Dev Deepawali पर Varanasi के घाटों पर उमड़ा श्रद्धा का महासमुद्र, भव्यता-दिव्यता देख देवता भी हुए होंगे अभिभूत

By नीरज कुमार दुबे | Nov 05, 2025

वाराणसी की धरती पर हर वर्ष देव दीपावली का पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था, अनुशासन और सांस्कृतिक आत्मबोध का जीवंत रूप है। इस वर्ष की देव दीपावली ने काशी को एक बार फिर उस रूप में लौटा दिया, जहाँ धर्म केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना का सामूहिक अनुभव बन गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में आयोजित इस वर्ष की देव दीपावली वास्तव में “दिव्य और भव्य भारत” की झलक थी। ‘क्लीन काशी, ग्रीन काशी, डिवाइन काशी’ की अवधारणा पर आधारित यह आयोजन केवल दीपों का समुद्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बना— ऐसा पुनर्जागरण जो भारतीय आत्मा को पुनः प्रकाशित करता है।

हम आपको बता दें कि देव दीपावली से पहले ही आयोजित गंगा महोत्सव (1 से 4 नवंबर) ने इस बार पूरी काशी को रंगों, रागों और रसों से भर दिया था और जब 5 नवंबर की शाम गंगा तट पर दीपदान आरंभ हुआ— तब बनारस सचमुच “देवताओं की दीपावली” बन गया। हजारों दीपों से जगमगाते दशाश्वमेध, चेत सिंह, राजघाट, नमो घाट और विश्वनाथ घाट ने मिलकर यह साबित किया कि जब परंपरा और आधुनिकता का संगम होता है, तो संस्कृति केवल बचती नहीं, निखरती है।

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इस बार की देव दीपावली में न केवल भव्यता दिखी, बल्कि व्यवस्था का अनुकरणीय उदाहरण भी सामने आया। भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा, स्वच्छता, स्मार्ट लाइटिंग, सीसीटीवी और ड्रोन मॉनिटरिंग संबंधी व्यवस्थाएँ धरातल पर दिखाई दीं। साथ ही श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए घाटों पर पेयजल, शौचालय, प्राथमिक उपचार केंद्र और कंट्रोल रूम की चौबीसों घंटे व्यवस्था रही। यह वही काशी थी जो कभी संकरी गलियों और अव्यवस्था के लिए जानी जाती थी, लेकिन अब “प्रकाश और अनुशासन की राजधानी” बन चुकी है।

चेत सिंह घाट पर लेज़र शो और गंगा तट पर ग्रीन आतिशबाज़ी ने दर्शकों को अभिभूत किया।इस आयोजन ने यह स्पष्ट किया कि योगी सरकार की “प्रबंधन आधारित श्रद्धा” की नीति ने धार्मिक आयोजनों को नई दिशा दी है जहाँ आस्था और प्रशासन साथ-साथ चलते हैं। देखा जाये तो योगी सरकार के लिए काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि “भारत की आत्मा का प्रतीक स्थल” है। चाहे काशी विश्वनाथ धाम परियोजना का नवोन्मेष हो या गंगा महोत्सव और देव दीपावली का विस्तार, यह स्पष्ट है कि सरकार केवल धार्मिक आयोजन नहीं कर रही, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का राष्ट्रीय अभियान चला रही है।

काशी में इस बार के आयोजन में स्थानीय कलाकारों, विद्यालयों, महिला समूहों, स्वयंसेवी संस्थाओं और धर्माचार्यों की भी सक्रिय भागीदारी रही। हर घाट पर लोकगायन, शास्त्रीय संगीत, और नृत्य की प्रस्तुतियाँ हुईं। यह केवल उत्सव नहीं था, बल्कि यह “संस्कृति का लोकव्यापी पुनर्जन्म” था। देव दीपावली की सबसे सुंदर झलक इस बार नाविक समुदाय के सम्मान में दिखी। इसके अलावा, “क्लीन काशी, ग्रीन काशी, डिवाइन काशी”, यह नारा इस बार केवल होर्डिंग्स पर नहीं, बल्कि पूरे आयोजन के संचालन में दिखाई दिया।

देखा जाये तो काशी की देव दीपावली ने भारत को यह संदेश दिया कि आधुनिकता और अध्यात्म विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। योगी आदित्यनाथ की सरकार ने धार्मिक आयोजन को केवल “श्रद्धा” तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे स्मार्ट प्रबंधन, सुरक्षा और जनसहभागिता के साथ जोड़ा है। काशी ने फिर सिद्ध किया कि वह केवल एक नगर नहीं, बल्कि भारत की सनातन आत्मा का धाम है। काशी की देव दीपावली इस सत्य की पुनर्पुष्टि है कि जब परंपरा व्यवस्था से जुड़ती है, तो संस्कृति केवल जीवित नहीं, अमर हो जाती है।

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