी नाविकों का कड़ी सुरक्षा में इलाज चल रहा है।

इस बीच ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने फारस की खाड़ी में अमेरिका से जुड़ा एक तेल टैंकर निशाना बनाने का दावा किया है। ईरानी मीडिया के अनुसार नौसेना की कार्रवाई में जहाज में आग लग गई। हालांकि नुकसान और हताहतों की पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। इस हमले से क्षेत्र में तेल परिवहन और समुद्री व्यापार पर खतरा और बढ़ गया है।

वहीं संघर्ष का असर दूसरे देशों पर भी पड़ने लगा है। अजरबैजान ने आरोप लगाया है कि ईरान की ओर से आए ड्रोन उसके नाखिचेवन क्षेत्र में घुस आए और एक हवाई अड्डे तथा एक स्कूल के पास गिरकर नुकसान पहुंचाया। इस हमले में दो नागरिक घायल हो गए। अजरबैजान के विदेश मंत्रालय ने ईरान के राजदूत को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया है और चेतावनी दी है कि जरूरत पड़ने पर जवाबी कदम उठाए जाएंगे।

वहीं युद्ध का आर्थिक प्रभाव भी तेजी से सामने आ रहा है। इजरायल के वित्त मंत्रालय के अनुसार यह युद्ध हर सप्ताह लगभग तीन अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर नुकसान पहुंचा सकता है। इजराइल में सुरक्षा कारणों से सार्वजनिक सभाओं, शिक्षा गतिविधियों और अधिकांश कार्यस्थलों पर रोक लगा दी गई है, जिससे आर्थिक गतिविधियां काफी प्रभावित हुई हैं। मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि सुरक्षा बनाए रखते हुए धीरे धीरे व्यापार और कामकाज को फिर से शुरू करने के उपाय किए जाएं।

उधर, तेहरान में लगातार बमबारी जारी है और संयुक्त राष्ट्र के अनुसार राजधानी से हजारों लोग पलायन कर चुके हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत के बाद नए नेतृत्व की खोज ने देश की राजनीतिक स्थिति को और अनिश्चित बना दिया है। अब तक ईरान में एक हजार से अधिक लोगों के मारे जाने की खबर है जबकि लेबनान और इजरायल में भी दर्जनों लोगों की जान जा चुकी है।

उधर, अमेरिका में सीनेट के रिपब्लिकन सदस्यों ने राष्ट्रपति ट्रम्प की युद्ध शक्तियों को सीमित करने के प्रस्ताव को रोक दिया है, जिससे सैन्य अभियान जारी रखने के लिए राजनीतिक समर्थन का संकेत मिला है। हालांकि व्हाइट हाउस का कहना है कि फिलहाल जमीनी सैनिक भेजने की योजना नहीं है, लेकिन भविष्य के विकल्प खुले रखे गए हैं।

दूसरी ओर, इस बढ़ते तनाव के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि किसी भी समस्या का समाधान केवल सैन्य संघर्ष से नहीं हो सकता। फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब के साथ वार्ता के बाद उन्होंने कहा कि भारत कानून के शासन, संवाद और कूटनीति में विश्वास करता है और पश्चिम एशिया या यूक्रेन जैसे क्षेत्रों में शांति स्थापित करने के हर प्रयास का समर्थन करेगा।

कुल मिलाकर देखें तो अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता यह युद्ध केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि इसके प्रभाव अंतरराष्ट्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और वैश्विक सुरक्षा पर भी गहराई से पड़ते दिखाई दे रहे हैं।

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