एक जैसी उम्र, एक जैसी आग, एक जैसी मांग, नेपाल से यूरोप Gen Z आंदोलन का प्रकोप

By अभिनय आकाश | Sep 11, 2025

जेन जेड का आंदोलन आग बनकर पिछले दो दिनों से नेपाल को जला रहा था और अब उसी तरह फ्रांस की राजधानी पेरिस में इमारतें जलाई गई। वैसे तो काठमांडू से पेरिस की दूरी करीब 7 हजार किलोमीटर है। इसे तय करने में विमान से करीब 12 से 14 घंटे लगते हैं। लेकिन लेकिन जेन जेड आंदोलन की आग इससे भी कम समय में फ्रांस से नेपाल पहुंच गई। इस आंदोलन को वहां के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पर तख्तापलट का काउंटडाउन कहा जा रहा है। इसके बारे में आपको विस्तार से बताएंगे। लेकिन आपको पहले बताते हैं कि फ्रांस का ये आंदोलन नेपाल जैसा क्यों लग रहा है। ये तो आप सभी को पता है कि नेपाल का आंदोलन जेन जेड का आंदोलन था। यानी प्रदर्शनकारियों की भीड़ में ज्यादातर लोगों की उम्र 13 वर्ष से 28 से 30 वर्ष तक की थी। इसी तरह फ्रांस में हुए आंदोलन में शामिल ज्यादातर लोग भी इसी उम्र के थे। आगजनी वहां भी हुई और वहां भी हुई। जैसे हजारों लाखों लोगों की भीड़ बड़ी बड़ी इमारतों को जला रही थी। उसी तरह फ्रांस में भी इमारतें और गाड़ियां जलाई गई। हालांकि नेपाल में जैसे संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, सुप्रीम कोर्ट और सचिवालय जैसे महत्वपूर्ण भवनों में आग लगा दी गई। फ्रांस में वैसा तो नहीं हुआ। लेकिन वहां आंदोलन का ये पहला दिन ही था। 

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फ्रांस में डेढ़ साल में 5 प्रधानमंत्री

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों 20 माह में ही एक के बाद एक पांच प्रधानमंत्री नियुक्त कर चुके हैं, लेकिन सड़कों पर विरोध और गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा। बुधवार को एक ओर जहां नए पीएम सेबेस्टियन लेकोर्नू ने पदभार संभाला, वहीं वेतन और सब्सिडी कटौती के मुद्दे पर पूरे फ्रांस में 'लेट्स ब्लॉक एवरीथिंग' आंदोलन में एक लाख प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। मैक्रों ने 80 हजार पुलिसकर्मियों को तैनात किया। प्रदर्शनकारियों ने पेरिस, ल्यों, टूलूज और नांते तक सड़क, रेलवे और एयरपोर्ट सेवाएं बाधित की। पेरिस में प्रदर्शनकारियों ने कई जगहों पर सड़क को जाम कर आग लगा दी। नांते में नांते में पुलिस को आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा। कई जगह झड़पें हुई। 200 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है।

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आंदोलन क्यों शुरू हुआ?

आंदोलन की जड़ें पूर्व पीएम फ्रांस्वा बायरू यरू के जुलाई में पेश किए गए कठोर बजट में हैं। उन्होंने 43 अरब यूरो की कमी को पूरा करने के लिए दो सार्वजनिक छुट्टियां खत्म करने, पेंशन और कल्याणकारी भुगतान रोकने और अन्य कटौतियां लागू करने की योजना बनाई थी। इसका सीधा असर मजदूर वर्ग और मध्य वर्ग पर पड़ना था। बायरू पद छोड़ गए, लेकिन जनता का गुस्सा शांत नहीं हुआ। लोगों का कहना है कि समस्या बायरू नहीं, बल्कि मैक्रों और उनकी नीतियां हैं।

मैक्रों का इस्तीफा क्यों मांग रहे लोग?

प्रदर्शनकारियों का सबसे बड़ा आरोप है कि मैक्रों जनता की आवाज नहीं सुनते। पिछले साल समय से पहले चुनाव कराने के फैसले से उनकी पार्टी बहुमत खो दी, लेकिन उन्होंने लगातार अपने करीबी नेताओं को चुना। बायरू की हार के बाद भी मैक्रों ने लेकोनू को पीएम बना दिया, जिससे लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। अब 18 सितंबर को एक और राष्ट्रीय हड़ताल की तैयारी है, जिसमें उड़ान नियंत्रक भी शामिल होंगे।

लेफ्ट राइट दोनों आए साथ

Bloquons Tout आंदोलन मई में सोशल मीडिया पर शुरू हुआ। #Bloquons Tout और #10 Septembre के जरिए लोगों से अपील की गई कि देश ठप कर दिया जाए। आंदोलन में वामपंथी और अतिवामपंथी तो शामिल हैं ही, लेकिन इसमें अन्य लोग भी शामिल हो गए हैं। प्रदर्शनकारियों की मांगों में अमीरों पर टैक्स बढ़ाना प्रमुख है।

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