अमेठी तो गंवाया ही, अब अमेठी के राजा भी हाथ झटक कर चल दिए

By अभिनय आकाश | Jul 30, 2019

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने पार्टी और राज्यसभा सदस्यता दोनों से इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे को राज्यसभा सभापति एम वेंकैया नायडू ने स्वीकार भी कर लिया है। संजय सिंह भाजपा में शामिल हो रहे हैं। असम से राज्यसभा भेजे गए संजय सिंह का एक साल का कार्यकाल शेष था। लेकिन एक साल पहले ही उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। संजय सिंह ने इस्तीफे के बाद कहा, 'मैं कांग्रेस इसलिए छोड़ रहा हूं क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व में जीरो है। मैं 'सबका साथ सबका विकास' के कारण मोदी का समर्थन करता हूं। सिंह के इस कदम से उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रियंका के नेतृत्व में मिशन 2022 में लगी कांग्रेस को करारा झटका लगा है। उसका भाजपा भरपूर लाभ ले रही है। कांग्रेस के पास संजय सिंह के रुप में एक विरासत थी जिसे उन्होंने खो दिया है। अपने बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस की राजनीतिक और रणनीतिक चूक कही जाएगी कि वो संजय सिंह को पार्टी में रोक कर नहीं रख सकी। यूं तो आजादी के बाद भारत में तमाम रियासतें खत्म हो गई थी। लेकिन अमेठी रियासत के राजमहल ‘भूपति भवन’ की परंपराएं हमेशा बरकरार रहीं। इसलिए महाराजा रणंजय सिंह के बाद महल के महाराज बने संजय सिंह। जिसके बाद उनके पारिवारिक जंग से लेकर सियासत की जंग भी देखने को मिली। संजय सिंह ने बैडमिंटन के चैम्पियन सैय्यद मोदी की विधवा अमिता मोदी से शादी की थी। जिसके बाद से ही उनकी पत्नी गरिमा सिंह अमेठी के राजमहल से चली गई थीं। जिसके इसको लेकर जंग भी चली। 

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अक्सर विवादों में रहे हैं 

साल 1980 में संजय गांधी ने अमेठी से चुनाव लड़ने का फैसला किया था तो संजय सिंह ने उनका समर्थन किया था। 1988 में संजय सिंह कांग्रेस छोड़ जनता दल में चले गए। कभी संजय गांधी का समर्थन करने वाले संजय सिंह को 1989 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी के हाथों अमेठी में पराजय हासिल हुई थी। ये वो दौर था जब बैडमिंटन खिलाड़ी सैयद मोदी की गोलीमार कर हत्या कर दी गई थी और इस हत्याकांड में राजघराने से ताल्लुक रखने वाले तत्कालीन संजय सिंह का नाम सामने आया था। बताया जाता है कि सैयद मोदी, अमिता मोदी और संजय सिंह के बीच गहरी दोस्ती थी। सीबीआई का आरोप था कि संजय सिंह और अमिता मोदी के बीच पनप रहा संबंध ही सैयद मोदी के मर्डर की वजह बना। अदालत में संजय सिंह की तरफ से दिग्गज वकील रामजेठमलानी ने मोर्चा संभाला था। जिसके बाद पुख्ता सबूत न होने की वजह से कोर्ट ने सितंबर 1990 में संजय सिंह और अमिता मोदी का नाम इस केस से ही अलग कर दिया। 1995 में संजय ने अमिता से शादी कर ली। अक्सर चर्चाओं में रहने वाले महाराज ने 1998 में कांग्रेस के गढ़ अमेठी में कमल खिला दिया था। 1998 में भाजपा के टिकट पर अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ते हुए संजय सिंह कैप्टन सतीश शर्मा को हराकर सांसद चुने गए थे। जिसके बाद उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री बनाया गया था। लेकिन अगले साल ही हुए लोकसभा चुनाव में संजय सिंह को सोनिया गांधी के हाथों भीषण पराजय मिली। वहीं उनकी दूसरी पत्नी अमिता सिंह विधायक बन कर राज्य की भाजपा सरकार में मंत्री बनीं। 2003 में पति और पत्नी की कांग्रेस में वापसी हो गई।

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2009 में कांग्रेस ने उन्हें सुल्तानपुर से मैदान में उतारा और उन्होंने इस चुनाव में बसपा प्रत्याशी को मात देते हुए 1984 के बाद से जीत को तरस रही कांग्रेस के नाम यह सीट की। 2014 में कांग्रेस ने संजय सिंह को असम से राज्यसभा भेज दिया। जिसके बाद उनकी पत्नी अमिता सिंह ने सुल्तानपुर से चुनाव लड़ा और करारी शिकस्त झेलते हुए चौथे नंबर पर आईं। साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा ने संजय सिंह की पहली पत्नी गरिमा सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया तो कांग्रेस ने उनकी दूसरी पत्नी अमिता सिंह को चुनावी मैदान में उतारा। लेकिन गरिमा भाजपा के टिकट पर विधानसभा का चुनाव जीत गई, गरिमा सिंह पूर्व पीएम वी पी सिंह की भतीजी हैं। साल 2019 में संजय ने एक बार फिर से लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन इस बार मेनका गांधी के हाथों उन्हें पराजय मिली। जिसके बाद भाजपा की ताकत का अंदाजा कहें या कांग्रेस की दरकती जमीन की तकाजा की पार्टी बदलने में माहिर संजय सिंह ने राज्यसभा सदस्यता खत्म होने से आठ महीने पहले ही कांग्रेस को अलविदा कह दिया। 

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