By प्रभासाक्षी न्यूज़ डेस्क | Oct 24, 2026
कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में बलात्कार और हत्या की शिकार हुई चिकित्सक के माता-पिता ने शनिवार को भ्रष्टाचार के एक मामले में अस्पताल के पूर्व प्राचार्य संदीप घोष को जमानत दिए जाने पर सवाल उठाए। वहीं, दो नागरिक संगठनों ने मामले में जवाबदेही की मांग को लेकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के कार्यालय तक विरोध मार्च निकालने की घोषणा की। नागरिक समाज से जुड़े संगठनों ‘वॉयस ऑफ अभया’ और ‘वॉयस ऑफ वुमेन’ ने यह मार्च 12 नवंबर को आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल से शुरू करने की घोषणा की।
सीबीआई को पता चलना चाहिए कि साक्ष्यों को नष्ट करने, रोकने या दबाने की कोशिशों के बावजूद लोग अब भी विरोध कर रहे हैं और सड़कों पर हैं। निराशा की कोई जगह नहीं है।’’ इस बीच आरजी कर पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ ने घोष को जमानत मिलने पर नाराजगी जताई। उन्होंने सवाल किया कि उनकी बेटी की मौत से पहले के घंटों में उसके साथ मौजूद रहे लोगों को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया।
रत्ना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की विधायक भी हैं। उन्होंने कहा, ‘‘अगर उस समय सभी को गिरफ्तार कर लिया गया होता और साक्ष्यों को नष्ट नहीं होने दिया गया होता, तो स्थिति अलग हो सकती थी। हर मामले में आखिरी बार साथ देखे जाने के सिद्धांत को परखा जाता है।
मेरी बेटी के साथ मौजूद लोगों से पूछताछ होनी चाहिए। चिकित्सकों ने कहा है कि उसकी मौत आधी रात से सुबह छह बजे के बीच हुई। उस दौरान उसके साथ कौन था?
उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? क्या इसलिए कि वे चिकित्सक हैं? मेरी बेटी भी चिकित्सक थी।’’ पीड़िता की मां ने उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की, जिन पर उन्होंने साक्ष्य नष्ट करने का आदेश देने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा, ‘‘वे लोग कौन थे, जिन्होंने सब कुछ इतनी जल्दी नष्ट करने का निर्देश दिया? तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री, स्वास्थ्य सचिव एन एस निगम और संदीप घोष... जिम्मेदार लोगों की पहचान की जानी चाहिए। मुख्य साजिशकर्ताओं को न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए।’’ पीड़िता के पिता ने कहा कि इस मामले में घोष को आजीवन कारावास की सजा मिलनी चाहिए थी।
हालांकि, उन्होंने भरोसा जताया कि अंततः न्याय मिलेगा। उन्होंने कहा, ‘‘इस मामले में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई जानी चाहिए थी।’’ भाजपा नेता राहुल सिन्हा ने भी घोष को जमानत मिलने पर हैरानी जताई, लेकिन कहा कि यह फैसला न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। सिन्हा ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘हम भी हैरान थे कि संदीप घोष को जमानत मिल गई।
मैं स्पष्ट रूप से कहूंगा कि अगर उन्हें जमानत नहीं मिली होती, तो बेहतर होता। लेकिन क्या हममें से कोई न्यायाधीश के फैसले में हस्तक्षेप कर सकता है? जमानत देने या न देने का फैसला पूरी तरह न्यायपालिका का अधिकार है और जमानत प्राप्त करना भी किसी व्यक्ति का कानूनी अधिकार है।
मैं स्पष्ट रूप से कह सकता हूं कि बंगाल में कोई भी इस जमानत आदेश से खुश नहीं है।’’ उच्चतम न्यायालय ने 17 अक्टूबर को घोष को जमानत दे दी थी। उन पर कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में वित्तीय अनियमितताओं और अयोग्य उम्मीदवारों को प्रवेश दिलाने के लिए मेरिट अंकों में हेरफेर करने का आरोप है। न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी बी वराले की पीठ ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के 23 फरवरी के उस आदेश के खिलाफ घोष की याचिका स्वीकार कर ली थी, जिसमें उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।