साक्षात्कारः मेधा पाटकर ने कहा- किसान आंदोलन के आगे सरकार की हार निश्चित है

By डॉ. रमेश ठाकुर | Feb 01, 2021

दिल्ली में बीते कई दिनों से जारी आंदोलन अब किसानों के लिए प्रतिष्ठा जैसा हो गया है। वहीं, केंद्र सरकार के लिए अपने कदम पीछे खींचना नाक का सवाल हो गया है। इसलिए आंदोलन के असल मुद्दे कहीं पीछे छूट गए हैं। लाल किला कांड के बाद नेताओं पर दर्जनों मुदकमे और ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां हो रही हैं। सरकार ने आंदोलन को खत्म करने की हर कोशिशें कीं, पर सभी दांव उलटे पड़े। आंदोलन में देशभर के नामचीन लोग शामिल हैं, मेधा पाटकर भी डटी हैं जो प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता व समाज सुधारक कही जाती हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने उन्हें नई पहचान दी। उन पर भी एफ़आईआर दर्ज हुईं हैं। आंदोलन से जुड़े तमाम पहलुओं पर डॉ. रमेश ठाकुर ने उनसे बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश।

इसे भी पढ़ें: साक्षात्कारः राकेश टिकैत ने कहा- तोमर खुद दबाव में हैं वह क्या हल निकालेंगे

प्रश्न- आंदोलन का रूख अब दूसरी दिशा में जाता दिख रहा है?


उत्तर- ये नौबत क्यों आई, इस पर गौर करना होगा। किसान 62 दिनों से दिल्ली के विभिन्न इलाकों में शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे थे। कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। आंदोलन स्थल पर किसान दम तोड़ते गए, तब भी किसान उग्र नहीं हुए। लेकिन 26 जनवरी को सरकार और उनके लोगों ने ऐसा बखेड़ा खड़ा किया जिससे माहौल बिगड़ गया और दोष किसानों के माथे पर मढ़ दिया गया। बावजूद इसके किसान नेताओं ने घटना की सारी ज़िम्मेदारी नैतिकता के आधार पर खुद ली। तब भी लोगों को शर्म नहीं आई।   


प्रश्न- घटना को लेकर आप सभी पर मुकदमे भी दर्ज हुए हैं? 


उत्तर- मुझे आप एक ऐसा आंदोलन बताएं जिसमें आंदोलकारियों पर मुकदमें ना लादे गए हों, परेशान न किया गया हो और डराया-धमकाया न गया हो। दरअसल, इन मुक़द्दमों से सरकारें सामने वाले पर फिजीकली और मनौविज्ञानिक रूप से दबाव डालने का प्रयास करती हैं। हम पर केस दर्ज हुआ है। कोई बात नहीं होने दो। हम कानून-व्यवस्था में विश्वास करते हैं। गिरफ्तार होने के लिए भी तैयार हैं। कहीं भाग नहीं रहे, यहीं बैठे हैं। मामला जब कोर्ट में पहुँचेगा, हम तसल्ली से जवाब देंगे। वहां दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा।


प्रश्न- सरकार के साथ कई दौर की बातचीत में कोई हल क्यों नहीं निकला?


उत्तर- ये तय हो चुका है कि मौजूदा सरकार सर्वज्ञानी है। उन्होंने जो कह दिया वही ठीक है। सरकार के मुताबिक हम उनके निर्णयों पर फूल-मालाएँ चढ़ाएं, लेकिन विरोध न करें? सरकार में कुल जमा चार-छह लोग ही समझदार हैं। बाकी सड़कों पर ढाई महीनों से बैठे आंदोलनकारी तो मूर्ख हैं। प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, अंबानी और अड़ानी जैसों को ही नए कृषि क़ानूनों के फायदे पता हैं, बाकि सब घास छीलते हैं। खेती में कौन-सी फसल उगानी है किस फसल से नफा-नुकसान होगा। ये किसान को ही पता होगा या वातानुकूलित कमरों में बैठने वाले लोगों को? सरकार की इतनी हठधर्मी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ठीक नहीं? ये हिंदुस्तान है सीरिया, पाकिस्तान नहीं? यहां लोगों की आकांक्षाओं का ख्याल सदियों से किया जाता रहा है, वह कायम रहना चाहिए।


प्रश्न- 26 जनवरी को असल में हुआ क्या था?


उत्तर- जो हुआ वह हमें पता था, लेकिन उसकी आड़ में क्या होने वाला है उसे सरकार जानती थी, जिसकी पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। पुलिस के बताए तय रूटों पर ही हमारा काफिला निकल रहा था। लेकिन अचानक लालकिले में सैंकड़ों लोग दाखिल हो जाते हैं और मीनारों पर चढ़कर झंड़ा लगा आते हैं। कौन थे, वह लोग क्या अब बताने की जरूरत है शायद नहीं? बेहतरीन प्लानिंग के साथ आंदोलन को बदनाम करने का प्रयास किया गया। सरकार कुछ ऐसा करना चाहती थी जिससे लोगों की सहानुभूति किसानों से हटे और नफरत के अंकुर फूटे। हालांकि कुछ घंटों के लिए उनकी नापाक कोशिशें कामयाब भी हुईं। लेकिन उसके बाद लोगों ने पूरे माजरे को समझने में देरी नहीं की।


प्रश्न राकेश टिकैत की भावुक अपील ने आंदोलन को फिर से जिंदा कर दिया?


उत्तर- देखिए, समाज के लोग बहुत समझदार हैं। अच्छे-बुरे को समझते हैं। लेकिन उनके दिमाग को डायवर्ट करने का प्रयास कुछ सालों से किया जा रहा है। झूठी देशभक्ति उनमें भरी जा रही है। नौकरियाँ, काम धंधे, रोज़गार सभी चौपट हैं, लेकिन लोग अंधभक्ति में डूबे हुए हैं। लोगों को राष्ट्रभक्ति का ऐसा कैप्सूल दे दिया गया जिसका असर निकल ही नहीं रहा। लेकिन किसान उनके झांसे में नहीं आने वाला। ये आंदोलन आर-पार का है। अपनी मांगें मनवा कर ही घर जाएंगे। चाहे इसके लिए कितनी भी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े। सैंकड़ों किसान शहीद हो गए हैं, लेकिन ज़ज़्बा कम होने का नाम नहीं ले रहा। उनका यही संकल्प उनको विजय दिलाएगा।

इसे भी पढ़ें: साक्षात्कारः कृषि मंत्री तोमर ने कहा- अन्नदाताओं की आड़ लेकर गंदी राजनीति न करे विपक्ष

प्रश्न- सरकार क़ानूनों को एक-डेढ़ साल लागू नहीं करने राजी हुई थी, आप लोग क्यों नहीं माने?


उत्तर- देखिए, वह सिर्फ साजिश मात्र थी आंदोलन को खत्म करवाने की। जिस अंदाज़ में उन्होंने रोक लगाने की बात कही थी, उसमें हमें साजिश की बू आई। उनकी मंशा को भांपते हुए ही किसान संगठनों ने बात मानने से इंकार किया। तीनों नए कृषि कानून सीमांत खेतीहरों के योग्य नहीं हैं। ये बात बड़े किसान नेता बैठक की अगुआई करने वाले सरकार के मंत्रियों को बता भी चुके थे। लेकिन वह नहीं माने। किसानों की मांगें पानी की तरह साफ हैं, नए तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द किया जाए और एमएसपी पर कानूनी गारंटी का प्रावधान हो। सरकार को इधर-उधर की बात न करके उन्हीं पर गौर करना चाहिए।


-जैसा डॉ. रमेश ठाकुर के साथ बातचीत में मेधा पाटकर ने कहा।

All the updates here:

प्रमुख खबरें

Olympic Ice Hockey में Team Canada का तूफान, France को 10-2 से रौंदकर मचाया तहलका।

IND vs PAK मैच में हार का डर? बीच में ही स्टेडियम छोड़कर निकले PCB चीफ Mohsin Naqvi

T20 World Cup: भारत से हार के बाद पाकिस्तान में गुस्सा, प्रशंसकों ने टीम पर उठाए सवाल

IND vs PAK: महामुकाबला बना एकतरफा, Team India ने Pakistan को 61 रन से धोकर 8-1 की बढ़त बनाई।