'स्वतंत्रता सेनानियों ने सीने पर गोली खाई, आप अंडों से डर गयीं'? Supreme Court ने Mahua Moitra पर की तीखी टिप्पणी

By नीरज कुमार दुबे | Aug 08, 2026

राजनीति में कदम रखने के बाद विरोध, नारे, सवाल और कभी-कभी विरोधियों के तंज झेलना शायद लोकतांत्रिक जीवन का हिस्सा माना जाता है, लेकिन अगर विरोध का हथियार ‘अंडा’ बन जाए और उससे बचने के लिए सांसद पुलिस के सामने वर्चुअल पेशी की गुहार लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाएं, तो अदालत का चुटीला सवाल आना तय है। तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की याचिका पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में कुछ ऐसा ही हुआ। अदालत ने उनकी उस मांग में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया, जिसमें उन्होंने कथित आपत्तिजनक पोस्ट से जुड़े मामले में पुलिस के सामने ऑनलाइन माध्यम से पेश होने की अनुमति मांगी थी।

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वकील ने अदालत को बताया कि पहले उन्हें धमकी दी गई कि उन पर अंडे फेंके जाएंगे और बाद में वास्तव में अंडे भी फेंके गए। यानी मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विरोध का ‘प्रोटीन पैकेज’ भी जमीन पर पहुंच गया। इसी दलील के जवाब में पीठ ने वह टिप्पणी की, जिसने पूरे मामले को कानूनी सुनवाई से निकालकर राजनीतिक बहस का विषय बना दिया।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने मौखिक टिप्पणी करते हुए पूछा कि राजनीति में उतरने के बाद सांसद अंडों से क्यों डर रही हैं? अदालत ने स्वतंत्रता सेनानियों का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अपने सीने पर गोलियां खाईं। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि इस तरह की अर्जी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचनी ही नहीं चाहिए थी। अदालत की इस टिप्पणी ने साफ कर दिया कि राजनीतिक जीवन में सार्वजनिक विरोध के जोखिम और आपराधिक जांच में कानून के मुताबिक सहयोग, दोनों को अलग-अलग कसौटियों पर देखा जाना चाहिए।

उधर, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद महुआ मोइत्रा के वकील ने याचिका वापस ले ली। इसके बाद अदालत ने इसे ‘वापस ली गई’ याचिका के रूप में खारिज कर दिया। यानी सुप्रीम कोर्ट ने मामले के मूल आरोपों पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया, बल्कि वर्चुअल पेशी की मांग पर राहत देने से इंकार किया।

हम आपको बता दें कि यह पूरा विवाद कलकत्ता हाई कोर्ट के 21 जुलाई के आदेश से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने महुआ मोइत्रा को फिलहाल coercive action यानी पुलिस की ओर से कठोर कार्रवाई से अंतरिम सुरक्षा दी थी, लेकिन साथ ही जांच में सहयोग करने का निर्देश भी दिया था। न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की पीठ ने उन्हें 14 अगस्त को जांच अधिकारी के सामने पूछताछ के लिए उपस्थित होने को कहा है। हाई कोर्ट ने यह सुरक्षा 5 अक्टूबर तक दी है, बशर्ते सांसद जांच में सहयोग करती रहें। मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को निर्धारित है।

हाई कोर्ट ने यह भी गौर किया था कि महुआ मोइत्रा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की जिन धाराओं में मामला दर्ज किया गया है, उनमें अधिकतम सजा सात वर्ष से कम है। इसी आधार पर उन्हें फिलहाल गिरफ्तारी जैसी कठोर कार्रवाई से सुरक्षा दी गई है। लेकिन सुरक्षा का मतलब जांच से छुट्टी नहीं है और यही बात सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में भी केंद्रीय रूप से उभरकर सामने आई।

हम आपको बता दें कि मामला पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के हगोलबेरिया थाने में दर्ज केस से संबंधित है। महुआ मोइत्रा ने आरोपों को मनगढ़ंत बताते हुए मुकदमे की कार्यवाही रद्द करने और पुलिस की कठोर कार्रवाई से संरक्षण की मांग की थी। यह विवाद एक कथित भड़काऊ पोस्ट से जुड़ा है, जिसे लेकर उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू यही है कि जिस सांसद की पहचान संसद में तीखे सवालों, आक्रामक तेवर और बेबाक बयानों के लिए होती है, वही अब अंडे फेंके जाने की आशंका को लेकर पुलिस स्टेशन जाने से बचने की कोशिश करती नजर आईं। हालांकि कानूनी रूप से अंडे फेंका जाना कोई मामूली बात नहीं है और किसी भी व्यक्ति को हिंसक या अपमानजनक विरोध से सुरक्षा मिलनी चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को जांच में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने की जिम्मेदारी से बचने का पर्याप्त आधार नहीं माना।

बहरहाल, अदालत की टिप्पणी ने एक राजनीतिक व्यंग्य जरूर छोड़ दिया है कि सियासत की राह में फूलों की उम्मीद लेकर उतरने वालों को कभी-कभी अंडों की बारिश भी झेलनी पड़ती है। महुआ मोइत्रा के लिए फिलहाल संदेश स्पष्ट है। हाई कोर्ट ने जांच में सहयोग का रास्ता दिखाया है और सुप्रीम कोर्ट ने उस रास्ते पर वर्चुअल शॉर्टकट देने से इंकार कर दिया है। अब गेंद फिर उसी पाले में है जहां से मामला शुरू हुआ था यानि पुलिस की जांच और अदालत की अगली सुनवाई।

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