Prabhasakshi NewsRoom: ‘त्रिशूल’ की ताकत देख कांपा पाकिस्तान, पाक मीडिया चैनलों ने किया दावा- भारत ने 300 ब्रह्मोस मिसाइलें तैनात कीं

By नीरज कुमार दुबे | Nov 01, 2025

भारत की पश्चिमी सीमाओं पर “त्रिशूल” नामक सैन्य अभ्यास ने पाकिस्तान की नींद हराम कर दी है। गुजरात और राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों से लेकर संवेदनशील सर क्रीक क्षेत्र तक भारतीय सेनाओं की यह विशालकाय तैयारी न केवल रणनीतिक रूप से सशक्त संदेश देती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि नया भारत अब केवल सीमाओं की रक्षा नहीं करता, बल्कि आक्रामक तत्परता की स्थिति में है।

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दूसरी ओर, “त्रिशूल” शुरू होते ही पाकिस्तानी मीडिया में हड़कंप मच गया। कराची से लेकर इस्लामाबाद तक टीवी स्टूडियो में “घबराहट” और “आपात तैयारी” की खबरें छा गईं। पाकिस्तान की वायुसेना ने अपने एयरबेस को हाई अलर्ट पर रख दिया, NOTAMs (एयरस्पेस प्रतिबंध) जारी किए और सीमा के पास लड़ाकू विमान तैनात कर दिए। पाकिस्तानी विश्लेषकों का यह स्वीकार करना कि “भारतीय अभ्यास की स्केल ने सुरक्षा प्रतिष्ठान में घबराहट फैला दी है”— दरअसल भारत के रणनीतिक वर्चस्व की अनकही स्वीकारोक्ति है। जिस देश के लिए कुछ साल पहले “सर्जिकल स्ट्राइक” और “बालाकोट एयर स्ट्राइक” केवल चेतावनी थीं, आज वह भारत के सैन्य अभ्यास भर से मनोवैज्ञानिक दबाव में है।

हम आपको बता दें कि पाकिस्तानी सोशल मीडिया और कुछ समाचार चैनलों ने दावा किया कि भारत “300 ब्रह्मोस मिसाइलें” तैनात कर रहा है। देखा जाये तो यह भ्रामक प्रचार है। वास्तविकता यह है कि भारत के पास कुल मिलाकर 1,500 से अधिक ब्रह्मोस मिसाइलों का भंडार है, परंतु किसी एक क्षेत्र में इतनी संख्या में तैनाती का प्रश्न ही नहीं उठता। दरअसल, भारतीय नौसेना का लक्ष्य वर्ष 2030 तक अपने पूरे बेड़े में 300 ब्रह्मोस मिसाइलों के एक साथ प्रक्षेपण की क्षमता हासिल करना है। यह एक दीर्घकालिक आधुनिकीकरण योजना है, न कि “त्रिशूल” अभ्यास की वास्तविक तैनाती। पाकिस्तान का “300 ब्रह्मोस” वाला दावा उसी मनोवैज्ञानिक असुरक्षा का हिस्सा है, जो उसके पूरे सैन्य तंत्र को जकड़ चुकी है। जब किसी देश का डर उसके तथ्यों पर भारी पड़ने लगे तो समझ लीजिए कि शक्ति संतुलन किस दिशा में झुक चुका है।

देखा जाये तो “त्रिशूल” से पाकिस्तान के भीतर जो डर बैठा है, वह केवल हथियारों का डर नहीं है, यह उस नए भारत के आत्मविश्वास का डर है, जो अब किसी उकसावे पर प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि रणनीतिक प्रभुत्व दिखाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस समय पाकिस्तान आर्थिक संकट, राजनीतिक विखंडन और आंतरिक चरमपंथ से जूझ रहा देश है। उसकी सेना, जो दशकों तक भारत-विरोधी राष्ट्रवाद पर टिके रहने की आदी थी, अब जानती है कि भारतीय जवाब केवल सीमित नहीं रहेगा। भारत के पास आज राफेल स्क्वाड्रन, सुखोई-30MKI बेड़े, ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइलें, पिनाका रॉकेट सिस्टम और नेटवर्क सेंट्रिक युद्ध तकनीक जैसी क्षमताएँ हैं, जिनका सामना पाकिस्तान किसी भी मोर्चे पर नहीं कर सकता। इसलिए पाकिस्तान की “घबराहट” दरअसल एक मनोवैज्ञानिक पराजय है। यह वही डर है जो 1971 में महसूस हुआ था और अब वह डर फिर से कराची और रावलपिंडी की गलियों में लौट आया है।

देखा जाये तो भारत अब उस युग में नहीं है जब “संयम” को कमजोरी समझा जाता था। “त्रिशूल” अभ्यास यह संकेत देता है कि भारत शांति चाहता है, लेकिन आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा। पाकिस्तान ने दशकों तक “नॉन-स्टेट एक्टर्स” और आतंकवाद के जरिये भारत को दबाने की कोशिश की, परंतु आज वही रणनीति उसके अपने अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न बन गई है।

बहरहाल, पाकिस्तान में बैठा डर अब उसकी सीमाओं से बाहर दिख रहा है, मीडिया रिपोर्टों, सुरक्षा तैयारियों और राजनीतिक बयानबाज़ी में। भारत की “त्रिशूल” कवायद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उपमहाद्वीप में सैन्य और रणनीतिक संतुलन अब पूरी तरह भारत के पक्ष में झुक चुका है। पाकिस्तान जिस तरह भारत की हर सैन्य हलचल को “खतरे” की तरह देखता है, वह उसकी रक्षा मानसिकता की पराजय का प्रमाण है। भारत को अब किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं कि उसका अभ्यास, उसका आत्मविश्वास और उसकी तैयारी ही उसका उत्तर हैं। “त्रिशूल” की यह गूंज केवल रेगिस्तान में नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सत्ता-गलियों में भी सुनाई दे रही है— जहाँ डर अब स्थायी नागरिक बन चुका है।

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