By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त | Jan 09, 2021
‘साहब वैक्सिन ले लो वैक्सिन! सस्ती-सस्ती, अच्छी-अच्छी वैक्सिन! रस्ते का माल सस्ते में, लाया हूँ अपने बस्ते में! अभी नहीं तो कभी नहीं, मेरी वैक्सिन एकदम सही! दो वैक्सिन पर एक वैक्सिन फ्री! न रेजिस्ट्रेशन का लफड़ा, न ओटीपी की झंझट! आओ-आओ जल्दी आओ‘ वैक्सिन वाला एकदम फेरी वाले की तरह यही बातें रट्टा लगा रहा था। उसके पास एक ठेला था। ठेले पर कई टोकिरियाँ थीं। चना, मूँगफली, मटर की तरह रंग-बिरंगी वैक्सिनों से टोकरियाँ सजा रखी थी। लोग वहाँ से गुजरते और उसे अजीबोगरीब तरीके से देखते।
एक और पढ़े-लिखे से लगने वाले बेरोजगार ने पूछ लिया– देश और और विदेश की वैक्सिन में क्या फर्क है, जो हमें आपकी वैक्सिन खरीदने जैसी बेवकूफी करनी पड़ेगी? तिलमिलाने वाला सवाल सुनकर पहले तो डॉक्टर का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। किंतु ग्राहकों को बेवकूफ बनाने के लिए खुद को शांत रखना बहुत जरूरी होता है, का फार्मूला याद कर मुस्कुराते हुए बोला– देखिए रूस और अमेरिका ने वैक्सिन नहीं एक-दूसरे को तमाचा मारने के लिए बहाना बनाया है। रूस राइटिस्ट-लेफ्टिस्ट के चक्कर में न यहाँ का रहा न वहाँ का। यही बात पूँजीपति अमेरिका ने बताकर भारतीय पूँजीपतियों को झोली में डाल रखा है और कैसे भी करके देश के समस्त बदनों में पूँजीपति का डोज उतरवाना है। अब अमेरिका को कौन बताए कि दुनिया के सबसे बड़े कुबेर भारत में रहकर शोषण की गंगा बहाते हैं। इसमें उनके काले धंधों का प्रदूषण इतना फैल गया है कि गंगा का पानी पीना तो दूर नहाने लायक तक नहीं छोड़ा है। हाँ, जहाँ तक अंग्रेजों की वैक्सिन की बात है तो उनका डिवाइड एंड रूल का वैक्सिन आज भी देश में ऐसे कायम है जिसके चलते हम हिंदू-मुस्लिम, ऊँच-नीच, जात-पात, भाषा, प्रांत, लिंग आदि भेदभाव की रामधुन रटते ही रहते हैं।
मैं प्राइवेट अस्पताल चलाता हूँ। मेरा काम रोगी को भोगी बनाकर अपना उल्लू सीधा करना है। हम लूटते हैं तो लूटते हैं, वह भी कहकर लूटते हैं। हमारा ईमान किसी सरकार के झूठे वायदों से कहीं ज्यादा है। हम पैसा कमाने के लिए सब कुछ कर सकते हैं लेकिन धर्म, वर्ग, स्तर, भाषा, प्रांत, लिंग के आधार पर लोगों को लड़ाकर उन्हें चुनावी वैक्सिन लगाना नहीं जानते हैं। हम सामने से लूटने और आँखें खोलने में विश्वास रखते हैं। यही मेरी वैक्सिन की सच्चाई भी है।
-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त