हिंदी मंथ में हिंदी डे (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Sep 14, 2019

हिन्दी मंथ के दौरान, अंग्रेज़ी स्कूल में इस साल भी हिंदी डे मनाया जाना है। पिछले दिनों एक हिट फेसबुकिया कवि से खुश होकर प्रिंसिपल ने उन्हें न्यू हिन्दी टीचर रख लिया है। अब अभिभावक चाहने लगे हैं कि उनके बच्चों को थोड़ा हिन्दी भी आना चाहिए। यह वही स्कूल है जहां घुसते ही कान में रेंगने  लगता है, ‘नोबडी विल स्पीक हिन्दी’। प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, नए स्कूल खुल रहे हैं, विद्यार्थी तो सभी स्कूलों को चाहिए। फेसबुकी ने प्रिंसिपल से कहा, सर यू वर टेलिंग दैट, हिन्दी में फंक्शन करना है। ओह यस, वैहन वी कैन डू इट नाउ, काल सम हिन्दी पोयट वोयट एंड हिन्दी डे मना डालो, यू स्जेसट। फंक्शन हो जाएगा तो हमारा नेताजी विल बी हैप्पी, अभी बहुत काम करवाना है। सर वो मैंने पोयट बुलाए हैं बाहर, शुड आई कौल उनको अंदर। 

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कवि ने सुझाया कि आप हिन्दी दिवस पर विद्यार्थियों लिए कविता पाठ, निबंध लेखन या भाषण प्रतियोगिता करवा सकते हैं। बातचीत के दौरान कवि को किसी का फोन आया तो उनकी टयून का फिल्मी गाना प्रिंसिपल को अच्छा लगा और उन्हें सही आइडिया मिल गया। कवि को उन्होंने चाय पिला बिस्किट खिला कर जाने दिया। कवि को समझ है, उनके बच्चे भी तो इंगलिश मीडियम में पढ़ रहे हैं। पत्नी ने घर में हिंदी अखबार के साथ इंगलिश पेपर भी लगा रखा है। प्रिंसिपल व्यवसायी है, उसने अगर अंग्रेजी का डंका नहीं बजाया तो उसकी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी। उन्होंने फेसबुक से उठाए हिन्दी अध्यापक को बुलाकर कहा, प्लीज़ चूज़ सम सिंगर्स फ्राम एवरी क्लास हु कैन सिंग हिंदी फिल्म सौंग्स नाइसीलि। उनका कंपीटीशन रखवा दीजिए। गर्ल्स विल डांस, तो अच्छा फंक्शन हो जाएगा। 

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बहुत से हिन्दी टीचर ऐसे हैं जो नौकरी सरकारी स्कूल में करते हैं मगर बच्चे कानवेंट में पढ़ रहे हैं जहां हिन्दी बोलना सख्त मना है। स्कूल से बाहर निकलते ही दिलों में हिन्दी सांस लेना शुरू करती है। घर पर हिन्दी बोलते हैं, हिन्दी भजन व गाने सुनते हैं, हिंदी सिरियल व फिल्में देखते हैं और हिन्दी में ही लड़ते हैं। अंग्रेज़ी तो, शराब पीकर लड़ते हुए गालियां देने के काम आती है। अपने कम पढ़े दादा दादी को कौन कौन सी बोली या लहज़े में पटाते हैं। इंगलिश स्पीकिंग सेंटर हिन्दी में बोलकर, अंग्रेज़ी सिखा रहे हैं। कोई अपने हाथ से लिखे सुलेख में अपने बच्चों के विवाह कार्ड छपवा दें तो तारीफ करते हैं। लेकिन अपने या बच्चों के निमंत्रण पत्र अंग्रेज़ी में घिसेपिटे अंदाज़ में ही छपवाएंगे, रोम रोम में बसी हिंदी में छपवाने से शर्माते, घबराते हैं कि लोग क्या कहेंगे। हम ‘सामाजिक पशु’ प्रतीक्षा करते रहते हैं कि शुरुआत कोई और करे। दूसरा शुरुआत करेगा तो बाहरी मन से तारीफ करेंगे लेकिन अपनी बारी में फिर हीन भावना के शिकार होंगे। अंग्रेज़ी का दिखावा हमारे सिर पर ऐसे सवार है जैसे चीन के सस्ते सामान का। कहीं हिन्दी हमें चीनी भाषा (मैडरिन) से भी मुश्किल तो नहीं लगती। बताते हैं मैडरिन सीखना मुश्किल है। इसमें हां कहने के लिए ही आधा दर्जन से ज्यादा तरीके हैं। हिन्दी के लिए यस कहना मुश्किल है। चलो छोड़ोजी, स्कूल में हिंदी डे के दिन हिट हिंदी फिल्मों के गानों का सफल कंपीटीशन हुआ और अगले दिन हिंदी के अखबारों में फोटो विद न्यूज़ भी छपी।

- संतोष उत्सुक

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