By मृत्युंजय दीक्षित | Jun 13, 2026
भारतीय निशानेबाजी के महारथी और कोच जसपाल राणा के असामयिक निधन से सभी ओर शोक व्याप्त है। मात्र 49 वर्ष में चले जाना निश्चय ही ह्रदय विदारक है। देश के लिए अपूरणीय क्षति है। जसपाल निशानेबाजी के ऐसे पुरोधा थे जिन्होंने कॉमनवेल्थ खेलों में 15 पदक जीतकर भारत का मान बढ़ाया, स्वयं एशियाई खेलों और ओलपिंक में देश का प्रतिनिधित्व करने के बाद नई पीढ़ी को तैयार करने में जुट गए। इस समय वे युवा निशानेबाज मनु भाकर के गुरु थे। जसपाल राणा को अर्जुन पुरस्कार, पद्मश्री और द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह भारतीय खेल इतिहास के सबसे चमकदार व होनहार निशानेबाज थे। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में जन्मे जसपाल राणा को उनके पिता नारायण सिंह राणा ने बीएसएफ अधिकारी द्वारा प्रशिक्षित करवाया था। 12 वर्षीय राणा ने अहमदाबाद में 31वीं राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप से राष्ट्रीय निशानेबाजी में पदार्पण किया था। तब किसी ने यह नहीं सोचा था कि एक दिन यह छोटा बालक इतना करिश्माई निकलेगा।
जसपाल ने कई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में अद्भुत व शानदार प्रदर्शन कर भारत का मस्तक गर्व से ऊंचा किया। 1994 मिलान विश्व शूटिंग चैंपियनशिप में उनकी जीत यादगार रही। उन्होंने यह जीत दर्द से कराहते हुए प्राप्त की थी। प्रतियोगिता से एक दिन पहले उन्हें घुटने में फोड़ा हो गया था और डॉक्टरो ने उन्हें सर्जरी की सलाह देकर अस्पताल से छुट्टी देने से मनाकर दिया था किंतु उन्होंने राष्ट्रप्रथम की भावना को ध्यान में रखा और डॉक्टरों की सलाह को दरकिनार करते हुए प्रतियोगिता मे भाग लेने का निश्चय किया किंतु अस्पताल से निकलने के बाद उसी रात फोड़ा फूट गया और उनका दर्द बढ़ गया। वे अपनी जींस तक नहीं उतार पा रहे थे। ऐसे में उन्होंने जीन्स को फाड़कर ही हाफ पैंट बनाई और उसे पहनकर ही अगली सुबह प्रतियोगिता में उतरे। राणा ने असहनीय दर्द में मैच खेला और जूनियर कैटेगरी में विश्व रिकार्ड के साथ अपना पहला अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीता। इसी वर्ष उन्होंने हिरोशिमा एशियाई खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता था। 1994 में हिरोशिमा एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद जसपाल को इसी वर्ष मात्र 18 वर्ष की अवस्था में अर्जुन पुरस्कार मिला।
जसपाल राणा का जीवन खेल व राष्ट्र के प्रति समर्पित रहा। वह हर बार रेंज पर उतरते समय देश का गौरव अपने साथ लेकर चलते थे। एक खिलाड़ी के रूप में तो उनका कैरियर शानदार रहा। दूसरी पारी में वह एक अच्छे प्रशिक्षक बने। उनके मार्गदर्शन में मनु भाकर ने पेरिस ओलंपिक में दो पदक जीते। उन्होंने सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला और चिंकी यादव सहित कई अन्य निशानेबाज़ो के कैरियर को संवारने में अहम भूमिका निभाई ।
जसपाल राणा की उपलब्धियों ने देश को ख़ुशी से झुमने का अवसर दिया। अगली पीढ़ी को गढ़ा। उनकी लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड के लोकप्रिय गीतकार नरेंद्र सिंह नेगी ने जसपाल के नाम से वर्ष 1999 में एक गीत बनाया था। मात्र 49 वर्ष की अवस्था में जसपाल का जाना एक शून्य उत्पन्न कर गया है। अभी तो बहुत कुछ करना था जसपाल.....इतनी जल्दी क्यों की जाने की ?
- मृत्युंजय दीक्षित