अर्थव्यवस्था की विकास दर में कमी दिखने का असल कारण समझ लीजिये

By प्रह्लाद सबनानी | Sep 20, 2019

पिछले पाँच वर्षों के दौरान केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के उद्देश्य से कई साहसिक क़दम उठाए हैं। जैसे, जीएसटी कर प्रणाली को लागू करना, औपचारिक अर्थव्यवस्था के दायरे को विस्तार देने के उद्देश्य से डीमोनेटाईज़ेशन करना, बड़े-बड़े चूककर्ता ऋणग्राहियों को दिवालिया घोषित करने के उद्देश्य से एनसीएलटी की स्थापना करना, फ़्लैट्स/मकान ख़रीदने वाले मध्यमवर्गीय जनों के हितों की रक्षा के लिए रेरा क़ानून को लागू करना, आदि। उक्त नए नियमों के लागू होने के साथ ही, देश में समेकन की प्रक्रिया शुरू हुई है, जो अभी तक जारी है। दरअसल, देश की अर्थव्यवस्था अधिक से अधिक औपचारिक बनने के दौर से गुज़र रही है। इसी कारण से भी देश के विकास की दर में कुछ कमी देखने में आ रही है।

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चूँकि आवास क्षेत्र रोज़गार के नए अवसरों का भारी मात्रा में सर्जन करता है, अतः इस क्षेत्र में जान फूँकने के उद्देश्य से देश की वित्त मंत्री ने अपने तीसरे पैकेज में आवास क्षेत्र के लिए कई सौग़ातों की घोषणा की है। अधूरी पड़ी समस्त आवासीय परियोजनाओं (जो ग़ैर-निष्पादनकारी आस्तियों में परिवर्तित नहीं हुई हैं एवं जिनके विरुद्ध एनसीएलटी में किसी प्रकार का दिवालियापन का मामला लम्बित नहीं है) के लिए रुपए 10,000 करोड़ के फ़ंड की विशेष व्यवस्था केंद्र सरकार द्वारा की जा रही है, ताकि इन अधूरी पड़ी आवासीय परियोजनाओं को शीघ्र ही पूरा किया जा सके। उक्त राशि के साथ ही इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए बाहरी निवेशकों को भी इन परियोजनाओं में लगभग इतनी ही राशि अर्थात् रुपए 10,000 करोड़ का निवेश करना आवश्यक होगा। इस प्रकार, कुल उपलब्ध राशि बढ़कर रुपए 20,000 करोड़ हो जाएगी। यह राशि सस्ती एवं मध्यमवर्गीय आय आवास परियोजनाओं को शीघ्र पूर्ण करने में मदद देगी। आवासीय परियोजनाओं को विदेशों से ऋण आसानी से उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विदेशी वाणिज्यिक उधारी सम्बंधी नियमों को भी आसान बनाया जा रहा है।

आवास ऋण पर ब्याज की दर को भी बैंकों द्वारा कम किया जा रहा है एवं इसे 10 वर्षीय सरकारी प्रतिभूतियों की यील्ड के साथ जोड़ा जा रहा है ताकि मध्यम वर्गीय लोगों को सीधे लाभ पहुँचाया जा सके। सरकारी कर्मचारियों को भी प्रेरित किया जा रहा है ताकि वे अधिक से अधिक नए आवासों को ख़रीदें। 

देश से निर्यात को बढ़ावा देने के लिए भी कई उपाय किए जा रहे हैं। निर्यातकों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से देश से निर्यात किए जाने वाले उत्पादों पर शुल्क एवं करों में छूट की घोषणा की गई है, इससे केंद्र सरकार के ख़ज़ाने पर रुपए 50,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

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निर्यात ऋण के लिए, प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के ऋण सम्बंधी नियमों को शिथिल किया जा रहा है ताकि अधिक से अधिक निर्यातक इकाईयों को इन नए नियमों के अन्तर्गत लाया जा सके। इससे इन निर्यातक इकाईयों को रुपए 36,000 करोड़ से रुपए 68,000 करोड़ के अतिरिक्त ऋण प्रदान किए जा सकेंगे। निर्यात साख गारंटी निगम के निर्यात साख गारंटी सम्बंधी नियमों को भी आसान बनाया जा रहा है ताकि अन्य निर्यात इकाईयों को भी इसके दायरे में लाया जा सके। इससे इन इकाईयों की वित्त लागत कम होगी एवं इनके उत्पाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे। इन नियमों के लागू होने के बाद प्रतिवर्ष रुपए 1,700 करोड़ का अतिरिक्त ख़र्च आने की सम्भावना है।

   

विभिन्न देशों के साथ किए गए मुक्त व्यापार समझौतों के लाभ देश के निर्यातकों को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से एक मिशन की स्थापना भी की जा रही है ताकि देश के निर्यातकों को रियायती टैरिफ़ की दरों का लाभ दिलाया जा सके। देश के चार प्रमुख महानगरों में प्रतिवर्ष मेगा ख़रीदारी मेलों का आयोजन बहुत बड़े स्तर पर किया जाएगा, जिसमें हस्तशिल्प, योगा, पर्यटन, वस्त्र एवं चमड़ा उद्योग पर विशेष फ़ोकस रहेगा।

उक्त वर्णित तीसरे पैकेज के अलावा पूर्व में वित्त मंत्री दो पैकेज की घोषणा कर चुकी हैं। प्रथम पैकेज की घोषणा दिनांक 23 अगस्त 2019 को की गई थी। जिसके अंतर्गत, पूँजी बाज़ार में निवेश को प्रोत्साहित करने हेतु, बैंकों की तरलता की स्थिति में सुधार करने हेतु, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमियों को ऋण का प्रवाह बढ़ाने हेतु, ग़ैर बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों की तरलता की स्थिति में सुधार हेतु, ब्याज दरों में की गई कमी को हितग्राहियों तक पहचाने हेतु, आटोमोबाइल क्षेत्र के विकास को गति देने हेतु कई उपायों एवं सुधारों की घोषणा की गई थी। इसी कड़ी में दिनांक 30 अगस्त 2019 को देश की वित्त मंत्री ने बैंकिंग क्षेत्र को और अधिक मज़बूत बनाए जाने के उद्देश्य से कई उपायों की घोषणा की थी। इसमें सरकारी क्षेत्र के बैंकों का आपस में विलय मुख्य रूप से शामिल था।

उक्त उपायों का परिणाम अब अर्थव्यवस्था में दिखने लगा है। एक उदाहरण यहाँ दिया जा रहा है। हाल ही के समय में, उपयोग किए गए व्यावसायिक वाहनों की बिक्री में ज़बरदस्त उछाल देखा गया है। सरकार द्वारा भी देश में कई नई परियोजनाओं की घोषणा की गई है, इससे व्यावसायिक वाहनों की बिक्री में वृद्धि की सम्भावना बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार, देश में वर्तमान में यदि 10,830 व्यावसायिक वाहनों का विक्रय प्रति माह संगठित क्षेत्र में किया जा रहा है तो इससे पाँच गुना विक्रय असंगठित क्षेत्र में किया जा रहा है। माँग बढ़ने के कारण, उपयोग किए गए व्यावसायिक वाहनों की क़ीमत में उछाल देखने में आ रहा है। चूँकि जीएसटी के लागू करने के बाद, चुंगी कर के ख़त्म करते ही, व्यावसायिक वाहनों के फेरों में तेज़ी आई है। जिन ट्रांसपोर्टर के पास पूर्व में पाँच वाहन थे अब उनका काम तीन या चार वाहनों से ही चल रहा है। शेष बचे एक या दो वाहन वे बेच देना चाह रहे हैं। साथ ही, देश में हैवी ट्रक की तुलना में लाइट व्यावसायिक वाहनों की माँग में तुलनात्मक रूप से तेज़ी देखने में आ रही है क्योंकि इनका उपयोग ज़रूरी चीज़ों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाने के लिए किया जाता है, इनको ख़रीदने के लिए कम पैसे के निवेश की आवश्यकता होती है, गावों में माल लाने-ले जाने के लिए इनकी माँग बढ़ रही है, इनके लिए वित्त की सुविधा भी आसानी से उपलब्ध है। विकसित देशों में हैवी ट्रक्स एवं लाइट व्यावसायिक वाहनों का अनुपात 1:3 है, जबकि भारत में यह अनुपात 1:2 का भी नहीं है। अतः भारत में इस क्षेत्र में वृद्धि की गुंजाइश बहुत अधिक है। उक्त उदाहरण से यह स्पष्ट है कि देश की अर्थव्यवस्था, समेकन की प्रक्रिया से तेज़ी से उबरने का प्रयास कर रही है।

-प्रह्लाद सबनानी

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