Jantar Mantar हो गया छू मंतर, प्रदर्शन करना है तो Ramlila Maidan, Burari Ground या CBD Ground जाना पड़ेगा

By नीरज कुमार दुबे | Oct 12, 2026

दिल्ली की सड़कों पर जाम, सार्वजनिक स्थलों पर भीड़ और आम नागरिकों की रोजमर्रा की परेशानियों को नजरअंदाज करके लोकतंत्र की कोई व्यावहारिक व्यवस्था नहीं चल सकती। इसी संदर्भ में जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का फैसला प्रशासनिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इस फैसले की असली परीक्षा केवल यह नहीं कि दिल्ली को कितनी राहत मिलती है, बल्कि यह भी है कि विरोध करने वाले नागरिकों के लिए कितने प्रभावी विकल्प उपलब्ध रहते हैं।

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देखा जाये तो जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों के कारण आसपास के यातायात, सुरक्षा व्यवस्था और जनजीवन पर पड़ने वाले दबाव को देखते हुए वैकल्पिक स्थलों की व्यवस्था करना एकदम सही कदम है। आखिर दिल्ली केवल राजनीतिक दलों, आंदोलनों और प्रदर्शनकारियों की नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की भी है जिन्हें रोज काम पर पहुंचना, कारोबार चलाना और सामान्य जीवन जीना है। लोकतंत्र का मतलब यह नहीं कि एक वर्ग की सुविधा के लिए दूसरे वर्ग की परेशानियों को हमेशा अनदेखा किया जाए।

लेकिन इस फैसले का एक ऐतिहासिक संदर्भ भी है। हम आपको याद दिला दें कि पहले जंतर मंतर की जगह इंडिया गेट स्थित बोट क्लब प्रदर्शन स्थल हुआ करता था। 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में करीब पांच लाख किसान दिल्ली के बोट क्लब के लॉन में जुटे थे। 1993 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने वहां सभाओं पर रोक लगा दी थी। इस फैसले के खिलाफ व्यापक प्रतिक्रिया हुई। 23 फरवरी 1993 को भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने प्रतिबंध को चुनौती दी। उस समय प्रस्तावित भाजपा रैली के खिलाफ कार्रवाई के बाद गिरफ्तारियां हुईं, बैरिकेडिंग लगी और संसद परिसर में भी विरोध देखने को मिला। इसके बाद जंतर-मंतर विरोध-प्रदर्शनों के प्रमुख ठिकानों में उभरा। उसकी सीमित क्षमता और प्रवेश-निकास के अपेक्षाकृत आसान रास्तों के कारण प्रदर्शनों को नियंत्रित करना प्रशासन के लिए भी सुविधाजनक था।

हम आपको यह भी बता दें कि जंतर मंतर संबंधी विवाद ने आज न्यायिक मोड़ भी ले लिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने जंतर-मंतर को शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए बंद किए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई से इंकार करते हुए मामला 13 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध किया है। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर विचार कर रहा है और उसने केंद्र सरकार से हलफनामा दाखिल करने को कहा है। कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को दबाया जा रहा है और कार्यपालिका ने कानूनी तरीके से विरोध करने के लिए कोई वैकल्पिक स्थल निर्धारित नहीं किया है। उन्होंने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर असर डालने वाला मामला बताया और 1975 के दौर का संदर्भ देते हुए इस दिन को काला दिन कहा।

दूसरी ओर, कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने आरोप लगाया है कि जंतर-मंतर को पहले ही ‘वॉर जोन’ बना दिया गया था और अब पूरा देश जंतर-मंतर बनेगा। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि आज जंतर-मंतर को सूची से हटाया गया है, कल लोकतंत्र को ही सूची से बाहर कर दिया जाएगा।

वहीं सीजेपी नेता सौरव दास ने इसे शांतिपूर्ण सभा के अधिकार पर हमला बताया और पूछा कि क्या गृह मंत्रालय ने नागरिकों, संगठनों तथा अन्य संबंधित पक्षों से परामर्श किया था। अशुतोष रांका ने नए प्रदर्शन स्थलों पर कटाक्ष करते हुए सवाल किया कि माउंट एवरेस्ट को ही प्रदर्शन स्थल क्यों न घोषित कर दिया जाए? देखा जाये तो यहां सीजेपी नेताओं से कुछ सीधे सवाल हैं। क्या हर प्रशासनिक पुनर्व्यवस्था लोकतंत्र पर हमला है? क्या सरकार को सीजेपी से पूछ कर नये प्रदर्शन स्थलों के बारे में फैसला लेना पड़ेगा?

बहरहाल, जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने से दिल्ली को राहत मिलती है या नहीं, इसका आकलन यातायात, सुरक्षा और सार्वजनिक जीवन पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव से होना चाहिए। दिल्ली को अव्यवस्था से राहत मिलनी ही चाहिए। प्रदर्शनकारियों को यह समझना होगा कि विरोध का अधिकार लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। इसकी वैधता वहीं तक है, जहां तक विरोध दूसरों के अधिकारों, उनकी आवाजाही, आजीविका और सामान्य जनजीवन को अनुचित रूप से बाधित न करे। लोकतंत्र में अपनी आवाज बुलंद करने की स्वतंत्रता किसी दूसरे की जिंदगी ठप कर देने का लाइसेंस नहीं हो सकती।

-नीरज कुमार दुबे

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