महाशिवरात्रि पर भगवान शंकर की चार पहर की पूजा का है विशेष महत्व

By शुभा दुबे | Mar 01, 2019

यदि आप अपने सभी मनोरथ पूरे करना चाहते हैं तो महाशिवरात्रि पर विधि विधान के साथ भगवान शिव का पूजन करें। महाशिवरात्रि पर भगवान शिव के पूजन का विशेष महत्व है खासतौर पर इस पर्व पर चार पहर की पूजा का विशेष महत्व है। माना जाता है कि सृष्टि के प्रारम्भ में इसी दिन मध्य रात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। भगवान शिव और उनका नाम समस्त मंगलों का मूल है। वे कल्याण की जन्मभूमि तथा परम कल्याणमय हैं। समस्त विद्याओं के मूल स्थान भी भगवान शिव ही हैं। ज्ञान, बल, इच्छा और क्रिया शक्ति में भगवान शिव के जैसा कोई नहीं है। वे सभी के मूल कारण, रक्षक, पालक तथा नियन्ता होने के कारण महेश्वर कहे जाते हैं। उनका आदि और अंत न होने से वे अनंत हैं। वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों के सम्पूर्ण दोषों को क्षमा कर देते हैं तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ज्ञान, विज्ञान के साथ अपने आपको भी दे देते हैं। शिव जी के शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं। देवों के देव महादेव के इस व्रत का विशेष महत्व है। इस व्रत को हर कोई कर सकता है। 

विधान− इस दिन व्रत रखकर भगवान शिव का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, पंचामृत अभिषेक करें। रुद्राभिषेक और ओम नम: शिवाय एवं महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। चार पहर में शिवजी की पंचोपचार, षोडशोपचार या राजोपचार पूजा करें। बिल्व पत्र, पुष्प, भांग, धतूरा, आंकड़े के फूल, सूखे मेवे से शिवजी का श्रृंगार करें। महाशिवरात्रि पर अर्धरात्रि में शिवपूजन का विशेष महत्व है। इस पर्व पर पत्र पुष्प तथा सुंदर वस्त्रों से मंडप तैयार करके वेदी पर कलश की स्थापना करके गौरी शंकर की स्वर्ण मूर्ति तथा नंदी की चांदी की मूर्ति रखनी चाहिए। कलश को जल से भरकर रोली, मोली, चावल, पान, सुपारी, लौंग, इलाइची, चंदन, दूध, घी, शहद, कमलगट्टा, धतूरा, बेल पत्र आदि का प्रसाद शिव को अर्पित करके पूजा करनी चाहिए। रात को जागरण करके चार बार शिव आरती का विधान जरूरी है। दूसरे दिन प्रातः जौ, तिल, खीर तथा बेलपत्र का हवन करके ब्राह्मणों को भोजन करवाकर व्रत का पारण करना चाहिए।

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शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद व शक्कर से स्नान करवा कर धूप−दीप जलाकर निम्न मंत्र का जाप करने से समस्त बाधाओं का अंत होता है। शिवरात्रि को एक मुखी रुद्राक्ष को गंगाजल से स्नान करवा कर धूप−दीप दिखा कर तख्ते पर स्वच्छ कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। शिव रूप रुद्राक्ष के सामने बैठ कर सवा लाख मंत्र जप का संकल्प लेकर जाप आरंभ करने से काफी लाभ होता है। शिवरात्रि को रुद्राष्टक का पाठ करने से शत्रुओं से मुक्ति मिलती है तथा मुक़दमे में जीत व समस्त सुखों की प्राप्ति होती है। भगवान शंकर पर चढ़ाया गया नैवेद्य को खाना निषिद्ध है। जो इस नैवेद्य को खाता है वह नरक को प्राप्त होता है। इस कष्ट के निवारण के लिए शिव की मूर्ति के पास शालिग्राम की मूर्ति रखते हैं। यदि शिव की मूर्ति के पास शालिग्राम की मूर्ति होगी तो नैवेद्य खाने पर कोई दोष नहीं रह जाता है।

-शुभा दुबे

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