Supreme Court ने Bhupesh Baghel की याचिका निपटाई, HC के आदेश में दखल से इनकार

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शीर्ष अदालत ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के 2023 के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका पर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पाटन सीट से विधायक बघेल चुनाव न्यायाधिकरण के समक्ष अपनी सभी दलीलें और बचाव के तर्क रखने के लिए स्वतंत्र रहेंगे। बघेल पर चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होकर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन करने का आरोप है।

नयी दिल्ली, सात अगस्त उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया जिसमें 2023 में पाटन विधानसभा सीट से छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करने से मना कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने हालांकि कहा कि बघेल सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय के चुनाव न्यायाधिकरण के समक्ष अपनी सभी दलीलें रखने के लिए स्वतंत्र होंगे। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के 15 जून के अंतरिम आदेश को चुनौती देने वाली बघेल की याचिका का निपटारा कर दिया।

इस आदेश में उच्च न्यायालय ने बघेल की उस अर्जी को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने मुकदमे का आधार नहीं होने और कानूनी जरूरतों को पूरा नहीं करने के आधार पर चुनाव याचिका को खारिज करने का अनुरोध किया था। पीठ ने कहा कि बघेल के पास बचाव के लिए तर्कसंगत आधार हैं और स्पष्ट किया कि उनकी याचिका खारिज किए जाने से कार्यवाही के दौरान चुनाव न्यायाधिकरण के समक्ष सभी बिंदुओं और दलीलों को उठाने के उनके अधिकार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। बघेल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि चुनाव याचिका कानूनन विचार योग्य नहीं है।

आरोपों का जिक्र करते हुए, वकील सुमीर सोढी की मदद से सिब्बल ने कहा कि चुनाव प्रचार 15 नवंबर को खत्म हो गया था और बघेल कथित तौर पर 16 नवंबर को एक धार्मिक कार्यक्रम में मौजूद थे; याचिकाकर्ता का दावा था कि यह ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ (आरपीए) की धारा 126 का उल्लंघन था। सिब्बल ने कहा कि अगर आरोपों को मान भी लिया जाए, तो भी धारा 126 का उल्लंघन केवल चुनावी अपराध है, न कि अधिनियम की धारा 123(7) के तहत “भ्रष्ट आचरण”। उन्होंने कहा, “सवाल यह है कि क्या यह भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता है।

भ्रष्ट आचरण से संबंधित प्रावधान धारा 123(7) के तहत आते हैं।” आरोप था कि चुनाव प्रचार की समय सीमा खत्म होने के बाद, बघेल ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 126 और आदर्श आचार संहिता का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए एक “रैली/रोड शो” किया। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि जिस मुद्दे पर विचार किया जाना है, वह यह है कि क्या कथित उल्लंघन ने “चुनाव के नतीजों पर अहम असर डाला है”। सिब्बल ने कहा कि यह सवाल तथ्यों पर आधारित था और वैसे भी, प्रतिवादी का अपना पक्ष यह था कि सभा में केवल 200 लोग ही शामिल हुए थे।

उन्होंने कहा कि बघेल ने लगभग 20,000 मतों के अंतर से चुनाव जीता था, इसलिए यह दावा करना मुश्किल है कि कथित बैठक ने चुनाव के नतीजों पर कोई खास असर डाला। वकील सोढी के जरिए दायर अपनी याचिका में बघेल ने इस आरोप से इनकार किया कि उन्होंने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 126 के तहत 48 घंटे की प्रचार न करने की अवधि का उल्लंघन किया।

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