Omar Abdullah ने LG Manoj Sinha की प्रशासनिक परिषद को सौंपे गये अधिकार वापस लिये, X पर पोस्ट किया- I am back

By नीरज कुमार दुबे | Oct 17, 2024

जम्मू-कश्मीर में बुधवार को नव निर्वाचित सरकार के कार्यभार संभालने के कुछ ही घंटों बाद प्रशासन ने कई ऐसे आदेशों को रद्द कर दिया जिनके तहत केंद्र शासित प्रदेश के शासन के लिए उपराज्यपाल की अध्यक्षता वाली प्रशासनिक परिषद को अधिकार सौंपे गए थे। एक आधिकारिक बयान के अनुसार, 2020 में शुरू किए गए कुछ सरकारी आदेश वापस ले लिए गए हैं। इन्हें रद्द करने का आदेश सामान्य प्रशासन विभाग के आयुक्त/सचिव संजीव वर्मा ने जारी किया।

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हम आपको बता दें कि जम्मू-कश्मीर जब एक पूर्ण राज्य था तब 2009 से 2014 के बीच भी अब्दुल्ला मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उन्होंने अपने नए प्रशासन की रूपरेखा तय करने के लिए प्रशासनिक सचिवों के साथ एक परिचयात्मक बैठक की। बैठक में उपमुख्यमंत्री सुरेन्द्र कुमार चौधरी के साथ-साथ मंत्री सकीना मसूद इटू, जावेद अहमद राणा, जावेद अहमद डार और सतीश शर्मा भी उपस्थित थे। बैठक में मुख्य सचिव अटल डुल्लू, पुलिस महानिदेशक नलिन प्रभात और सभी विभागों के प्रशासनिक सचिव मौजूद थे। डुल्लू ने नए मुख्यमंत्री का गर्मजोशी से स्वागत किया और अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार को प्रशासन का पूरा सहयोग देने की बात कही। डुल्लू ने कहा, “हम सरकार के दृष्टिकोण को पूरा करने और लोगों की प्रगति सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह समर्पित हैं।” अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने में अधिकारियों की भूमिका की प्रशंसा की।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि क्षेत्र के लोगों ने लोकतंत्र, सरकार और इसकी संस्थाओं में बहुत भरोसा जताया है। मुख्यमंत्री ने कहा, “हमें इस अवसर पर आगे बढ़कर उन उम्मीदों पर खरा उतरना चाहिए जो हमसे की गयी हैं।” शासन पर ध्यान केंद्रित करते हुए मुख्यमंत्री ने जनता को सर्वोपरि रखने की आवश्यकता दोहराई तथा इस बात पर प्रकाश डाला कि सरकार की प्राथमिक भूमिका नागरिकों की सेवा करना तथा उनकी चिंताओं का समाधान करना है। उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले कुछ वर्षों में जनता और सरकार के बीच खाई पैदा हो गई है, लेकिन उन्होंने इस दूरी को कम करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता भी व्यक्त की। उन्होंने कहा, “हमारे प्रशासन का दृष्टिकोण लोगों के अनुकूल होगा। हमने सिविल सचिवालय में सकारात्मक सोच के साथ प्रवेश किया है, जिसका ध्यान जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए सर्वोत्तम सेवाएं प्रदान करने पर केंद्रित है।” अब्दुल्ला ने इस बात पर जोर दिया कि नागरिकों और सरकार के बीच की खाई को पाटना सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा, “इसी कारण से पूरे भारत में लोकतांत्रिक सरकारों को प्राथमिकता दी जाती है और हम लोगों को सरकार और उसकी संस्थाओं के करीब लाने के लिए अथक प्रयास करेंगे।” अब्दुल्ला ने अधिकारियों के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी जताई तथा पूर्ण सहयोग का वचन दिया तथा बदले में भी ऐसा ही सहयोग मिलने की अपेक्षा की।

हम आपको यह भी बता दें कि इस साल जून में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में शिकस्त का सामना करने के महज चार महीने बाद विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल कर केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने तक, उमर अब्दुल्ला का सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। जून में, उमर अब्दुल्ला को लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिली थी, जब वह बारामुला सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार अब्दुल रशीद शेख, जिन्हें इंजीनियर रशीद के नाम से जाना जाता है, से दो लाख से अधिक मतों के अंतर से हार गए थे। जब अन्य दल विधानसभा चुनाव की तैयारियों में व्यस्त थे, नेकां उपाध्यक्ष ने घोषणा की थी कि जम्मू-कश्मीर को केंद्र द्वारा राज्य का दर्जा बहाल किये जाने तक वह चुनाव से बाहर रहेंगे। हालांकि, उन्होंने जल्द ही अपना रुख बदल लिया और नेकां ने उन्हें एक नहीं बल्कि दो सीट बडगाम और गांदरबल से चुनाव मैदान में उतारा। उन्होंने दोनों सीट पर आसानी से जीत हासिल की।

अगस्त, 2019 में संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किये जाने के बाद, नेकां का समर्थन अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है तथा मतदाताओं के एक बड़े हिस्से ने क्षेत्र की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को अपना समर्थन दिया है। स्ट्रैथक्लाइड विश्वविद्यालय से एमबीए की पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले उमर 1998 के चुनाव में मैदान में उतरे थे और 28 वर्ष की आयु में 12वीं लोकसभा के लिए चुने गए तथा संसद के निचले सदन के सबसे युवा सदस्य बने थे। वह 1999 में पुनः निर्वाचित हुए और उद्योग एवं वाणिज्य राज्य मंत्री बने तथा 2000 में विदेश राज्य मंत्री बने, लेकिन गोधरा कांड के बाद उन्होंने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया। अपने पिता द्वारा कमान सौंपे जाने के बाद उमर 2002 में परिवार के गढ़ गांदरबल से उम्मीदवार काजी मोहम्मद अफजल से विधानसभा चुनाव हार गए। वर्ष 2004 में वह फिर से लोकसभा के लिए चुने गए। वर्ष 2008 के अंत में हुए विधानसभा चुनाव में उन्होंने गांदरबल सीट जीती और नेशनल कॉन्फ्रेंस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। वह 38 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बने और देश में सबसे युवा मुख्यमंत्रियों में से एक थे तथा कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया।

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