संतोष मूरत की 'साहब, मैं ज़िंदा हूँ' वाली तख्ती से गृह मंत्रालय के ताले तक, जंतर-मंतर की अनकही कहानी

दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को आधिकारिक विरोध-प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया है। इसके बदले अब राजधानी में रामलीला मैदान, सीबीडी ग्राउंड और बुराड़ी ग्राउंड को प्रदर्शन के लिए नया विकल्प बनाया गया है। वहीं जंतर-मंतर पर धरने रोकने के इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी गई है।
कागज़ पर मरा हुआ एक इंसान जब खुद के ज़िंदा होने की सनद मांगने देश की चौखट पर आया, तो उसने जंतर मंतर के फुटपाथ को अपना ठिकाना बनाया। हाथों में मैं जिंदा हूं साहब वाली तख्ती और कड़कड़ाती ठंड में सीने से चिपका हुआ एक लावारिस भूरा कुत्ता। मानो मुंशी प्रेमचंद की पूस की रात का हल्कू और जबरा, दिल्ली के दिल में सालों तक इंसाफ की पहरेदारी करते रहे। नाम संतोष मूरत सिंह। यह वही सड़क है, जहाँ सिर्फ संतोष नहीं, बल्कि मुल्क के हर उस कोने की आवाज़ पहुँची, जिसे अपनी ही ज़मीन पर बेगाना कर दिया गया था। सवाई जयसिंह ने सदियों पहले पत्थरों के इस अजूबे को ग्रहों और तारों की चाल नापने के लिए तराशा था। इन्हें भला इस बात का क्या इल्म होगा कि आदाज हिंदुस्तान में ये खगोलीय वेधशाला एक दिन मुल्क के दर्द का थर्मामीटर बन जाएगा। दशक दर दशक बदलते रहे। लेकिन लाल-बलुआ पत्थर और ईंटों से बना जंतर-मंतर महज स्माक नहीं अपितु 140 करोड़ हिंदुस्तानियों की असहमति की सबसे बड़ी पनाहगाह बन गया। एक ऐसा ठिकाना जहां लोकतंत्र के हाशिए पर खड़ा सबसे कमजोर इंसान भी तख्त पर बैठे हुक्मरानों की आंखों में आंखे डालकर सवाल कर सके। लेकिन अब पत्थरों की यह सड़क खामोश हो जाएगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लेते हुए जंतर मंतर को आधिकारिक प्रोटेस्ट साइट्स की सूची से डिनोटिफाई कर दिया है। यानी लोकतंत्र का वह मशहूर कोना, जहाँ तख्तियों की इबारतें हुकूमतों की नींद उड़ा दिया करती थीं, अब हमेशा के लिए खाली करा लिया गया है। वाल सिर्फ एक जगह के बंद होने का नहीं है। सवाल यह है कि जब असहमति की सबसे पहचानी जाने वाली चौखट ही मिटा दी जाए, तो वो संतोष मूरत सिंह, वो किसान, वो छात्र और वो मजदूर ब अपनी फरियाद लेकर किस देहरी पर दस्तक देंगे?
इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar नहीं रहा अब 'प्रोटेस्ट साइट', गृह मंत्रालय का बड़ा फैसला, तय किए ये 3 नए स्थान
क्या है नया फैसला
दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह की सूची से हटा दिया है और ऐसी सभाओं के लिए तीन दूसरी जगहों के नाम बताए हैं। यह कदम 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के साथ शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की इजाज़त को लेकर चल रहे विवाद और 'इंडिया ब्लॉक' के सुप्रीम कोर्ट तक प्रस्तावित मार्च से पहले राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी किए जाने के बीच उठाया गया है। 1 अक्टूबर, 2026 के एक आदेश के मुताबिक, नई तय की गई तीन जगहें हैं। पुरानी दिल्ली में रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली में CBD ग्राउंड और उत्तरी दिल्ली में बुराड़ी ग्राउंड। गौरतलब है कि ये तीनों जगहें मध्य दिल्ली में स्थित जंतर-मंतर से क्रमशः 3 किमी, 13.5 किमी और 44 किमी दूर हैं। दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के हस्ताक्षर वाले इस आदेश में 28 अप्रैल, 2022 के उस पुराने आदेश में कुछ बदलाव किए गए हैं, जिसके तहत जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की जगह के तौर पर तय किया गया था। पुलिस ने कहा कि तीन नई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन और रैलियों के आयोजन से जुड़े विस्तृत और संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) अलग से जारी किए जाएंगे।
इसे भी पढ़ें: Jantar Mantar बंद होने के खिलाफ याचिका, 13 अक्टूबर को सुनवाई करने को तैयार दिल्ली HC
हाई कोर्ट जंतर-मंतर बंद करने के मामले में याचिका पर सुनवाई करेगा
दिल्ली हाई कोर्ट 13 अक्टूबर को उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर को बंद करने के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया था कि प्रदर्शनों के लिए कोई वैकल्पिक जगह तय नहीं की गई है। कोर्ट ने 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एक अलग याचिका को भी मंगलवार के लिए सूचीबद्ध किया, लेकिन तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इस मामले को देख रहा है और उसने केंद्र सरकार से हलफनामा मांगा है।
इसे भी पढ़ें: Delhi Police को अल्टीमेटम: Jantar Mantar पर Peaceful Protest के लिए CJP ने दी 24 घंटे की डेडलाइन
महाराजा जय सिंह द्वितीय की सोच
महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय न केवल एक शासक थे, बल्कि गणित और खगोल विज्ञान में गहरी रुचि रखने वाले विद्वान भी थे। 18वीं सदी की शुरुआत में, उन्होंने खगोलीय घटनाओं के बारे में ज़्यादा सटीक जानकारी की ज़रूरत को समझा और पूरे भारत में कई वेधशालाएँ बनवाईं। दिल्ली का जंतर-मंतर उनके द्वारा बनाई गई पाँच वेधशालाओं में से एक था; बाकी वेधशालाएँ जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में स्थित थीं। इन वेधशालाओं को खगोलीय तालिकाओं को बेहतर बनाने और आकाशीय गतिविधियों की ज़्यादा सटीक माप करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। जय सिंह द्वितीय के प्रयासों से वैज्ञानिक आदान-प्रदान के एक दौर की झलक मिलती है, जिसमें भारतीय खगोलीय परंपराओं का फ़ारसी, इस्लामी और यूरोपीय स्रोतों के ज्ञान से मेल हुआ। उनकी वेधशालाएँ अवलोकन और गणना के केंद्र बन गईं, जहाँ वैज्ञानिक तरीकों और वास्तुकला के नए प्रयोगों का संगम हुआ।
जहाँ वास्तुकला और खगोल विज्ञान का मिलन होता है
रहने या पूजा-पाठ के लिए बनाई जाने वाली पारंपरिक इमारतों से अलग, जंतर-मंतर को एक विशाल वैज्ञानिक उपकरण के तौर पर बनाया गया था। हर संरचना का एक खास मकसद था। आकाशीय पिंडों की गति को देखने के लिए इनके कोण और माप बहुत सावधानी से तय किए गए थे।
दिल्ली वेधशाला की सबसे खास संरचना 'सम्राट यंत्र' है। यह एक विशाल धूप-घड़ी है, जिसका इस्तेमाल सूरज की परछाई की गति को ट्रैक करके स्थानीय समय का पता लगाने के लिए किया जाता था। इसके विशाल आकार की वजह से खगोलविद ज़्यादा सटीकता के साथ अवलोकन कर पाते थे। एक और ज़रूरी यंत्र 'जय प्रकाश यंत्र' है, जिसमें कटोरे के आकार के दो हिस्से होते हैं। इनकी मदद से खगोलशास्त्री आकाशीय पिंडों की स्थिति का पता लगाते थे। बेलनाकार आकृतियों से बने 'राम यंत्र' का इस्तेमाल तारों और दूसरे खगोलीय पिंडों की ऊंचाई और दिशा मापने के लिए किया जाता था। ये सभी यंत्र मिलकर यह दिखाते हैं कि किस तरह वैज्ञानिक जानकारी को ऐसी भौतिक संरचनाओं में बदला गया, जिनका अध्ययन और इस्तेमाल किया जा सकता था।
18वीं सदी में आसमान को समझना
आधुनिक टेलीस्कोप और डिजिटल टेक्नोलॉजी के आने से पहले के दौर में जंतर-मंतर जैसी वेधशालाओं ने ब्रह्मांड को समझने में अहम भूमिका निभाई। खगोलशास्त्री आकाशीय गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए गणितीय गणनाओं और सावधानी से बनाए गए उपकरणों पर निर्भर रहते थे। ऐसी जगहों पर की गई खोजों और अवलोकनों से ज़्यादा सटीक कैलेंडर बनाने और ग्रहों की चाल के बारे में जानकारी बेहतर करने में मदद मिली। खगोल विज्ञान को रोज़मर्रा की ज़िंदगी से अलग नहीं माना जाता था; इसने खेती, त्योहारों, समुद्री यात्रा और समय बताने के तरीकों को प्रभावित किया।स जंतर-मंतर वैज्ञानिक अवलोकन और समाज के बीच इसी संबंध को दिखाता है और बताता है कि कैसे आसमान के अध्ययन ने इंसानी समझ को आकार दिया। जैसे-जैसे दिल्ली देश का राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र बनी, जंतर-मंतर धीरे-धीरे लोगों की आवाज़ उठाने की जगह के तौर पर पहचाना जाने लगा। इसकी खुली बनावट की वजह से लोग यहाँ व्यवस्थित ढंग से इकट्ठा हो सकते थे, और इसके ऐतिहासिक माहौल ने इस जगह को एक खास पहचान दी। जंतर-मंतर में आया यह बदलाव दिखाता है कि कैसे ऐतिहासिक जगहों का मतलब पीढ़ियों के साथ बदलता रहता है। मूल रूप से खगोलीय पिंडों की गति के अध्ययन के लिए बनाया गया यह स्मारक नागरिक भागीदारी से जुड़ गया, जिससे इसके सांस्कृतिक महत्व में एक और आयाम जुड़ गया।
33 साल से धरने देख रहा था जंतर-मंतर
1988 में किसान आंदोलन के बाद बोट क्लब पर प्रदर्शन रोक दिए गए थे। इसके बाद 1993 में जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन हुआ था। जंतर-मंतर को धरना स्थल बनाने संबंधी किसी आदेश का रिकॉर्ड नहीं है। यह पुलिस की प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ। स्थानीय लोगों की शोर, प्रदूषण जैसी शिकायतों पर एनजीटी ने 2017 में यहां प्रदर्शन रोक दिए। धरने-प्रदर्शन रामलीला मैदान में करने को कहा। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट ने प्रतिबंध हटाकर नियंत्रित प्रदर्शन की व्यवस्था बनाने को कहा। अब सुप्रीम कोर्ट में फिर वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की मांग लंबित है।
अन्य न्यूज़













