By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Jan 08, 2026
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 82 के तहत व्यक्ति को भगोड़ा घोषित करने का आदेश, उस व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका पर विचार करने पर पूर्ण रोक नहीं लगाता है।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति गौतम चौधरी ने मोनिका नाम की महिला की अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली और कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किए जाने से कुछ ही दिन पूर्व एक बच्चे को जन्म दिया था।
अदालत ने मंगलवार को जारी आदेश में कहा, “ऐसा नहीं है कि सभी मामलों में अग्रिम जमानत देने के आवेदन पर विचार करने पर रोक है क्योंकि मौजूदा मामले में जब याचिकाकर्ता के खिलाफ कुछ निश्चित प्रक्रियाएं की जा रही थीं, तब वह गर्भवती थी और संबंधित अदालत के समक्ष पेश होने में असमर्थ थी। यह अदालत इस मामले को अग्रिम जमानत देने के लिए उपयुक्त पाती है।”
मौजूदा मामले में पेशे से नर्स याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 316 (गर्भ में पल रहे शिशु की मृत्यु का कारण बनना जो गैर इरादतन हत्या के समान है), 420 (धोखाधड़ी), 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना), 120-बी (आपराधिक षड़यंत्र) और चिकित्सा परिषद अधिनियम की सुसंगत धाराओं के तहत दर्ज एक मामले में अग्रिम जमानत देने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप है कि जिस अस्पताल में कथित घटना घटी, वहां वह नर्स के तौर पर सेवारत थी। शिकायतकर्ता के वकील ने यह कहते हुए अग्रिम जमानत का विरोध किया कि चूंकि याचिकाकर्ता के खिलाफ पहले गैर जमानती वारंट और भगोड़ा घोषित करने का आदेश जारी किया जा चुका है, इसलिए वह अग्रिम जमानत प्राप्त करने की पात्र नहीं है।
वहीं, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता महज एक नर्स थी और सह आरोपी की निगरानी में काम कर रही थी और उसका कथित घटना से सीधा कोई संबंध नहीं था।
भगोड़ा घोषित किए जाने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि आरोप पत्र नवंबर, 2024 में दाखिल किया गया और मई, 2025 में संज्ञान लिया गया। हालांकि, 10 अक्टूबर, 2025 को जब गैर जमानती वारंट जारी किया गया, याचिकाकर्ता गर्भवती थी और छह अक्टूबर, 2025 को उसने एक बच्चे को जन्म दिया था।