By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Nov 06, 2020
हाय रे भगवान! यह मेरे हाथों क्या हो गया? उपलियों की महिमा पहचाने बिना मैंने उन्हें अग्नि की भेंट कर दी। मुझ मुए को मौत न आयी ऐसा करते हुए! वे उपलियाँ नहीं सोने के टुकड़े थे। मेरे अमीर बनने का अलाउद्दीनी चिराग, मेरे जिगर के टुकड़े थे। अब पछताय होत क्या जब उपली बन गई राख! जली को उपली कहते हैं, बुझी को मुझसा मूरख कहते हैं। इतने बरसों में उपलियों ने जितना धुआँ न छोड़ा होगा, उतना तो मैं पिछले दो-तीन दिनों में छोड़ चुका हूँ। अब करूँ भी तो क्या करूँ? एक बार डाला हुआ वोट, जली हुई उपली और खोया हुआ मौका फिर कभी वापस नहीं आता। बशर्ते फिर से चुनाव में गोबर करने का मौका मिल नहीं जाता। कोरोना काल में दुनिया जितनी नीचे गिर सकती थी, गिरी। जितनी बेरोजगारी, भूखमरी, बदहाली देखना था, देखा। मृत्यु का डिस्को डांस भी खूब देखा। किंतु इन सबके बीच कुछ अद्भुत, अनोखा तथा आँखें फाड़ डालने वाली घटना घटी, तो वह था उपली चिप का आविष्कार। यह हमारे समय का विज्ञान के द्वारा प्रदान की गई अनोखी भेंट है– उपली चिप।
यह न जाने नोबल बाँटने वाले कहाँ मर गए हैं जो ऐन वक्त पर सो जाते हैं। अरे भाई! कोई उन्हें जगाएँ और बताएँ कि इतने दिनों से बेवकूफों में नोबल बाँटकर पुरस्कार का नाम बेड़ा गर्क कर रखा है। नोबल देना है तो उपली चिप आविष्कर्ता को दें! अगर वे नहीं मानते हैं तो इसके लिए हमें स्वीडन के मुख्यालय पर धरना, अनशन, भूख हड़ताल जो चाहे करना पड़े, पीछे नहीं हटना चाहिए। क्या दुनिया ने कभी उपली चिप देखी भी है! दुनिया चीप बनाती है। हम चिप बनाते हैं। अब हम चीप नहीं चिप हैं! वह भी उपली चिप!
अब समय आ गया है कि हम अपनी हजारों साल पुरानी उपली कला को नया आयाम दें। पढ़ाई की डिग्रियाँ छोड़-छाड़कर चप्पे-चप्पे पर दीवार पर गोबर की उपली संस्कृति सजाएँ। गोबर से सनी हथेलियाँ न केवल हमारा भाग्य खोलेंगी बल्कि जात-पात, ऊँच-नीच, भाषा, लिंग भेद मिटाकर नवसमाजयुक्त उपली चिप बनाने में भी काम आयेंगी। हम इन चिपों का विदेश में आयात करेंगे। विदेशों में भारत की पर्यावरणीय चिंता का नया परचम लहरायेंगे। धरती की गरमी हो या फिर ओजोन परत के छेद– सभी समस्याओं का एकमात्र रामबाण इलाज होगा- उपली चिप। बहुत जल्द यू.एन.ओ. में बैठक आयोजित करेंगे। दुनिया को गोबर, गोबर से उपली और उपली से चिप बनाना सिखायेंगे। तब चीप दुनिया, चिप दुनिया कहलाने लगेगी।
-डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त'