नन्हें-मुन्ने तेरी मुट्ठी में क्या (व्यंग्य)

By अरुण अर्णव खरे | Jan 04, 2020

 दूर कहीं बज रहे इस गाने "नन्हें-मुन्ने तेरी मुट्ठी में क्या" को सुनकर सरकारी अस्पताल में भर्ती एक बच्चे के मुँह से बेसुधी की स्थिति में निकला- "चन्द साँसें"। ये शब्द सुनकर पैर थम गए, मन भारी हो गया, हृदय के भीतर कुछ रिसता सा महसूस हुआ। सोचने लगा- "क्यों पड़ते हैं गरीब के बच्चे बीमार असमय मरने के लिए-- क्या उन्हें पता नहीं है कि इस संवेदनहीन व्यवस्था में उनकी उखड़ती साँसों को पूरी तरह उखाड़ फेंकने की भलीभाँति व्यवस्था की गई है। उनकी मौत किसी को झकझोरेगी नहीं अपितु एक आँकड़े के रूप में कागजों में दर्ज हो जाएगी। जब जरूरत होगी तो व्यवस्था उन कागजों को हाथ में लहराते हुए बताएगी कि गत वर्ष इन्हीं महीनों में 101 बच्चों की मौत हुई थी जबकि इस साल यह आँकड़ा मात्र 99 है। पिछले एक साल में स्वास्थ्य सेवाओं में लगातार किए गए सुधार से इस वर्ष शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज हुई है अगले साल यह आँकड़ा और भी नीचे लाने के प्रयास किए जाएँगे।" 

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जितना महत्वपूर्ण यह डायलॉग है उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण कागज होते हैं। कागज न हों तो कुछ भी सिद्ध करना मुश्किल हो जाए इसलिए कागज बनाने और उनको सहेज कर रखने का रिवाज बनाया गया है। पाँच साल पहले कितने बच्चे किस कारण से मरे थे यह तो कागज ही बता पाएँगे। कागज हों तो बात की विश्वसनीयता बढ़ जाती है, बात को मनवाने का आत्मविश्वास आ जाता है, डंके की चोट पर पुरानी सरकारों पर निष्क्रियता का आरोप मढ़ सकते हैं, संवेदनहीनता को भी संवेदनशीलता सिद्ध कर सकते हैं। कागज की कथा हरिकथा जैसी ही अनंत है।

उस बच्चे के शब्दों से व्यथित हुए हृदय के साथ उन्होंने बच्चे के सिर पर हाथ फेरा- "बेटे ऐसा नहीं कहते, तुम देश का भविष्य हो"

वह नींद में फिर बुदबुदाया- "भविष्य-- यहाँ से बच भी गया तो कोई दरिंदा शोषण करके गला घोंट देगा या कोई अपहर्ता बेंचने के लिए अपहरण कर ले जाएगा या फिर छिपकली गिरने से जहरीला हुआ मिड डे मील खाकर फिर यहीं आ जाऊँगा, हमें भविष्य मानता कौन है-- हम एक आँकड़े भर हैं जिंदा रहने के साथ भी और जिंदा रहने के बाद भी।"

निरुत्तर कर दिया था उसने। लगातार सोच में पड़ा हूँ पर अभी तक कोई उत्तर नहीं मिल सका है जो उसे दे सकूँ।

अरुण अर्णव खरे

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