रूस-यूक्रेन संकट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई सीधा असर नहीं, जानिए पूरा मामला

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Feb 25, 2022

नयी दिल्ली। रूस-यूक्रेन संकट से द्विपक्षीय कारोबार के मामले में भारत पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन तेल के दाम में तेजी आने से अर्थव्यवस्था के समक्ष जोखिम पैदा हो सकता है। शुक्रवार को जारी बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी) अर्थशास्त्रीय शोध रिपोर्ट में यह आशंका जताई गई। इसमें कहा गया है, ‘‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल केदाम 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गये हैं। इससे बाह्य स्तर पर स्थिरता तथा रुपये की गतिविधियों को लेकर जोखिम है।’’ रूस ने यूक्रेन पर सैन्य धावा बोला है। इससे जनजीवन प्रभावित होने के साथ क्षेत्र में विभिन्न समस्याएं बढ़ेंगी। पश्चिमी देश रूस के कदम के विरोध में उस पर वित्तीय पाबंदियां लगा रहे हैं। दुनिया के अन्य भागों में आर्थिक प्रभाव जिंसों के ऊंचे दाम, मुद्रास्फीति में तेजी और वृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव यानी गतिहीन मुद्रास्फीति (स्टैगफ्लेशन) के रूप में देखने को मिल सकता है। 

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इनवेस्को ने एक रिपोर्ट में कहा, ‘‘अगर यह संकट बढ़ता है और ईरान की तरह रूस को पश्चिमी भुगतान और त्वरित संदेश प्रणाली (स्विफ्ट) से बेदखल किया जाता है तो ऊर्जा आपूर्ति में बाधा से गंभीर गतिहीन मुद्रास्फीति की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।’’ रूस, यूरोप को 40 प्रतिशत गैस की आपूर्ति करता है जबकि कोयला समेत ठोस ईंधन की आपूर्ति में उसकी हिस्सेदारी आधी है। साथ ही एक तिहाई तेल की भी आपूर्ति करता है। अब तक अमेरिका ने रूस को वैश्विक भुगतान प्रणाली के उपयोग से प्रतिबंधित नहीं किया है। बीओबी आर्थिक शोध रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘रूस-यूक्रेन संकट से द्विपक्षीय कारोबार को लेकर भारत पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन तेल के दाम में तेजी से अर्थव्यवस्था के लिये बड़ा जोखिम है।’’

वित्त वर्ष 2022-23 के केंद्रीय बजट और आरबीआई की द्विमासिक मौद्रिक नीति दोनों इस संकट से पहले पेश की गयी और उसमें कच्चे तेल की ऊंची कीमत के प्रभाव को शामिल नहीं किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘बजट और आरबीआई की मौद्रिक नीति में कच्चे तेल की कीमत 75 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान रखा गया है। हालांकि यह कीमत स्तर आने वाले समय में चुनौतीपूर्ण हो सकता है।’’ भारत अपनी तेल जरूरतों का 80 प्रतिशत आयात करता है। वित्त वर्ष 2020-21 में भारत ने 82.7 अरब डॉलर का तेल आयात किया था। जबकि चालू वित्त वर्ष में अप्रैल-जनवरी के दौरान 125.5 अरब डॉलर का तेल आयात किया गया है। हालांकि अब तेल की कीमत 8 साल के उच्च स्तर पर है, ऐसे में तेल आयात बिल ऊंचा रह सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘वित्त वर्ष 2021-22 में तेल आयात 155.5 अरब डॉलर रह सकता है। आर्थिक गतिविधियों में सुधार के साथ अगले वित्त वर्ष में भी तेल आयात में सुधार की उम्मीद है। तेल मांग में 5 प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद है।’’ इसमें कहा गया है, ‘‘हमारा अनुमान है कि तेल के दाम में स्थायी तौर पर 10 प्रतिशत की वृद्धि से तेल आयात में 15 अरब डॉलर या जीडीपी का 0.4 प्रतिशत का इजाफा हो सकता है। इससे चालू खाते का घाटा बढ़ेगा।’’ तेल के दाम में तेजी से रुपये पर भी असर पड़ा है। इससे व्यापार घाटा बढ़ेगा और अंतत: अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मोर्चे पर स्थिरता प्रभावित होगी। 

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रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कच्चे तेल के दाम में 10 प्रतिशत की तेजी से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष 0.15 प्रतिशत प्रभाव पड़ेगा। जबकि थोक मुद्रास्फीति का कच्चा तेल संबंधित उत्पादों में भारांश 7.3 प्रतिशत है। ऐसे में 10 प्रतिशत की वृद्धि से प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से थोक महंगाई दर में करीब एक प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है।

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