Bihar CM Nitish Kumar ने भावनात्मक अंदाज में चल दिया ‘गौरव कार्ड’, बोले- अब बिहारी होना गर्व की बात

By नीरज कुमार दुबे | Nov 01, 2025

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर अपने पुराने लेकिन असरदार राजनीतिक हथियार ‘सुशासन’ और ‘विकास’, को धारदार अंदाज़ में आगे बढ़ाया है। अपने वीडियो संदेश में नीतीश ने कहा, “अब बिहारी होना गर्व की बात है। 2005 से पहले बिहार की क्या हालत थी, यह किसी से छिपा नहीं। हमने कानून का राज स्थापित किया और विकास को हर गांव तक पहुंचाया।” देखा जाये तो यह बयान केवल एक भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति है, जो इस चुनाव में पहचान, स्थिरता और प्रधानमंत्री मोदी के सहयोग को एक साथ साधने की कोशिश करती दिख रही है।

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देखा जाये तो नीतीश की यह अपील केवल जदयू के लिए नहीं, बल्कि राजग के सामूहिक ब्रांड के लिए है— जिसमें मोदी की लोकप्रियता और केंद्र की योजनाओं को बिहार के वोटरों के सामने ‘स्थिरता के प्रतीक’ के रूप में रखा गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश की यह अपील डबल इंजन सरकार की छवि को मजबूती देने का प्रयास है, ताकि भाजपा-जदयू गठबंधन लालू-तेजस्वी के “परिवर्तन” अभियान को भावनात्मक स्तर पर काउंटर कर सके।

साथ ही नीतीश कुमार का यह संदेश खास तौर पर शहरी मध्यम वर्ग, महिला मतदाताओं और पहली बार वोट देने वाले युवाओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है— जो “स्थिरता और विकास” के एजेंडे को “जातीय समीकरणों” से ऊपर देखते हैं। हालाँकि, विपक्ष आरजेडी और कांग्रेस इस नैरेटिव को “थका हुआ विकास मॉडल” बताकर चुनौती दे रहे हैं। उनका तर्क है कि “गौरव की बात” तो तब होगी जब रोज़गार और पलायन की समस्या खत्म होगी। फिर भी, नीतीश का यह भावनात्मक आह्वान बिहार के मतदाताओं में स्थिरता बनाम अनिश्चितता की बहस को हवा दे सकता है — और यही इस चुनाव का निर्णायक मोड़ बन सकता है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि नीतीश कुमार जानते हैं कि 2025 का चुनाव उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन परीक्षा है। उनका संदेश— “अब बिहारी होना गर्व की बात है”, न सिर्फ़ अतीत की उपलब्धियों का स्मरण है, बल्कि एक भावनात्मक पुल भी है जो मतदाताओं को यह सोचने पर मजबूर करता है कि “क्या बदलाव का जोखिम उठाना ज़रूरी है, जब राज्य पटरी पर है?” बहरहाल, अगर यह संदेश जनता के मन में उतर गया, तो राजग एक बार फिर सत्ता में वापसी कर सकता है। लेकिन अगर मतदाता इसे “पुरानी कहानी का दोहराव” मान लेता है, तो यह नीतीश युग के धीमे अवसान की शुरुआत भी साबित हो सकता है।

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