By डा. अनीष व्यास | Oct 24, 2026
सनातन धर्म में शरद पूर्णिमा को बेहद खास त्योहार माना जाता है। शरद पूर्णिमा के दिन देवी लक्ष्मी जी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। इसके अलावा भगवान विष्णु की पूजा करने से जीवन में धन की कमी दूर होती है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर-जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस वर्ष शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर 2026 को मनाई जाएगी। हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को ही शरद पूर्णिमा कहा जाता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस दिन आकाश से अमृत की बूंदों की वर्षा होती है। शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है। अंतरिक्ष के समस्त ग्रहों से निकलने वाली सकारात्मक ऊर्जा चंद्रकिरणों के माध्यम से पृथ्वी पर पड़ती हैं। पूर्णिमा की चांदनी में खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखने के पीछे वैज्ञानिक तर्क यह है कि चंद्रमा के औषधीय गुणों से युक्त किरणें पड़ने से खीर भी अमृत के समान हो जाएगी। उसका सेवन करना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होगा।
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ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि अगर आप शरद पूर्णिमा का व्रत रखते हैं, तो 25 अक्टूबर की रात चंद्रमा की पूजा करें। इस दौरान चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना करें। शरद पूर्णिमा पर खीर बनाकर चांदनी में रखने की परंपरा भी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस रात खीर को चंद्रमा की रोशनी में रखना शुभ माना जाता है। इसके बाद 26 अक्टूबर की सुबह स्नान और दान-पुण्य करें। जरूरतमंदों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा दें। व्रत का पारण अपनी परंपरा और व्रत के नियमों के अनुसार करें। इस तरह शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की पूजा 25 अक्टूबर की रात और स्नान-दान 26 अक्टूबर की सुबह किया जाएगा।
ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया किदेश के कई इलाकों में शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। कोजागरी पूर्णिमा का त्योहार पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। कोजागरी पूर्णिमा पर लक्ष्मी जी की विशेष पूजा की जाती है। साथ में भगवान विष्णु की भी पूजा की जाती है। पश्चिम बंगाल व ओडिशा में मान्यता है कि विधिपूर्वक पूजा करने से व्यक्ति को आर्थिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।
भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि पौराणिक मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने शरद पूर्णिमा पर ही महा रास की रचना की थी। इस दिन चंद्र देवता की विशेष पूजा की जाती है और खीर का भोग लगाया जाता है। रात में आसमान के नीचे खीर रखी जाती है। ऐसा माना जाता है कि अमृत वर्षा से खीर भी अमृत के समान हो जाती है। शास्त्रों के अनुसार इस तिथि को चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है।
भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि प्रदोष एवं निशीथव्यापिनी आश्विन शुक्ल पूर्णिमा में शरद् पूर्णिमा एवं कोजागरी पूर्णिमा का व्रत होता है। यदि पहले दिन पूर्णिमा निशीथव्यापिनी हो और दूसरे दिन प्रदोषव्यापिनी न हो तो यह व्रत पहले दिन ही करना चाहिए।
यथा आश्चिनपौर्णमास्यां कोजागर व्रतम्। सा पूर्वत्रैव निशीथव्याप्तौ पूर्वा ।।'
इस वर्ष पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर 2026 ई. को पूर्णतः निशीथ (अर्धरात्रि) एवं प्रदोष को व्याप्त कर रही है। दूसरे दिन 26 अक्टूबर 2026 को यह प्रदोष को स्पर्श भी नहीं कर रही है। अतः 25 अक्टूबर 2026 को ही शरद् एवं कोजागरी पूर्णिमा का व्रत होगा।
भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि शरद पूर्णिमा के दिन रवि योग सुबह में 6:28 मिनट से शुरू होगा और शाम को 7:22 मिनट तक रहेगा। वहीं उस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग शाम को 7:22 मिनट से बनेगा और अगले दिन 26 अक्टूबर को सुबह 6:29 मिनट तक रहेगा।
भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां लक्ष्मी की समुद्र मंथन से उत्पत्ति शरद पूर्णिमा के दिन ही हुई थी। इसलिए इस तिथि को धन-दायक भी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन मां लक्ष्मी धरती पर विचरण करती हैं और जो लोग रात्रि में जागकर मां लक्ष्मी का पूजन करते हैं, वे उस पर अपनी कृपा बरसाती हैं और धन-वैभव प्रदान करती हैं। शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ होता और पृथ्वी पर चारों चंद्रमा की उजियारी फैली होती है। धरती जैसे दूधिया रोशनी में नहा जाती है। माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत की बरसात होती है, इसलिए रात्रि में चांद की रोशनी में खीर रखने की परंपरा भी है।
भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करें। यदि नदी में स्नान नहीं कर सकते तो घर पर ही पानी में गंगाजल डालकर स्नानादि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अब एक लकड़ी की चौकी या पाटे पर लाल कपड़ा बिछाएं और गंगाजल से शुद्ध करें। चौकी के ऊपर मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें और लाल चुनरी पहनाएं। अब लाल फूल, इत्र, नैवेद्य, धूप-दीप, सुपारी आदि से मां लक्ष्मी का विधिवत पूजन करें। इसके बाद मां लक्ष्मी के समक्ष लक्ष्मी चालीसा का पाठ करें। पूजन संपन्न होने के बाद आरती करें। शाम के समय पुनः मां और भगवान विष्णु का पूजन करें और चंद्रमा को अर्घ्य दें। चावल और गाय के दूध की खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रखें। मध्य रात्रि में मां लक्ष्मी को खीर का भोग लगाएं और प्रसाद के रुप में परिवार के सभी सदस्यों को खिलाएं।
- डा. अनीष व्यास
भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक