कर्ज़ की रजाई दान का कंबल

By पीयूष पांडे | Feb 10, 2020

दिल्ली की बदनाम सर्दी अब बेवफा भी हो चुकी है। मकर संक्रांति गुज़रने के बावजूद ठंड यहां उसी तरह रात में ताल ठोंककर खड़ी हो जाती है, जिस तरह चुनाव से पहले टिकट के इच्छुक दावेदार पार्टी मुख्यालय पर बोरिया बिस्तर लेकर जम जाते हैं। आलाकमान के समझाने के बावजूद उम्मीदवार आसानी से नहीं लौटते। उसी तरह दिन में सूर्य देव के नियमित दर्शन के बावजूद रात की ठंड नहीं जा रही। ऐसा लग रहा कि दिन और रात दो अलग ध्रुव हैं या कांग्रेस-बीजेपी सरीखी दो पार्टियां, जिनके बीच कोई सिरा नहीं जुड़ता।

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मैंने कहा- "कर्ज पर रजाई ? रजाई वास्तव में बहुत महंगी हो गई है। और रजाई है तो फटेगी ही।" वो बोला- "महंगी रजाई तो 1991 में बिकी थी, जब सिविल वॉर के जमाने की एक रजाई की नीलामी करीब दो करोड़ रुपए की हुई थी। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का के अंतराष्ट्रीय रजाई अध्ययन केंद्र में आज भी रखी है। आप चाहें तो देख आएं। आपकी रजाई की कीमत आज भले जो हो, 100 साल बाद बहुत हो सकती है।''

मैं दुकानदार के सामान्य ज्ञान से प्रभावित था। हिन्दुस्तान में लोग अलग अलग पेशेवरों की अलग अलग छवि निर्मित कर लेते हैं और जब छवि टूटती है तो झटका लगता है। मसलन-रिक्शेवाला अचानक धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने लगे तो कौतुहल का विषय हो जाता है। किसी मलाईदार विभाग का कोई क्लर्क ईमानदारी से आपका काम करा दे तो आश्चर्य होता है। मैं भी रजाई वाले के सामान्य ज्ञान से अभिभूत था। मुझे अचानक उसके चेहरे पर वो तेज नजर आया, जो दो मिनट पहले तक नदारद था। मुझे एक पल को लगने लगा कि वो मार्क्स की थ्योरी से लेकर नागरिकता संशोधन कानून तक सब विषयों का जानकार है।

मैंने उससे सीधे कहा- "भाई, इतनी महंगी रजाई खरीदने वाला पैसे नहीं हैं। अच्छी जुगाड़ बताओ।"

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वो बोला- "मामला ठंड का ही है तो ये देखिए दान के कंबल। इन्हें ले जाइए। दो रजाइयों की जगह चार कंबल ले जाइए। आपका काम भी हो जाएगा और आपके बजट में भी आ जाएंगे।"

मैं शालीन शब्दों में मुंह पर बेइज्जती करने के उसके गुण से भी अब अभिभूत था।

पीयूष पांडे

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