By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 23, 2026
(मानसी जगनी) नयी दिल्ली, 23 अक्टूबर सदियों पुराना वह तालाब, जहां 1712 में मुगल सम्राट बहादुर शाह के बेटे जहांदार शाह ने गद्दी के लिए लड़ाई के दौरान अपना डेरा डाला था, दिल्ली में जल संरक्षण के लिए एक अहम मौका प्रदान कर सकता है। एमसीडी अब इस तालाब के पुनरुद्धार की योजना बना रहा है, ताकि बारिश के पानी को इकट्ठा किया जा सके और भूजल स्तर बढ़ाया जा सके। दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के धरोहर प्रकोष्ठ के सदस्य सचिव डॉ. अकील अहमद के एक शोध पत्र के अनुसार, ऐतिहासिक दिल्ली-आगरा मार्ग पर स्थित किशन दास तालाब कभी केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) परिसर के पीछे के निचले इलाके में फैला हुआ था और ओखला के कचरे से बिजली बनाने वाले संयंत्र तक जाता था।
यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब दिल्ली के भूजल संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। अधिकारियों का कहना है कि केवल इस तालाब को बहाल करने से शहर का जल संकट पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन अगर इसे वैज्ञानिक तरीके से पुनर्जीवित किया जाए, तो यह बारिश के पानी को रोकने और भूजल स्तर बढ़ाने में मदद कर सकता है। अधिकारियों के मुताबिक यह इस बात पर निर्भर करेगा कि उस जगह की हाइड्रोलॉजी (जल विज्ञान) कैसी है और वहां आने वाले पानी की गुणवत्ता क्या है।
इस तालाब का इतिहास कम से कम 314 साल पुराना है। शोध के अनुसार, 9 दिसंबर 1712 को मुगल गद्दी के लिए संघर्ष में उलझे जहांदार शाह ने दिल्ली छोड़ी और शहर से लगभग 11 किमी दक्षिण में, खिज्राबाद के पास किशन दास तालाब पर अपना डेरा डाल दिया। डॉ. अहमद ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘यह जगह सिर्फ एक सुविधाजनक खुली जमीन नहीं थी।
एक बड़े शाही डेरे के लिए पानी, चारे, सैनिकों और जानवरों के लिए जगह, और एक मुख्य सड़क तक पहुंच की जरूरत होती थी। यह तालाब घने शहर के बाहर था, लेकिन शहर के इतना करीब था कि वहां तक आसानी से पहुंचा जा सके। इसी वजह से आसपास का इलाका ऐसे डेरे के लिए बिल्कुल उपयुक्त था।’’ लगभग तीन दशक बाद, एक और बड़े सैन्य घटनाक्रम के विवरण में इस जल स्रोत का जिक्र मिलता है।
1739 में फारसी शासक नादिर शाह के दिल्ली पर आक्रमण के दौरान, इस तालाब का जिक्र एक भौगोलिक निशान के रूप में किया गया था, जिसके आगे सेना की गश्त नहीं होती थी। बाद के वर्षों में भी, राजधानी के आसपास सैन्य गतिविधियों के विवरण में इसका जिक्र आता रहा। 19वीं सदी तक यह इतना जाना-पहचाना हो गया था कि 1842 के दिल्ली-आगरा मार्ग के यात्रा विवरण में इसे ‘किस्सन दास का तालाब’ के रूप में दर्ज किया गया।
अहमद का शोध ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुराने नक्शों और आज की जमीन की ऊंचाई (ग्राउंड एलिवेशन) के आधार पर इसकी संभावित जगह का पता लगाने की कोशिश करता है। एमसीडी के प्रस्ताव के तहत, संबंधित एजेंसियों को सबसे पहले यह पता लगाना होगा कि यह जल निकाय कितनी जगह में फैला था और क्या इसके मूल तल का कोई हिस्सा अभी भी बचा हुआ है। शोध में सुझाव दिया गया है कि ऐतिहासिक नक्शों की तुलना राजस्व रिकॉर्ड, गांवों के नक्शों, पुरानी जल निकासी योजनाओं और पहले की हवाई तस्वीरों से की जानी चाहिए।
इसके बाद, ज़मीन पर जाकर सर्वेक्षण करना चाहिए ताकि वहां बचे हुए गड्ढों, तटबंधों या अन्य भौतिक निशानों की पहचान की जा सके। अहमद ने कहा, ‘‘अगर मूल बेसिन या उसके किसी हिस्से का पता चल जाता है, तो उसे बहाल करने के लिए वहां जमा मलबा हटाया जा सकता है, गड्ढे के प्राकृतिक आकार को वापस लाया जा सकता है, और बारिश के पानी को इकट्ठा करके रखने के लिए एक तंत्र बनाया जा सकता है।’’ अप्रैल 2024 में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने जलभराव, जल निकासी और जल संरक्षण से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह गौर किया कि शहर के कई सूचीबद्ध जलाशय अब जमीन पर अस्तित्व में ही नहीं हैं। अदालत को बताया गया कि दिल्ली में कुल 1,367 जल निकाय थे, जिनमें से 322 की पहचान उपग्रह तस्वीरों के ज़रिए की गई थी, लेकिन उस समय तक केवल 344 जल निकायों का ही जमीनी सत्यापन पूरा हो पाया था।
दिल्ली में आधुनिक जल-आपूर्ति और जल निकासी नेटवर्क आने से पहले, यहां मौजूद तालाब और जलाशयों में बारिश के मौसमी पानी को जमा करके रखा जाता था। ये जल स्रोत बस्तियों, यात्रियों और सेना की आवाजाही के लिए बहुत मददगार होते थे। इनमें से कई जल निकाय सार्वजनिक स्मृति से ओझल हो चुके हैं, लेकिन इनके पुराने जल-क्षेत्र आज भी इस बात के संकेत दे सकते हैं कि कभी इस परिदृश्य में पानी किस तरह बहता था।