माँ पृथ्वी हमारी आवश्यकतओं की पूर्ति कर सकती है, हवस की नहीं

By - सुखी भारती | Apr 22, 2021

पृथ्वी हमारे सूर्य परिवार का बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रह है। और इस ब्रह्माण्ड में केवल पृथ्वी ही ऐसा ग्रह है, जहाँ पर जीवन जीने की सारी अनुकूल प्रस्थितियां पाई जाती हैं। हमारे महापुरुषों ने इस ‘धरा’ को ‘माता’ का दर्जा इसलिए प्रदान किया क्योंकि यह भी एक माँ की भांति अनेकों कष्ट सहकर प्रत्येक जीव व बनस्पति को जीवन प्रदान करती है। खाने के लिए फसलें, फल, सब्जि़यां, में वे इत्यादि इस धरती माँ की कोख से ही उपजते हैं। लेकिन यह घोर चिंता व चिंतन का विषय है कि आज मानव के लोभ की हवस ने पृथ्वी के ऊपर व नीचे वातावरण को जितना प्रदूषित किया है, यह मात्र आज के लिए शोचनीय नहीं है अपितु इसके द्वारा आने वाले कल के लिए भी गंभीर खतरे पैदा हो गए हैं। 

आज जब इस प्रदूषित वातावरण में प्रत्येक मनुष्य, अपने अतीत की ओर झांककर देखता है तो बस यही कहता है कि पहले समय बहुत अच्छा था। साफ हवा बहती थी, साफ पानी था, कहीं कोई प्रदूषण नहीं, खाना स्वादिष्ट व बलकारक होता था। लोग कुदरत की गोद में, कुदरत से जुड़कर अपना जीवनयापन करते थे। लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया जंगलों की अंधाधुंध कटाई व विकसित देशों में बृहद स्तर पर बड़े उद्योग स्थापित किए गए। जिसके फलस्वरूप वातावरण को दोहरी मार सहनी पड़ी। जैसे-जैसे उद्योगिकीकरण बढ़ता गया, विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी में प्रगति होती गई, वैसे-वैसे अनेकों कारक व कारण भी सामने आते गए। इन्हीं के द्वारा आधुनिक प्रदूषित वातावरण की स्थिति उत्पन्न हो गई। बढ़ती आबादी व उद्योगिकीकरण के कारण शोर, ऊष्मा, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, थल प्रदूषण इत्यादि सब ओर से ही धरती माँ को गंदगी मिली। यही नहीं प्रमाणु युग ने हमें घातक रेडियोएक्टिव प्रदूषक भी दिए जिन्होंने मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट खड़े कर दिए हैं। 

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यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार वायुमंडल में हर साल लगभग 2000 लाख टन सलफर डाइऑक्साइड, 1300 लाख टन नाइट्रोज़न एवं  अनेकों तरह के ऑक्साइड, 700 लाख टन के करीब कार्बन यौगिक एवं 2800 लाख टन राख की मात्र पहुँच रही है। यही नहीं कार्बन डाइऑक्साइड गैस की लगभग 2500 लाख टन से भी ज्यादा मात्र वायुमंडल को दूषित कर रही है। उद्योगिक इकाईयों द्वारा छोडे़ जा रहे रसायनिक पदार्थ जमीन के अंदर पहुँचकर भू-जल को गंदा कर रहे हैं। एवं इनसे विसर्जित होती गैसें हवा को प्रदूषित कर रही हैं। शहरी आबादी द्वारा बहाई जा रही गंदगी के फलस्वरूप नदियां, दरिया गंदे पोखरों का रूप धारण कर रहे हैं। और इनकी हालत दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही है। इनमें उत्तरी भारत की दो नदियां गंगा जमुना शामिल हैं। मनुष्य द्वारा प्राकृतिक साधनों की जा रही लूट की ताज़ा मिसाल है कि गंगा नदी के गलेशीयर हर साल आधा मील पीछे खिसक रहे हैं। इसी प्रकार बाकी नदियों के उत्पति स्थानों पर भी गलेशीयर दिन-ब-दिन पिघल रहे हैं। 

हमें चेतना होगा कि वातावरण प्रदूषण एक ऐसा विषय है जो मनुष्य की उन सारी प्रक्रियाओं को दर्शाता है जो प्राकृति के लिए नुकसानदायक है। यह मनुष्य द्वारा पैदा किया गया अनचाहा बदलाव है। जो आज सभी सजीव प्रजातियों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इस प्रदूषण के प्रभाव से आज अनेकों ही प्रजातियां इस धरा से लुप्त हो गई हैं। दिन-ब-दिन बढ़ रहे ग्रीन हाऊस प्रभाव से धरती व सूर्य के बीच रक्षा परत का काम कर रही ओज़ोन परत में भी छेद बढ़ते जा रहे हैं। जिसके फलस्वरूप वातावरण को कई प्रकार के प्रदूषणों का सामना करना पड़ रहा है। खाने वाले पदार्थों में कीटनाशकों का जहर बढ़ने से नई पीढ़ी विभिन्न प्रकार की शारीरिक व मानसिक व्याधियों से ग्रसित हो रही है। 

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चाहे संसार भर के वातावरण प्रेमियों द्वारा जनमानस को वातावरणीय प्रदूषण के खतरों से अवगत करवाया जा रहा है फिर भी इस ओर उतनी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जा रहा जितनी गंभीरता से देने की आवश्यक्ता है। आज प्रकृति के जिन अनमोल उपहारों का प्रयोग हम कर रहे हैं, क्या कभी हमने सोचा है कि अगर हम इसी प्रकार निर्दयता से इनका दोहन करते रहे तो यह कितने समय तक बने रह सकेंगे? क्या हमारी आने वाली पीढि़यां भी इस सुंदर कुदरत को ऐसा ही सुंदर देख पाएँगी? क्या हमने कभी सोचा है कि हमारी गलतियों से वातावरण में पैदा हो रही गर्मी एक दिन पूरी पृथ्वी के विनाश का कारण बन जाएगी? क्या आप जानते हैं कि हमारी पृथ्वी का औसतन तापमान 15-20 डिगरी है जो कि कुछ ही सालों में 2-3 डिगरी बढ़ गया है। तापमान की इसी बढ़ोतरी को ही गलोबल वार्मिंग कहा जाता है। इस छोटे से शब्द ने पूरी दुनिया को हिला के रख दिया है। जब दुनिया के किसी हिस्से में प्राकृतिक तबाही का तांडव होता है। संसार के किसी क्षेत्र में बाढ़ आ जाती है व कहीं सूखा पड़ जाता है। बढ़ रही गलोबल वार्मिंग से हमारे वैज्ञानिक भी चिंतित हैं। यह इस हद तक बढ़ चुकी है कि इसे खत्म करना मुश्किल ही नहीं अपितु असंभव प्रतीत होता है।

श्रीमान निकोलस जो कि विश्व बैंक में अर्थ शास्त्री हैं। उन्होंने अपनी एक रिपोर्ट में चेतावनी दी कि संसार के लोगों लोगा की गतिविधियों में आई तबदीली के कारण जलवायु के बर्ताव में भी भिन्नता आई है। उन्होंने कहा कि गलोबल वार्मिंग को जल्दी से जल्दी कम करने की आवश्यकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक संसार की अर्थ व्यवस्था 6 ट्रिलीयन पौंड के बराबर कम हो जाएगी। और इसका कारण होगा हमारी गतिविधियों के कारण बदलता जलवायु। आपको जानकर हैरानी होगी कि बढ़े हुए तापमान से सारा हैबीटेट बदल जाएगा। एवं पूरा ईको सिस्टम खराब हो जाएगा। और इन सबके पीछे कारण सिर्फ एक ही है कि मनुष्य ने इस धरती माता का बेरहमी से दोहन कर इसे आज बेहद प्रदूषित स्थिति में ला कर खड़ा कर दिया है। मनुष्य को जल्द से जल्द जागना होगा कि प्रकृति मनुष्य की आवश्यकताओं को तो पूर्ण कर सकती है पर हवस को नहीं। अगर हम सचमुच जीना चाहते हैं व चाहते है कि हमारी आने वाली पुश्तें भी इस धरा पर जन्म ले सकें, तो हमें अपनी बीमार व गंदगी से भर चुकी ‘माँ धरती’ की सेहत की ओर ध्यान देना होगा। ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाकर इस धरा को फिर से ‘शस्य शयामला’ बनाना होगा। ताकि हरी भरी लहलहाई धरा, फिर से पक्षियों की चहचहाहट से चहचहा उठे। 

- सुखी भारती 

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