अपने पहले चुनाव में कांग्रेस के कद्दावर नेता मिश्री सदा को हरा कर विधानसभा पहुंचे थे पासवान

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Nov 06, 2020

नयी दिल्ली। भारतीय राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहे जाने वाले और केंद्र की अधिकतर सरकारों में मंत्री के रूप में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के बारे में बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि उन्होंने अपने जीवन का पहला चुनाव पिता की मर्जी के खिलाफ एक ऐसे दल से लड़ा, जिसका कोई उम्मीदवार कांग्रेस के कद्दावर नेता एवं तत्कालीन विधायक मिश्री सदा के खिलाफ चुनावी मैदान में ताल ठोकने को तैयार नहीं था। दिवंगत पासवान ने बिहार के खगड़िया जिले की अलौली विधानसभा सीट से पहला चुनाव 1969 में लड़ा था। बिहार विधानसभा के इस मध्यावधि चुनाव में उन्हें अपने व्यक्तिगत प्रयासों से समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) का टिकट मिला और उन्होंने मिश्री सदा को 906 मतों से पराजित कर सभी को अचंभे में डाल दिया था। पासवान के पिता जामुनदास पासवान नहीं चाहते थे कि उनका पुत्र सरकारी नौकरी छोड़कर राजनीति के मैदान में कूदे और चुनाव लड़ें। वह कतई नहीं चाहते थे कि उनका बेटा संसोपा जैसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े। राम विलास पासवान के पिता संसोपा को जेल जाने वाले लोगों की पार्टी मानते थे और चाहते थे कि उनका बेटा कांग्रेस से चुनाव लड़े। राम विलास पासवान के बारे में यह खुलासा वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप श्रीवास्तव ने पेंग्विन से प्रकाशित दलित नेता की जीवनी ‘‘पासवान: संकल्प, साहस और संघर्ष’’ में किया है। गत आठ अक्टूबर को राजधानी दिल्ली के एक अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद राम विलास पासवान का निधन हो गया। वह आठ बार लोकसभा के सदस्य चुने गए और उन्होंने कई बार हाजीपुर संसदीय सीट से सबसे ज्यादा मतों के अंतर से जीतने का रिकॉर्ड अपने नाम किया। पांच दशक लंबे राजनीतिक जीवन में वह लगभग हमेशा केन्द्र की सभी सरकारों में शामिल रहे। राम विलास पासवान के निधन के बाद उनके बेटे चिराग पासवान अब लोजपा की बागडोर संभाल रहे हैं। 

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बिहार विधानसभा चुनाव में वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से अलग होकर अकेले ताल ठोक रहे हैं। पुस्तक में राम विलास पासवान के भाई एवं पूर्व सांसद रामचंद्र पासवान के हवाले से यह बताया गया है कि ‘‘बाबूजी’’ (जामुनदास पासवान) नहीं चाहते थे कि रामविलास पासवान राजनीति में जाएं। रामचंद्र के अनुसार ‘‘भैया जब अलौली से संसोपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे, तो बाबूजी को इसकी जानकारी नहीं थी। जब उन्हें पता चला तो वह बहुत नाराज हुए। चुनाव लड़ने के उनके फैसले को बाबूजी ने किसी तरह बर्दाश्त भी कर लिया पर वे चाहते थे कि भैया किसी ‘बढ़िया’ पार्टी से चुनाव लड़ें। वह संसोपा को जेल जाने वाली पार्टी मानते थे। उनका मन था कि भैया कांग्रेस से चुनाव लड़े।’’ रामचंद्र पासवान का भी इसी साल जुलाई में निधन हो गया। राम विलास पासवान को संसोपा का टिकट मिलने की घटना भी बेहद दिलचस्प है, जिसका पुस्तक में विस्तृत विवरण है। पुस्तक के मुताबिक, अलौली से संसोपा के टिकट पर पासवान से पहले किसी ने चुनाव नहीं लड़ा था। पुस्तक में बताया गया है कि कांग्रेस के मिश्री सदा वहां से जीतते चले आ रहे थे और निर्दलीय उम्मीदवार ही उनका मुकाबला करते थे। पुस्तक में कहा गया है कि 1969 के मध्यावधि चुनाव में राम विलास पासवान को संसोपा का टिकट आसानी से मिल गया, क्योंकि वह पार्टी टिकट के एकमात्र दावेदार थे। अलौली से मिश्री सदा के खिलाफ पार्टी का कोई दूसरा नेता मैदान में उतरना ही नहीं चाहता था। खगड़िया में 1946 में जन्मे राम विलास पासवान का चयन पुलिस सेवा में हो गया था, लेकिन उन्होंने अपने मन की सुनी और राजनीति में चले आए। अलौली की जीत से शुरू हुआ रामविलास पासवान का राजनीतिक सफर लगातार आगे बढ़ता रहा और नित्य नई ऊंचाइयां छूता रहा। उन्हें देश के प्रमुख दलित नेताओं में शुमार किया जाने लगा। लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के संस्थापक रहे पासवान जीवन के अंतिम क्षणों में केंद्र सरकार में उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री रहे। पुस्तक में चिराग पासवान ने अपने पिता के बारे में कहा है कि राजनीति में आने के बाद उनके पिता से ‘‘सही मायने में’’ उनकी बातचीत शुरू हुई। उन्होंने कहा कि राजनीति में आने से पहले ‘‘मुझे याद नहीं है कि मैंने कभी थोड़े समय के लिए ही सही, पापा से कभी आंख मिलाकर बात की हो।’’ पिता से मिली सीख का जिक्र करते हुए चिराग ने कहा, ‘‘पिता जी, तीन बातें हमेशा कहते रहे। पहली, इंसान जो कुछ अपनी गलतियों से सीखता है, वह बेहतर होता है। दूसरा, मछली के बच्चे को तैरना नहीं सिखाया जाता, वह खुद तैरना सीख लेता है और तीसरा, हमेशा इस बात का ध्यान रखना कि किसी ऐसे रास्ते पर कभी मत जाना जिससे परिवार और खानदान पर आंच आए।’’ राम विलास पासवान की 1990 के दशक में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण से जुड़े मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही। समाज के वंचित तबके से जुड़े लोगों के मुद्दे उठाने में सबसे आगे रहने वाले पासवान जमीनी स्तर के मंझे हुए ऐसे नेता थे।

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