लाइक्स बगैर ज़िंदगी (व्यंग्य)

By पीयूष पांडे | Oct 07, 2019

युवा पीढ़ी में एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है, जिसे दो वक्त की रोटी ना मिले तो कोई दिक्कत नहीं लेकिन शाम तक फोटू पर 200 लाइक्स ना मिलें तो उन्हें डिप्रेशन होने लगता है। हवा में घुले ज़हर से उन्हें परेशानी नहीं होती अलबत्ता पोस्ट पर पर्याप्त कमेंट ना आएं तो उन्हें साँस उखड़ती दिखती है। भद्दी से भद्दी फोटो और घटिया से घटिया पोस्ट पर भी लोग लाइक्स की उम्मीद करते हैं। हद ये कि फेसबुक-ट्विटर पर कई लोग भी मानो लाइक करने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। कोई पोस्ट आए, उन्हें लाइक करना ही है। निठल्ले बैठे बैठे दूसरों की पोस्ट या फोटो को लाइक करना वो अपना कर्म समझते हैं। और यदि तस्वीर किसी खूबसूरत लड़की की है तो लड़के इस कर्म में धर्म जोड़कर अतिरिक्त ऊर्जा से न केवल लाइक करते हैं बल्कि कमेंट भी करते हैं और खूबसूरती का संसार में प्रभाव फैले, इस उद्देश्य से फोटो शेयर भी करते हैं।  

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अब धंधा करते करते फेसबुक को अचानक सामाजिक सरोकार याद आ गए। हद है! फेसबुक को कोई समझाए कि लाइक्स बगैर क्या जिंदगी। अब अपनी एक मारु फोटू पर गबरु जवान को 500 लाइक्स मिलें और सामने वाला देख ही नहीं पाए तो क्या फायदा ऐसे लाइक्स का। वैसे भी, 90 फीसदी हिन्दुस्तानी दूसरों को जलाने में खुश रहते हैं। अरसे पहले एक टीवी कंपनी ने एक विज्ञापन बनाया था। इस विज्ञापन में टीवी की कोई खासियत-वासियत नहीं बताई गई अलबत्ता यह कहा गया कि टीवी घर पर लाइए, पड़ोसी ईर्ष्या से मर जाएंगे। कई लोग इसी चक्कर में टीवी खरीद लाए थे। ये अलग बात है कि पड़ोसी ईष्या से मरे नहीं, उल्टा रामायण-महाभारत के प्रसारण के वक्त घर में घुसकर बैठने लगे।

आज हाल यह है कि बंदा नई कार खरीदकर लाए और चार-छह पड़ोसी पूछने ना आएं तो लगता है कि पैसे बर्बाद हो गए। एपल का नया मोबाइल खरीदकर लाए और चार-छह लोग अपने हाथ में लेकर निहारें नहीं तो ऐसा लगता है एपल का फोन नहीं, सब्जीमंडी से फ्री धनिया ले आए हों। आज लोगों को अपनी खुशी से उतनी खुशी नहीं मिलती, जितनी अपनी खुश देखकर दूसरों की जलन से मिलती है। लाइक्स की संख्या से यही खुशी मिलती थी। हां, कई बार कुछ लोगों को लाइक्स न मिलने पर डिप्रेशन भी होता है। लेकिन यह उनकी किस्मत।

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फेसबुक को समझना चाहिए कि दूसरे लोग अगर हमारी पोस्ट पर मिलने वाले लाइक्स की संख्या नहीं देख पाए तो फिर लड़कियां क्यों ब्यूटी पार्लर जाएंगी। अभी तो फेसबुक पर तस्वीर पोस्ट करने के बाद लाइक्स के दबाव में उन्हें हर हाल में सुंदर दिखना जरूरी है। 100-200-500 मेगापिक्सल वाले कैमरों की बिक्री पर असर पड़ेगा। आखिर फोटू खींचकर डालना तो फेसबुक पर ही है। कई लड़के तो जिम वगैरह भी इसलिए जा रहे हैं ताकि वहां के फोटू फेसबुक पर डाल कर लाइक्स हासिल कर सकें। लाइक्स नहीं दिखेंगे तो डिप्रेशन नहीं होगा। डिप्रेशन नहीं होगा तो साइक्लोजॉजिस्ट के धंधे पर भी असर पड़ेगा। लाइक्स अब सिर्फ लाइक्स नहीं हैं। लाइक्स का अपना अलग संसार है, और इस संसार से छेड़छाड़ का हक फेसबुक को नहीं है।

फेसबुक नामक आभासी मुल्क के लोगों की लाइफलाइन ही लाइक्स है। ज्यादा लाइक्स के लिए ही लोग थोड़ी बहुत मेहनत भी करते हैं। लाइक्स नहीं तो काहे की मेहनत। झूठ से काम चलेगा और सच में झूठ का कोई सिरा नहीं होता, कोई सीमा नहीं होती।

-पीयूष पांडे

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