लॉकडाउन में सिजेरियन डिलीवरी में भारी कमी, सामान्य प्रसव के मामले बढ़े

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Sep 03, 2020

परिस्थितियां कैसे बदलती हैं इसका जीता-जागता उदाहरण चिकित्सालयों में सिजेरियन डिलीवरी के तेजी से घटते आंकड़ों से समझा जा सकता है। लॉकडाउन के पहले सिजेरियन डिलीवरी आम होती जा रही थी और खासतौर से निजी चिकित्सालयों में सिजेरियन डिलीवरी का आंकड़ा बेहद चौंकाने वाली स्थिति में रहा है। पर कोरोना के चलते सिजेरियन डिलीवरी का स्थान सामान्य डिलीवरी ने ले लिया है। राज्यों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार लॉकडाउन के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में 64 से 91 प्रतिशत सिजेरियन डिलेवरी में कमी आई है। हो सकता है कि यह आंकड़े कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण हों पर इससे नकारा नहीं जा सकता कि 2020 के कोरोना काल में निश्चित रूप से सिजेरियन डिलीवरी में काफी कमी आई है। सिजेरियन डिलीवरी तो एक उदाहरण है, तथ्य तो यह बता रहे हैं कि अन्य बीमारियों के इलाज में भी कमी आई है। दवाओं की मांग कम हुई है तो अस्पतालों में होने वाली बेतहाशा भीड़ में भी जबरदस्त कमी आई है। कोरोना ने छोटी-छोटी बीमारियों यहां तक कि छींक आने पर ही डॉक्टरों के चक्कर लगाने और मेडिकल जांचों के चक्रव्यूह से बड़ी राहत दी है।

मुंबई के सायन हॉस्पिटल के डीन डॉ. भारमल का कहना है कि ‘‘प्रसूती के दौरान दस से पन्द्रह प्रतिशत को ही सर्जरी की जरूरत होती है।‘‘ पर जबसे पांच सितारा सुविधायुक्त अस्पतालों की बाढ़ आई है और जिस तरह से कैशलेस इंश्योरेंस का चलन चला है तबसे सिजेरियन डिलीवरी में तेजी से इजाफा हुआ है। यह तो कोरोना की मार, लॉकडाउन का दौर और उसके बाद भी कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के चलते सिजेरियन डिलीवरी की रिस्क अस्पताल और प्रसूताएं दोनों ही लेने को तैयार नहीं हैं यही कारण है कि कोरोना के कारण महिलाओं और नवजात बच्चों को बड़ी राहत इस मायने में मिली है कि सिजेरियन के कारण मां और बच्चा दोनों को ही तकलीफ होती है। जटिलताओं की भी संभावना रहती है। इसे कोरोना का सकारात्मक साइड इफेक्ट माना जा सकता है कि सिजेरियन में 61 से 91 प्रतिशत कमी के साथ अब सामान्य डिलीवरी होने लगी है। पुणे के मेडीकेयर हॉस्पिटल के प्रेसिडेंट डॉ. गणेश राख का कहना है कि यह सरकारों के लिए भी सोचने की बात है कि अब ऐसा क्या हो गया कि ज्यादातर बच्चे सामान्य डिलीवरी से होने लगे हैं। उनका मानना है कि लगभग 90 प्रतिशत मामलों में सिजेरियन डिलीवरी की आवश्यकता ही नहीं होती। यह वास्तविकता दर्शाने वाली सच्चाई है। इसे स्वीकारना होगा।

इसे भी पढ़ें: 100 साल पहले दुनिया जिस तरह महामारी के आगे बेबस थी वही हाल अब भी है

आज से पाच-छह दशक पहले स्थितियां बदली हुई थीं। डॉक्टर सबसे पहले नब्ज टटोल कर, जीभ देखकर, पेट दबाकर, सिर छू कर, आंखों के नीचले हिस्से को देखकर ही बीमारी की पहचान करते थे और दो तीन दिन में दवा का फायदा नहीं होता था तब ही अन्य जांच का विकल्प होता था पर आज तो दवा बाद में पहले जांच होती है। इसी तरह सिजेरियन डिलीवरी का सिलसिला चला पर लगता है अब स्थितियां सुधरेंगी। कोरोना लॉकडाउन के कारण जिस तरह से सिजेरियन डिलीवरी में अच्छी खासी कमी आई है इसे शुभ संकेत ही समझा जाना चाहिए। आखिर प्रकृति को अपनी तरह से काम करने दिया जाना चाहिए। प्रकृति भी सामान्य प्रसव की और ही इंगित करती है।

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

प्रमुख खबरें

UP में विकास और Infrastructure प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे हों, सीएम Yogi Adityanath के कड़े निर्देश

Delhi Police ने Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi पर दर्ज कीं 4 FIR

Elon Musk के अंबानी वाले सवाल पर बोले Rahul Gandhi, दूसरे व्यक्ति से मिलेंगे तो और पता चलेगा

विवाद में उलझा Arunachal Pradesh, Ranji Trophy के पहले मैच से बाहर होने का खतरा