हारे हुए नेता का कहना (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | May 29, 2023

आम जनता ने सरकार को लोकतांत्रिक तरीके से चुना, पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिया। घोड़ों का पारम्परिक व्यापार बंद रहा। महाजन गहरे घाटे में चले गए। सरकारें अगर स्पष्ट बहुमत से चुनी जाती रही तो सचमुच पैसा उगाऊ व्यापार का क्या होगा। सरकार बनी, मुख्य मंत्री तो बने ही, उप मुख्यमंत्री भी बनाए गए ताकि सरकार की सफलता के लिए पारम्परिक क्षेत्रीय, जातीय, पक्ष संतुलन बना रहे। सत्ता जाने का दुःख बहुत चुभने वाला होता है। कितनी स्पष्ट और उससे ज़्यादा अस्पष्ट सुविधाएं छिन जाती हैं। 

इस खतरनाक कथन से लगा, केन्द्रीय सरकार से उनकी संजीदा बातचीत चल रही है। फिर एक दिन जनसभा की, उसमें आए कुछ दर्जन लोगों से कहा, इन्हें सरकार चलानी नहीं आती। यह सरकार बदले की भावना से कार्य कर रही है। हमारी पार्टी की सरकार ने आज तक, बदले की भावना से कोई कार्य नहीं किया। भोली भाली जनता ठगा ठगा महसूस कर रही है। बिना चुनाव लडे ख़ास लोगों को केबिनेट स्तर का रुतबा दिया है। हम सरकार बनाते ही इस अनुभवहीन सरकार के कामकाज को रिव्यू करेंगे।

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जब चुनी हुई सरकार के किसी नुमायंदे ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया तो हारे हुए नेता ने ज्यादा सख्त बयान दिया। उन्होंने कह डाला, शासक पार्टी के बंदों का, कुछ दिनों बाद, सड़क पर चलना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने यह नहीं बताया कि अंदाज़न कितने दिनों बाद ऐसा होने वाला है। उनसे रहा नहीं गया, कुछ दिन बाद बोले हमारी विचारधारा नहीं हारी है, सरकार की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है।

उन्होंने हार का ठीकरा चुनाव आयोग, ईवीएम, दुर्भाग्य और बारिश वगैरा पर फोड़ते हुए कहा कि इनकी पार्टी ने धन, बल और शराब के माध्यम से चुनाव प्रभावित किया। नैतिकता की ह्त्या कर दी है। उन्होंने चुनाव हारकर भी, सहयोग के लिए सभी का धन्यवाद किया। कहा, अब हम विपक्ष की रचनात्मक भूमिका निभाएंगे। उन्होंने वोट न देने वालों को रोजाना मनपसंद गालियां देते हुए भगवान से अनुरोध किया कि एक बार उनकी, एक बार हमारी सरकार बनने का आशीर्वाद दें।

  

जनता ने विकास को अनदेखा कर, हमें धोखा देकर इस सरकार को बनाया है। भगवान कुछ ऐसी विकट परिस्थितियां पैदा करें कि सरकार ठीक से काम न कर सके, इनकी पार्टी में गतिरोध पैदा हो जाए, बीमारी फैल जाए और जनता दुखी हो जाए। जल्दी नहीं तो पांच साल बाद तो चुनाव हार ही जाएं और हमारी सरकार आ जाए। 

जब सरकार कई महीने तक सुचारू चलती रही तो उन्हें एहसास हुआ कि यह सरकार तो पांच साल निकाल लेगी और वे सचमुच चुनाव हार गए हैं। अब उन्होंने महात्मा बुद्ध के बताए मध्य मार्ग पर नंगे पांव चलना शुरू कर दिया है।

- संतोष उत्सुक

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