दोबारा कभी इस्तीफा नहीं दूंगा, 2015 में ये वादा करने वाले केजरीवाल अपनी बात से क्यों मुकरे?

By नीरज कुमार दुबे | Sep 16, 2024

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा देने का ऐलान करते हुए जनता से ‘‘ईमानदारी का प्रमाणपत्र’’ मिलने तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठने का संकल्प लिया है। यदि उनके इस संकल्प को राजनीतिक आधार पर देखें तो इसमें कुछ गलत नहीं है लेकिन अगर केजरीवाल के इस संकल्प को नैतिकता के आधार पर देखें तो बहुत सारे सवाल खड़े होते हैं। पहला सवाल यही है कि जब सरकार का कार्यकाल छह महीने से भी कम का बचा है तब इस्तीफा देने का ऐलान क्यों किया गया? सवाल यह है कि जेल से छह महीने तक सरकार चलाने का रिकॉर्ड केजरीवाल ने क्यों बनाया? केजरीवाल ने इस साल मार्च में तभी इस्तीफा क्यों नहीं दिया जब उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा जा रहा था? केजरीवाल ने आबकारी नीति मामले में दिल्ली सरकार को अदालत की फटकारों के बाद ही इस्तीफा क्यों नहीं दिया? केजरीवाल को यदि अपनी ईमानदारी पर जनता की मुहर ही लगवानी थी तो उन्होंने ईडी की ओर से पूछताछ के लिए भेजे गये पहले समन में ही अपनी उपस्थिति क्यों नहीं दर्ज कराई थी? क्यों केजरीवाल ने ईडी के आठ समनों की अनदेखी की थी? संविधान और कानून को सर्वोपरि मानने की बात कहने वाले केजरीवाल ने क्यों ईडी के बुलावे को गंभीरता से नहीं लिया था? लोकसभा चुनावों के दौरान जब जनता ने आम आदमी पार्टी के 'जेल का जवाब वोट से' अभियान को खारिज कर दिया तभी केजरीवाल ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया था? केजरीवाल ने इस्तीफा तब क्यों नहीं दिया था जब गर्मियों के दौरान दिल्ली की जनता पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रही थी? केजरीवाल ने इस्तीफा तब क्यों नहीं दिया था जब दिल्ली में बारिश का पानी भर जाने से छात्रों की कोचिंग सेंटर में डूब कर या सड़क पर चलते हुए करंट लग कर मौत हो रही थी? सवाल यह भी उठता है कि मनीष सिसोदिया के जेल जाते ही उनसे इस्तीफा लेने वाले केजरीवाल ने वही नीति अपने लिये क्यों नहीं अपनाई थी? 

सवाल यह भी है कि 2015 के विधानसभा चुनावों से पहले दिल्ली की जनता से 'फिर कभी इस्तीफा देकर भागूंगा नहीं' कहने वाले केजरीवाल ने अपना वादा क्यों तोड़ा? हम आपको याद दिला दें कि दिल्ली में 49 दिन की पहली सरकार चलाने के बाद जब केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था तब उन्होंने सोचा था कि 2014 के लोकसभा चुनावों में जनता उनको समर्थन देकर प्रधानमंत्री बना देगी। इसीलिए वह वाराणसी से नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने पहुँच गये थे लेकिन जनता ने वाराणसी और देश के अन्य भागों में उनकी उम्मीदों पर बुरी तरह पानी फेर दिया था। इसके बाद दिल्ली में 2015 के विधानसभा चुनावों से पहले केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के फैसले को अपनी गलती मानते हुए जनता से माफी मांगी थी और आगे से ऐसा नहीं करने को कहा था। लेकिन केजरीवाल ने फिर से ऐसा कर दिया है तो सवाल उठता है कि जनता उनकी बात पर भरोसा क्यों करे?

वैसे देखा जाये तो केजरीवाल ने भरोसा सिर्फ जनता का तोड़ा हो ऐसा नहीं है। उन्होंने हर चुनाव में यमुना मैय्या से वादा किया कि अगले चुनावों से पहले नदी को पूरी तरह साफ करा दूंगा। लेकिन वादा तोड़ दिया। केजरीवाल ने वादा किया कि पंजाब में हमारी सरकार बनवा दो मैं दिल्ली में हर साल सर्दियों में होने वाले प्रदूषण को खत्म करवा दूंगा। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बन गयी मगर दिल्ली में प्रदूषण कम या खत्म होने की बजाय बढ़ गया। केजरीवाल सरकार ने पटाखों पर प्रतिबंध का फैसला किया मगर केजरीवाल के जेल से छूटते ही पटाखे चलाकर अपनी ही सरकार के फैसले का मखौल उड़ाया। केजरीवाल दिल्ली में शिक्षा और स्वास्थ्य क्रांति का ढोल हर जगह पीटते हैं लेकिन उन्हें बताना चाहिए कि उन्होंने अपने 11 साल के शासन में कितने नये स्कूल, कॉलेज या अस्पताल बनवाये हैं? केजरीवाल खुद को राष्ट्रभक्त बताते हैं इसलिए उन्हें बताना चाहिए कि उनकी पार्टी पर खालिस्तान समर्थकों से चंदा लेने के जो आरोप हैं उसकी सच्चाई क्या है? केजरीवाल कहते हैं कि उनकी आवाज को दबाया जाता है लेकिन उन्हें बताना चाहिए कि उनकी पार्टी के अब तक के शासन में दिल्ली विधानसभा में विपक्षी विधायकों को निलंबित करने का रिकॉर्ड क्यों बनाया गया?

बहरहाल, एक समय सामाजिक कार्यकर्ता के नाते आंदोलन करते रहे केजरीवाल राजनेता बनने के बाद भी अपने अंदर के आंदोलनकारी को जिंदा रखे हुए हैं इसलिए हर बात पर उनका उपराज्यपाल और केंद्र सरकार से झगड़ा होता रहता है। जबकि दिल्ली में पूर्व की सरकारों के दौरान मुख्यमंत्रियों का कभी भी उपराज्यपाल या केंद्र से इस तरह का टकराव नहीं रहा। इस तरह का टकराव दिल्ली में तब भी नहीं दिखता था जब राज्य और केंद्र में अलग पार्टियों की सरकारें थीं। मगर केजरीवाल पहले नजीब जंग से लड़ते रहे, फिर वह अनिल बैजल से भिड़े और अब उनका संग्राम उपराज्यपाल वीके सक्सेना से होता रहता है। इस उदाहरण से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि खामी उपराज्यपाल के स्तर पर है या मुख्यमंत्री के स्तर पर। खैर... केजरीवाल प्रकरण से एक बात तो स्पष्ट है कि एक समय पर नेता और एक्टिविस्ट की भूमिका निभाना दोनों भूमिकाओं के साथ अन्याय करने जैसा है।

-नीरज कुमार दुबे

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