निर्जला एकादशी का व्रत करने से ही मिल जाता है 24 एकादशियों के व्रत का फल

By शुभा दुबे | Jun 12, 2019

निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास में शुक्ल पक्ष के दिन पड़ती है। मान्यता है कि साल भर में जो चौबीस एकादशियां पड़ती हैं उनमें निर्जला एकादशी सर्वश्रेष्ठ है। यदि आपने 24 में से मात्र निर्जला एकादशी का व्रत रख लिया तो सभी 24 एकादशी का व्रत करने का पुण्य प्राप्त हो जाता है। निर्जला एकादशी में चूँकि जल नहीं पिया जाता इसलिए इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है। इस व्रत को स्त्री और पुरुष दोनों ही कर सकते हैं। इस दिन व्रत का संकल्प लेकर ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करना चाहिए और वस्त्र, अन्न आदि तथा संभव हो तो गोदान भी करना चाहिए।

व्रत विधान

इस दिन पानी नहीं पिया जाता इसलिए यह व्रत अत्यधिक श्रम साध्य होने के साथ−साथ कष्ट एवं संयम साध्य भी है। जल पान के निषिद्ध होने पर भी इस व्रत में फलाहार के पश्चात दूध पीने का विधान है। इस दिन निर्जल व्रत करते हुए शेषशायी रूप में भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व है। इस एकादशी का व्रत करके यथासंभव अन्न, वस्त्र, छतरी, जूता, पंखी तथा फल आदि का दान करना चाहिए। इस दिन जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल लाभ प्राप्त हो जाता है।


निर्जला एकादशी व्रत कथा

एक दिन महर्षि व्यास ने पांडवों को एकादशी के व्रत का विधान तथा फल बताया। इस दिन जब वे भोजन करने के दोषों की चर्चा करने लगे तो भीमसेन ने अपनी आपत्ति प्रकट करते हुए कहा, ''पितामह! एकादशी का व्रत करते हुए समूचा पांडव परिवार इस दिन अन्न जल न ग्रहण करे, आपके इस आदेश का पालन मुझसे नहीं हो पाएगा। मैं तो बिना खाए रह ही नहीं सकता। अतः चौबीस एकादशियों पर निराहार रहने की कष्ट साधना से बचने के लिए मुझे कोई एक ऐसा व्रत बताइए जिसे करने पर मुझे विशेष असुविधा न हो और वह फल भी मिल जाए जो अन्य लोगों को चौबीस एकादशी व्रत करने पर मिलेगा।''

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महर्षि व्यास जानते थे कि भीमसेन के उदर में वृक नामक अग्नि है। इसीलिए अधिक मात्रा में भोजन करने पर भी उनकी भूख शांत नहीं होती। अतः भीमसेन के इस प्रकार के भाव को समझ महर्षि व्यास ने आदेश दिया, ''प्रिय भीम! तुम ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को ही मात्र एक व्रत किया करो। इस व्रत में स्नान आचमन के समय पानी पीने का दोष नहीं होता। इस दिन अन्न न खाकर, जितने पानी में एक माशा जवन की स्वर्ण मुद्रा डूब जाए, ग्रहण करो। इस प्रकार यह व्रत करने से अन्य तेईस एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाएगा तथा पूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलेगा।'' क्योंकि भीम मात्र एक एकादशी का व्रत करने के लिए महर्षि के सामने प्रतिज्ञा कर चुके थे, इसलिए इस व्रत को करने लगे। इसी कारण इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है।

-शुभा दुबे

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